Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 णमो अरिहन्ताणम् | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 णमो अरिहन्ताणम् | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

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दशमः पाठः – णमो अरिहन्ताणम्

सम्पूर्णः पाठः (संस्कृत-मूलपाठः)

१. आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः नाभिनामकः कश्चन महाराजः। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासनादिषु च समर्थः। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च। तयोः एव प्रियपुत्रः ऋषभः। ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च आसीत्। यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।

अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुदभवन्। जनेषु परस्परं विद्वेषादयः भावनाः आविरभवन्। तदा नाभिः "अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः” इति मन्यमानः तस्मै राज्यं समर्पितवान्। ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा सः आदौ जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किं, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान्। तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति। 

अतः सः मूलसमस्यानां परिष्काराय जनानां सुखमय-जीवनाय च विविधाः योजनाः रचितवान्। विशेषरूपेण कृषिकार्यं, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणं, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनं चेत्यादीनि जीवन-कौशलानि प्रशिक्षितवान्। काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणं, पात्रनिर्माणं, गृहनिर्माणं, नगरनिर्माणादिकं च प्रशिक्षितवान्। तेन क्रमशः जनाः सक्रियाः अभवन् जीवनपद्धतिं च परिवर्तितवन्तः। 

क्रमशः जनानाम् आर्थिकस्थितिः अपि सुदृढा जाता। जनाः स्वयमेव गृहाणां विविधभोज्यपदार्थानां नित्योपयोगिवस्तूनां च निर्माणं कर्तुम् आरब्धवन्तः। कृषिकार्याणि अपि प्रचुरतया आरब्धानि। तेन जनानां समस्याः स्वयमेव परिहृताः, राज्यं पुनः सुभिक्षं चाभवत्।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

हिन्दी-अनुवाद (Hindi Translation):

युगों के प्रारंभ में प्रजा के प्रिय 'नाभि' नाम के एक महाराज थे। वे राजनीति, युद्ध-कला तथा प्रशासन आदि में अत्यंत कुशल थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और दयालु थीं। उन्हीं दोनों के प्रिय पुत्र ऋषभ थे। ऋषभ सर्वगुणसम्पन्न, उच्च शिक्षित तथा राजनीति में प्रवीण थे। युवावस्था से शोभित उस राजकुमार को देखकर महाराज नाभि ने उन्हें राज्यभार सौंपने का विचार किया।

एक बार समाज में अकाल (सूखा) आदि समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। लोगों में परस्पर ईर्ष्या-द्वेष की भावनाएँ प्रकट होने लगीं। तब महाराज नाभि ने यह विचार कर कि "यह समय ऋषभ के राजनीतिक कौशल की परीक्षा के लिए सर्वथा उपयुक्त है," उन्हें राज्य सौंप दिया। राजा बनने के उपरांत ऋषभ ने सर्वप्रथम लोगों की समस्याएँ क्या हैं, अकाल का कारण क्या है, लोगों में परस्पर द्वेष क्यों है, और इन समस्याओं के समाधान के क्या उपाय हैं—इन विषयों पर गंभीरता से विचार किया। उन्हें यह स्पष्ट समझ आ गया कि लोगों का आलस्य, कृषि कार्यों में कमी, तथा प्रजा में उत्पादन क्षमता का अभाव ही मूल समस्याएँ हैं।

अतः उन्होंने इन मूल समस्याओं के निवारण और लोगों के सुखमय जीवन के लिए विभिन्न योजनाएँ बनाईं। विशेष रूप से उन्होंने प्रजा को खेती करना, विभिन्न खाद्य सामग्रियों से भोजन बनाना, धागों से वस्त्र बुनना, और गाय, घोड़े आदि पशुओं का पालन-पोषण करना जैसे जीवनोपयोगी कौशलों का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने लकड़ी, धातु और पत्थरों से घरेलू वस्तुओं, बर्तनों, मकानों तथा नगरों के निर्माण की कला सिखाई। इससे लोग धीरे-धीरे कर्मठ एवं सक्रिय हो गए और उन्होंने अपनी जीवन-शैली बदल ली।

क्रमशः लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ हो गई। लोग स्वयं ही घरों, भोजन सामग्रियों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करने लगे। कृषि कार्य भी बड़े पैमाने पर होने लगे। इससे प्रजा की समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो गईं और राज्य पुनः धन-धान्य से संपन्न हो गया।

