Asamyukta Hasta Mudra Shloka । असंयुक्त हस्त मुद्रा का संस्कृत श्लोक 

Asamyukta Hasta Mudra Shloka । असंयुक्त हस्त मुद्रा का संस्कृत श्लोक

असंयुक्त हस्त मुद्रा का संस्कृत श्लोक (Asamyukta Hasta Mudra Shloka) :


भारतीय नृत्यशास्त्र, विशेषकर नाट्यशास्त्र में असंयुक्त हस्त मुद्राओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। असंयुक्त हस्त वे होते हैं जिनमें एक हाथ का प्रयोग किया जाता है।

असंयुक्त हस्त मुद्रा – संस्कृत श्लोक :


त्रिपताकश्चतुष्पताक अर्धचन्द्रोऽरालकः।
शुकतुण्डः कपित्थश्च मृगशीर्षोऽथ कङ्कणः॥

अलपद्मश्च चन्द्रश्च मुकुलश्च ततोऽपरः।
तम्रचूडस्त्रिशूलश्च सिंहमुखोऽथ कङ्कुलः॥

अर्धपुष्पः सन्दंशो मुष्टिश्च शिखरस्तथा।
कपोतश्चेत्यसंयुक्ता हस्ताः स्युर्नाट्ययोगतः॥

हिंदी अर्थ : नाट्यशास्त्र के अनुसार एक हाथ से बनने वाली जिन मुद्राओं का प्रयोग किया जाता है, उन्हें असंयुक्त हस्त मुद्रा कहा जाता है।

इनमें प्रमुख रूप से—

त्रिपताक, चतुष्पताक, अर्धचंद्र, अराल, शुकतुंड, कपित्थ, मृगशीर्ष, कंकण, अलपद्म, चंद्र, मुकुल, ताम्रचूड़, त्रिशूल, सिंहमुख, कंगुल, अर्धपुष्प, सन्दंश, मुष्टि, शिखर और कपोत आदि मुद्राएँ आती हैं।


👌 असंयुक्त हस्त मुद्राओं का महत्व :

➥ शास्त्रीय नृत्य (भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी आदि) में अत्यंत उपयोगी।

➥ भाव, कथा और अर्थ को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं।

➥ अभिनय को सजीव और प्रभावशाली बनाती हैं।

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