प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही राजा का हित है। जो स्वयं को प्रिय लगे वह राजा का सच्चा हित नहीं है, अपितु जो प्रजा को प्रिय और हितकर लगे वही राजा का वास्तविक हित है॥

English Translation :

At the dawn of the cosmic ages, there lived a king named Nabhi, beloved by his subjects. He was highly skilled in politics, military strategy, and state administration. His wife, Queen Marudevi, was wise and compassionate. Their cherished son was Rishabha. Rishabha was endowed with all virtues, thoroughly learned, and an astute statesman. Seeing the prince radiant in his youth, King Nabhi considered entrusting him with the responsibilities of the kingdom.

Once, social crises such as famines erupted, and feelings of mutual enmity began to arise among the people. Thinking that "this is the most fitting time to test Rishabha’s statesmanship," Nabhi handed over the kingdom to him. Upon becoming king, Rishabha first reflected deeply on questions such as: What are the problems of the people? What caused this famine? Why is there discord among citizens? What are the viable solutions? He clearly realized that laziness, decline in agricultural work, and lack of productivity among the subjects were the core issues.

Therefore, to resolve these fundamental problems and ensure a prosperous life for his people, he devised various systematic plans. He trained the citizens in essential life skills: farming, preparing food from varied ingredients, weaving cloth from threads, and rearing cattle, horses, and other domestic animals. He also trained them in crafting household utility articles from wood, metal, and stone, as well as making utensils, building houses, and planning towns. Consequently, people gradually became industrious and transformed their lifestyle. Their economic condition grew strong. The citizens began manufacturing daily essentials, houses, and food items on their own. Agricultural activities flourished abundantly. As a result, people's miseries were completely eliminated, and prosperity returned to the kingdom.

In the happiness of the subjects lies the happiness of the king; in their welfare, his welfare.
The king's true good does not lie in what pleases himself, but in whatever is pleasing and beneficial to his subjects. 



२. ऋषभः जनानां जीवने शान्तिं सुरक्षां न्यायिकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। एवम् ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च विनितानाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्। समाजस्य उत्कर्षेण सः जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदेवः इति कथयन्ति स्म। ऋषभदेवः समाजस्य उत्कर्षेण सह साम्राज्यस्यापि विस्तारं कृतवान्।

एतादृशस्य महाराजस्य पुत्राः अपि शौर्येण पराक्रमेण बुद्धिबलेन च विश्वप्रसिद्धाः आसन्। तादृशेषु शते पुत्रेषु विशेषरूपेण भरतः बाहुबलिः च अत्यन्तं सुविख्यातौ। तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये अपि गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्रसिद्धे च आस्ताम्। जैनसम्प्रदायानुगुणं 'ब्राह्मीलिप्याः' विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते। तस्यामेव लिप्यां शिलालेखाः उपलभ्यन्ते।

एवं सर्वोन्मुखसमृद्ध्या ऋषभदेवः जीवने प्राप्तानन्दः परमसुखी च आसीत्। परं को वा जानाति विधिलिखितम्। ऋषभदेवस्यापि जीवने काचित् तादृशी घटना संवृत्ता यया तस्य जीवनमेव परिवर्तितम्। उच्यते हि –

दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम् ॥

हिन्दी-अनुवाद (Hindi Translation): 

ऋषभ ने लोगों के जीवन में शांति, सुरक्षा और न्यायिक व्यवस्था को पुनः सुदृढ़ किया। इस प्रकार ऋषभ के कुशल शासन और कौशल से 'विनिता' (अयोध्या) नामक नगर का निर्माण हुआ। समाज के उत्थान के कारण उन्होंने जनता के हृदयों में अत्यंत सम्मानित स्थान प्राप्त किया। इसलिए प्रजा उन्हें प्रेम से 'राजा ऋषभदेव' कहने लगी। ऋषभदेव ने समाज के विकास के साथ-साथ अपने साम्राज्य का विस्तार भी किया।

ऐसे महाराज के पुत्र भी अपने शौर्य, पराक्रम और बुद्धिबल के लिए विश्वविख्यात थे। उनके सौ पुत्रों में विशेष रूप से भरत और बाहुबलि अत्यंत प्रसिद्ध हुए। उसी प्रकार ऋषभदेव की पुत्रियों में ब्राह्मी और सुन्दरी नामक दोनों कन्याएँ भी गणित आदि शास्त्रों में पारंगत और प्रसिद्ध थीं। जैन परंपरा के अनुसार माना जाता है कि 'ब्राह्मी लिपि' का विकास ब्राह्मी के द्वारा ही किया गया था। प्राचीन शिलालेख भी इसी लिपि में प्राप्त होते हैं।

इस प्रकार सर्वांगीण समृद्धि से ऋषभदेव जीवन में अत्यधिक आनंदित और परम सुखी थे। परंतु भाग्य के लेख को कौन जान सकता है! ऋषभदेव के जीवन में भी एक ऐसी घटना घटी जिसने उनका पूरा जीवन ही बदल कर रख दिया। जैसा कि कहा गया है –

यह संपूर्ण संसार, जन्म, कर्म और शुभ फल सब भाग्य (प्रारब्ध) के अधीन हैं।
संयोग और वियोग सब भाग्य से ही होते हैं, दैव (प्रारब्ध) से बढ़कर कोई बल नहीं है॥

English Translation:

Rishabha re-established peace, security, and the judicial system in the lives of the people. Through his efficient administration and visionary skill, the city named Vinita (Ayodhya) was built. By uplifting society, he earned a deeply revered place in the hearts of his citizens. Hence, the people affectionately called him 'King Rishabhadeva'. Alongside societal progress, Rishabhadeva expanded his empire.

The sons of such an emperor were also renowned worldwide for their valor, courage, and intellect. Among his hundred sons, Bharata and Bahubali were exceptionally distinguished. Similarly, among his daughters, Brahmi and Sundari were renowned scholars, particularly proficient in mathematics and other sciences. According to Jain tradition, the 'Brahmi script' was developed by Brahmi herself, and ancient stone inscriptions are found in this script.

Blessed with all-round prosperity, Rishabhadeva lived a joyful and deeply fulfilled life. Yet, who can predict the dictates of destiny? An unexpected incident occurred in Rishabhadeva’s life that transformed his entire journey. As it is said:

The entire universe, birth, actions, and fortune are subordinate to destiny.
Unions and separations occur by fate; indeed, there is no force greater than destiny.


३. एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत्। कथं काचित् आरोग्यवती स्त्री सहसा मरणं प्राप्तवती, किं नाम जीवनम्, कथं जीवनीयम्, इत्यादयः अनेके प्रश्नाः तस्य बुद्धौ आविरभवन्। इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति, इदं सुखं स्थायि नास्ति इति विचिन्त्य स्थिरसुखस्य प्राप्त्यर्थं सः सर्वमपि परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।

स्वस्य विशालं साम्राज्यं स्वपुत्रेषु विभक्तवान्। विशेषतया 'विनिता' राज्यं भरताय तक्षशिलां बाहुबलये च समर्प्य जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्रस्थितोऽयं महामुनिः। तम् अनेके जनाः शिष्यरूपेण अनुसृतवन्तः। ऋषभदेवः तदारभ्य अरण्येषु मौनेन ध्यानं निरन्तरम् अध्ययनं च करोति स्म। सः अध्ययने गभीरध्याने च तथा लीनः भवति स्म येन सः भोजनपानादिकमपि विस्मृत्य बहुकालं यावत् स्वाभाविकरूपेण निराहारम् अकरोत्। परं तस्य अनुयायिनः तथा निराहारं स्थातुं कष्टम् अनुभवन्ति स्म। किन्तु ते ऋषभदेवं त्यक्त्वा गन्तुमपि न इच्छन्ति स्म। ते अरण्ये विद्यमानेभ्यः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा चित्वा जीवनं यापयन्ति स्म।

कदाचित् तेषाम् एतादृशं व्यवहारं दृष्ट्वा जैनसन्यासिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा न चिनुयुः इति बोधनार्थं स्वयं भिक्षार्थं प्रस्थितः। अनुयायिनः अपि तस्य आचरणेन प्रभाविताः सन्तः भिक्षार्थं गताः। ग्रामेषु प्रतिगृहं गत्वा भिक्षां प्राप्य जीवनं निर्वर्तयन्ति स्म। परम् ऋषभः पूर्वं भोजनार्थं मौनेन भिक्षायाचनं करणीयमिति मौनेन प्रतिगृहं भिक्षायाचनम् आरब्धवान्। परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रियं महाराजं दृष्ट्वा भिक्षायां किं दातव्यमिति सम्भ्रान्ताः सन्तः तस्मै आभरणानि अनर्घवस्तूनि च यच्छन्ति स्म। परं भिक्षायां भोजनपदार्थः देयः इति न केनापि चिन्तितम्। फलतः ऋषभदेवस्य दिने दिने सकष्टम् उपवासः करणीयः आपतितम्। कदाचित् ऋषभदेवः भोज्यपदार्थानाम् अभावे चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान्।

हिन्दी-अनुवाद (Hindi Translation): 

एक बार ऋषभदेव ने राजमहल में नृत्यकला के प्रदर्शन का आयोजन किया। वहाँ नृत्य प्रस्तुत करती हुई एक नर्तकी अचानक भूमि पर गिर पड़ी और उसकी मृत्यु हो गई। इस आकस्मिक घटना से ऋषभदेव का मन अत्यधिक उद्विग्न और व्यथित हो उठा। एक पूर्णतः स्वस्थ स्त्री की अचानक मृत्यु कैसे हो गई, वास्तव में जीवन क्या है, जीवन कैसे जीना चाहिए—ऐसे अनेक प्रश्न उनकी बुद्धि में उत्पन्न होने लगे। इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है, यह सांसारिक सुख स्थायी नहीं है—यह विचार कर स्थायी और शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए वे सब कुछ त्याग कर संन्यासी (भिक्षु) बन गए।

उन्होंने अपना विशाल साम्राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। विशेष रूप से 'विनिता' राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबलि को सौंपकर यह महामुनि जीवन के परम सत्य की खोज में निकल पड़े। अनेक लोगों ने शिष्य बनकर उनका अनुगमन किया। ऋषभदेव तभी से जंगलों में मौन रहकर ध्यान और निरंतर स्वाध्याय करने लगे। वे ध्यान और अध्ययन में इतने लीन रहते थे कि खाना-पीना भूलकर स्वाभाविक रूप से बहुत लंबे समय तक बिना भोजन के (निराहार) रहते थे। परंतु उनके अनुयायियों के लिए इस प्रकार भूखा रहना अत्यंत कठिन था। फिर भी वे ऋषभदेव को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे। वे वन के वृक्षों से फल और पत्ते-सब्जियाँ तोड़कर अपना जीवन चलाते थे।

एक दिन उनके इस आचरण को देखकर कि जैन संन्यासियों को वृक्षों से फल या सब्जियाँ नहीं तोड़नी चाहिए—यह सिखाने के लिए वे स्वयं भिक्षाटन के लिए निकले। उनके आचरण से प्रेरित होकर उनके अनुयायी भी भिक्षा के लिए गए। वे गाँवों में घर-घर जाकर भिक्षा प्राप्त कर जीवन निर्वाह करने लगे। परंतु ऋषभदेव ने यह नियम रखा था कि भोजन के लिए मौन रहकर ही भिक्षा माँगी जाए, अतः वे मौन रहकर घर-घर भिक्षा के लिए जाने लगे। किंतु वहाँ के निवासी अपने प्रिय महाराज को देखकर चकित रह जाते थे कि भिक्षा में क्या दें, और भ्रमवश उन्हें सोने-चांदी के आभूषण और बहुमूल्य रत्न भेंट करने लगते थे। भिक्षा में भोजन दिया जाना चाहिए, यह किसी ने नहीं सोचा। परिणामस्वरूप ऋषभदेव को प्रतिदिन अत्यंत कठिन उपवास करना पड़ा। भोजन के अभाव में ऋषभदेव ने लगातार चार सौ (400) दिनों तक उपवास किया।

English Translation:

Once, King Rishabhadeva organized a classical dance performance in his royal palace. While performing her dance, a female dancer suddenly collapsed onto the ground and died. This incident deeply perturbed Rishabhadeva's mind. How could a completely healthy woman meet with sudden death? What is the true essence of life? How should life be lived? Many such profound questions arose in his consciousness. Realizing that nothing in this mortal world is eternal and worldly pleasures are fleeting, he renounced everything and set out as an ascetic monk to attain permanent, transcendental bliss.

He divided his vast empire among his sons, bestowing the kingdom of Vinita upon Bharata and Takshashila upon Bahubali. This great sage then departed in search of the ultimate truth of existence. Many followers accompanied him as disciples. From that time onward, Rishabhadeva engaged in silent meditation and continuous self-study in the forests. He would become so deeply absorbed in contemplation and meditation that, forgetting even food and water, he remained naturally without food for extended durations. However, his disciples found it difficult to endure such severe fasting, yet they were unwilling to abandon him. They sustained themselves by gathering fruits and vegetables from the forest trees.

Observing this behavior, and wishing to teach that Jain ascetics should not pluck fresh fruits or vegetables from living trees, Rishabhadeva himself set out to seek alms (Bhiksha). Inspired by his conduct, his followers also went out for alms, visiting houses in villages to sustain their lives. However, Rishabhadeva practiced silent begging, approaching households without uttering a word. Seeing their beloved former emperor standing before them, the householders were bewildered about what to offer and presented him with gold ornaments and priceless jewels. No one realized that food was to be offered as alms. Consequently, Rishabhadeva had to undergo grueling fasting day after day. Due to the absence of food, he fasted continuously for four hundred (400) days.

४. एकदा पर्यटनावसरे सः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तच्च इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः। तच्च वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया-दिनम् आसीत्। अतः जैनसम्प्रदाये 'वर्षतपपारणामहोत्सवः' अधुनापि गुजराते पदलिप्तपुरम् (पालीताणा) उत्तरप्रदेशे हस्तिनापुरं चेत्यादिषु पवित्रतीर्थेषु आचर्यते। अत्र त्रयोदशमासानां वैकल्पिकदिनेषु उपवासं कुर्वन्ति। अन्ते अक्षयतृतीयादिने इक्षुरसेन उपवासस्य समापनं कुर्वन्ति।

एवं दीर्घकालिकोपवासेन निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्। अयमेव जैनसम्प्रदाये आदिमः तीर्थङ्करः प्रभुः नाथः इत्यतः 'आदिनाथः' इति ख्यातः। ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः भिक्षुणी श्रावकः श्राविका चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते।

तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इति प्रसिद्धः यच्च प्राकृतभाषायां वर्तते –

“णमो अरिहन्ताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं”

हिन्दी-अनुवाद (Hindi Translation): 

एक बार भ्रमण करते हुए वे हस्तिनापुर के निकट स्थित एक गन्ने के खेत के किनारे से गुजर रहे थे। वह गन्ने का खेत उनके ही प्रपौत्र (परपोते) श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने परदादा को पीने के लिए गन्ने का रस भेंट किया। इसके साथ ही ऋषभदेव का लंबा उपवास समाप्त हुआ। वह वैशाख मास की अक्षय तृतीया का पावन दिन था। इसलिए जैन परंपरा में आज भी 'वर्षीतप पारणा महोत्सव' गुजरात के पालीताणा (पदलिप्तपुर) और उत्तर प्रदेश के हस्तिनापुर जैसे पवित्र तीर्थों में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। इसमें श्रद्धालु तेरह महीनों तक एक दिन छोड़कर उपवास करते हैं और अंत में अक्षय तृतीया के दिन गन्ने के रस से उपवास का पारण करते हैं।

इस प्रकार दीर्घकालीन उपवास, निरंतर अध्ययन और कठोर तपस्या के बल पर ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे 'केवलज्ञान' (परम ज्ञान) प्राप्त किया। वे ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, प्रभु और नाथ होने के कारण 'आदिनाथ' के नाम से विख्यात हुए। ऋषभदेव ने समाज के मार्गदर्शन के लिए भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक और श्राविका—यह चार स्तरीय व्यवस्था बनाई। यही व्यवस्था 'जैन संघ' (चतुर्विध संघ) के नाम से प्रसिद्ध है।

उनका सर्वोच्च मंत्र 'नवकार मंत्र' के नाम से प्रसिद्ध है, जो प्राकृत भाषा में है –

"णमो अरिहन्ताणं,
णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं"

English Translation:

One day during his travels, he was walking along a path adjoining a sugarcane field near Hastinapur. That sugarcane field belonged to his great-grandson, Shreyansa. Shreyansa offered fresh sugarcane juice to his great-grandfather to drink. With this, Rishabhadeva’s prolonged fast was broken. That day was Akshaya Tritiya in the month of Vaishakha. Hence, in the Jain tradition, the 'Varshitap Parana Mahotsav' is celebrated to this day at sacred pilgrimage sites such as Palitana (Padaliptapura) in Gujarat and Hastinapur in Uttar Pradesh. In this observance, devotees fast on alternate days for thirteen months and finally conclude their penance on Akshaya Tritiya with sugarcane juice.

Through prolonged fasting, unbroken spiritual contemplation, and rigorous penance, Rishabhadeva attained Kevala Jnana (supreme omniscience) on the eleventh day (Ekadashi) of the dark fortnight of Phalguna beneath the Akshaya Vata (banyan tree) at Prayagraj. Being the first spiritual guide, master, and protector in the Jain tradition, he became celebrated as 'Adinatha'. To guide humanity, Rishabhadeva structured the fourfold order of monks (Bhikshu), nuns (Bhikshuni), laymen (Shravaka), and laywomen (Shravika). This order is widely known as the Jain Sangha.

​Their supreme chant is the Navakara Mantra, composed in the Prakrit language:

​"Namo Arihantānam,

Namo Siddhānam,

Namo Āyariyānam,

Namo Uvajjhāyānam,

Namo Loe Savvasāhūnam"

 

५. अस्य अर्थः भवति नमामि अरिहन्तॄन्, नमामि सिद्धान्, नमामि आचार्यान्, नमामि उपाध्यायान्, नमामि लोके सर्वसाधून् इति। अयं सर्वेषां जैनानां परमपावनः मन्त्रः अस्ति। प्रतिवर्षम् अप्रैल्-मासस्य नवमे दिनाङ्के जैनजनाः सामूहिकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपादिकं कृत्वा उत्सवम् आचरन्ति। अतः अस्य दिवसस्य 'नवकारमहामन्त्रदिवसः' इति ख्यातिः वर्तते। एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः (अरिहन्तारः, सिद्धाः, आचार्याः, उपाध्यायाः, सर्वे साधवः च) प्रणामं समर्पयति। वसुधैवकुटुम्बकम् इत्यस्य अनुरूपेण विश्वशान्त्यै कोटिशैः जनैः गीयमानः परमोमन्त्रः अयं णमोकारमन्त्रः।

जैनमतस्य प्रमुखाः सिद्धान्ताः – अहिंसा परमो धर्मः (मनसा, वाचा, कर्मणा च अहिंसापालनम्), अनेकान्तवादः (सत्यस्य अनेके पक्षाः भवन्ति), स्याद्वादः (प्रत्येकं वचनं सापेक्षं "स्यात्” इति रूपेण ग्राह्यम्), अपरिग्रहः (आवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयः) इत्यादयः। एतेषां दर्शनानां मध्ये – सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम्, सम्यक्चरित्रम् इति त्रीणि रत्नानि उच्यन्ते। तथा च प्राणिमात्रहिताय पञ्चमहाव्रतानि – सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च आचरितुं कल्याणकरम् इति निगद्यते।

हिन्दी-अनुवाद (Hindi Translation): 

इसका अर्थ है: अरिहंतों (शत्रुओं को जीतने वालों) को नमस्कार, सिद्धों (मुक्त आत्माओं) को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्यायों को नमस्कार, और संसार के समस्त साधुओं को नमस्कार। यह समस्त जैन धर्मावलंबियों का परम पवित्र महामंत्र है। प्रतिवर्ष 9 अप्रैल को जैन समाज सामूहिक रूप से इस मंत्र का जाप कर महोत्सव मनाता है। अतः इस दिन को 'नवकार महामंत्र दिवस' के रूप में जाना जाता है। यह मंत्र 'पंचपरमेष्ठी' को नमन करता है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना के अनुरूप विश्व-शांति के लिए करोड़ों लोगों द्वारा गाया जाने वाला यह णमोकार मंत्र सर्वश्रेष्ठ मंत्र है।
जैन दर्शन के प्रमुख सिद्धांत हैं: अहिंसा परमो धर्मः (मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन), अनेकांतवाद (सत्य के अनेक पहलू होते हैं), स्याद्वाद (प्रत्येक कथन सापेक्ष दृष्टिकोण पर आधारित होता है), और अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संचय न करना)। इस दर्शन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र—इन तीनों को 'त्रिरत्न' कहा गया है। समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए पंचमहाव्रतों—सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का आचरण अत्यंत कल्याणकारी बताया गया है।

English Translation:

​This means: "I bow to the Arihantas (conquerors of inner enemies), I bow to the Siddhas (liberated souls), I bow to the Acharyas (spiritual masters), I bow to the Upadhyayas (spiritual teachers), and I bow to all Sadhus (ascetics) in the universe." This is the holiest mantra for all Jains. Every year on April 9, Jains collectively chant this mantra and celebrate the festival, which is known as 'Navakar Mahamantra Divas'. This mantra pays homage to the Pancha Parameshti. Chanted by millions worldwide for universal peace in the spirit of Vasudhaiva Kutumbakam, this Namokar Mantra is truly supreme.

​The core tenets of Jainism include: Ahimsa Paramo Dharmah (non-violence in thought, word, and deed), Anekantavada (multiplicity of perspectives on truth), Syadvada (relativity of all verbal expressions), and Aparigraha (non-possessiveness beyond basic needs). Central to this philosophy are the Three Jewels (Triratna): Samyag Darshana (Right Faith), Samyag Jnana (Right Knowledge), and Samyag Charitra (Right Conduct). Furthermore, for the welfare of all beings, practicing the Five Great Vows (Pancha Mahavratas)—Satya (Truth), Ahimsa (Non-violence), Asteya (Non-stealing), Aparigraha (Non-possession), and Brahmacharya (Chastity)—is proclaimed as the path to supreme good.

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 10 णमो अरिहन्ताणम् Solution 

अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (प्रश्नोत्तराणि / Questions and Answers)

​१. एकपदेन उत्तरं लिखत -

​(क) ऋषभेण निर्मितस्य नगरस्य नाम किम्?

उत्तरम्: विनिता (विनितानगरम्)

​(ख) ऋषभस्य प्रसिद्धे द्वे कन्ये के?

उत्तरम्: ब्राह्मी सुन्दरी च

​(ग) कस्यां लिप्यां नैकानि शास्त्राणि लिपिबद्धानि?

उत्तरम्: ब्राह्मीलिप्याम्

​(घ) विनिता नामकं राज्यं ऋषभः कस्मै समर्पितवान्?

उत्तरम्: भरताय

​(ङ) ऋषभः बाहुबलिने किं राज्यं प्रदत्तवान्?

उत्तरम्: तक्षशिलाम्

​(च) प्रजाः भिक्षायां कानि वस्तूनि यच्छन्ति स्म?

उत्तरम्: आभरणानि अनर्घवस्तूनि च


​२. पूर्णवाक्येन प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत -

​(क) देशे काः समस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता?

उत्तरम्: जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः देशे सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता।

​(ख) महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्?

उत्तरम्: महाराजः कृषिकार्ये, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणे, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणे, पशूनां पालने, गृहोपयोगिवस्तूनां पात्र-गृह-नगरनिर्माणादिषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्।

​(ग) ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?

उत्तरम्: राजप्रासादे नृत्यकलां प्रदर्शयन्त्याः कस्याश्चित् नर्तक्याः सहसा भूमौ पतित्वा मरणम् ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना आसीत्।

​(घ) ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत्?

उत्तरम्: तस्य प्रपौत्रेण श्रेयांसेन पानार्थं दत्तेन इक्षुरसेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः अभवत्।

​(ङ) ऋषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान्?

उत्तरम्: ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।

​(च) जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान्?

उत्तरम्: ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका चेति क्रमं (जैनसङ्घम्) रचितवान्।


​३. समस्तपदानि लिखत -

उत्तरम् :

                    विग्रहवाक्यम्              समस्तपदम्

(क) महान् च असौ राजा च            महाराजः

(ख) प्रजानां सुखम्                            प्रजासुखम्

(ग) मूलाः समस्याः                        मूलसमस्याः

(घ) भोजनस्य निर्माणम्                    भोजननिर्माणम्

(ङ) आर्थिकी स्थितिः                    आर्थिकस्थितिः

(च) प्राप्तः आनन्दः येन सः             प्राप्तानन्दः

(छ) विधिना लिखितम्                     विधिलिखितम्

(ज) गृहं गृहं प्रति                          प्रतिगृहम्

(झ) ब्राह्मीनामा लिपिः                    ब्राह्मीलिपिः


४. वाक्यानि उदाहरणानुसारं परिवर्तयत (कर्मवाच्यात् कर्तृवाच्ये) -

यथा: जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम्।  जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः।  

उत्तरम्

(क) महाराजेन राज्यं समर्पितम्।                      महाराजः राज्यं समर्पितवान्।  

(ख) केनापि तत् न चिन्तितम्।                          कोऽपि तत् न चिन्तितवान्।  

(ग) ऋषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः।     ऋषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान्।  

(घ) जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता।                     जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः।  

(ङ) ऋषभेण योजना कृता।                              ऋषभः योजनां कृतवान्।  



५. सन्धिं कुरुत -

उत्तरम्

(क) इति + अतः = इत्यतः (यण्-स्वरसन्धिः)  

(ख) च + इति = चेति (गुण-स्वरसन्धिः)  

(ग) देवस्य + अपि = देवस्यापि (दीर्घ-स्वरसन्धिः)  

(घ) तथा + एव = तथैव (वृद्धि-स्वरसन्धिः)  

(ङ) इति + एतादृशाः = इत्येतादृशाः (यण्-स्वरसन्धिः)  

(च) ब्राह्मीद्वारा + एव = ब्राह्मीद्वारैव (वृद्धि-स्वरसन्धिः)  

(छ) प्रस्थितः + अयम् = प्रस्थितोऽयम् (विसर्ग-उत्व-पूर्वरूपसन्धिः)  



५. अतिरिक्त-ज्ञानम् एवं गतिविधयः (स्वाध्यायान्मा प्रमदः)


जैनधर्मस्य चतुर्विंशतिः तीर्थङ्कराः (24 Tirthankaras):

(१) ऋषभदेवः (आदिनाथः) (२) अजितनाथः (३) सम्भवनाथः (४) अभिनन्दनाथः (५) सुमतिनाथः (६) पद्मप्रभुः (७) सुपार्श्वनाथः (८) चन्द्रप्रभुः (९) पुष्पदन्तः (सुविधिनाथः) (१०) शीतलनाथः (११) श्रेयान्सनाथः (१२) वासुपूज्यः (१३) विमलनाथः (१४) अनन्तनाथः (१५) धर्मनाथः (१६) शान्तिनाथः (१७) कुन्थुनाथः (१८) अरनाथः (१९) मल्लिनाथः (२०) मुनिसुव्रतः (२१) नमिनाथः (२२) नेमिनाथः (अरिष्टनेमिः) (२३) पार्श्वनाथः (२४) महावीरः (वर्धमानः)।  

जैनधर्मस्य प्रमुखतीर्थस्थानानि:  

सम्मेतशिखरम् (पारसनाथ पर्वतः, झारखण्डः)  

श्रवणबेलगोळः (कर्नाटकम्)  

पावापुरी (बिहारः)  

रैवतकः (गिरनारः) पर्वतः (गुजरातः)  

शत्रुञ्जयपर्वतः (पदलिप्तपुरम् - पालीताणा, गुजरातः)  

राजगृहम् (बिहारः)  

अयोध्या (उत्तरप्रदेशः)  

काशी (वाराणसी, उत्तरप्रदेशः)  

चम्पापुरम् (भागलपुर, बिहारः)  

हस्तिनापुरम् (उत्तरप्रदेशः)  

मिथिला (बिहारः)  

द्वारिका (गुजरातः)  


पञ्चमहाव्रतानि (गतिविधि-उत्तरम्):

१. अहिंसा (मनसा, वाचा, कर्मणा कस्यापि प्राणिनः पीडा न जननीया)

२. सत्यम् (सर्वदा हितकरं सत्यं च वक्तव्यम्)

३. अस्तेयम् (दत्तं विना परद्रव्यस्य अपहरणं न करणीयम्)

४. ब्रह्मचर्यम् (इन्द्रियाणां संयमनम्)

५. अपरिग्रहः (आवश्यकतायाः अधिकं धनादिकं न सङ्ग्रहणीयम्)  


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