Class 7 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation ईशावास्यम् इदं सर्वम् | NCERT Hindi Translation for Class 7 Sanskrit Deepakam दीपकम्


Class 7 Sanskrit Chapter 7 Hindi Translation ईशावास्यम् इदं सर्वम् | NCERT Hindi Translation for Class 7 Sanskrit Deepakam दीपकम्

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Class 7 Sanskrit Chapter 7 Summary Notes ईशावास्यम् इदं सर्वम्

ईशावास्यम् इदं सर्वम् पाठ का परिचय (Introduction of the Lesson)

यह पाठ प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकशिपु की प्रसिद्ध कथा पर आधारित है। हिरण्यकशिपु स्वयं को ईश्वर मानता था और चाहता था कि सभी उसकी ही पूजा करें, लेकिन प्रह्लाद केवल भगवान विष्णु की भक्ति में लीन रहता था। इससे क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार की यातनाएँ दीं, फिर भी वह अपनी भक्ति से कभी विचलित नहीं हुआ।

प्रह्लाद का अटूट विश्वास था कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान हैं। एक दिन हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर स्तंभ की ओर संकेत करते हुए पूछा कि क्या तुम्हारा भगवान इसमें भी है? उसी क्षण भगवान नरसिंह स्तंभ से प्रकट हुए और हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे भक्त की ईश्वर सदैव रक्षा करते हैं। वे हर स्थान पर उपस्थित हैं और उचित समय पर दुष्टों का विनाश कर अपने भक्तों को संरक्षण प्रदान करते हैं।


                                    पाठ : ईशावास्यम् इदं सर्वम् – शब्दार्थ एवं सरलार्थ

अध्यापिका – अयि भोः बालाः ! किं भवन्तः जानन्ति ‘ईश्वरः कुत्र अस्ति’ ?

छात्रा – मान्ये! ईश्वरः देवालये भवति ।

अध्यापिका – वत्साः! ईश्वरः न केवलं देवालये अपितु सर्वत्र व्याप्तः अस्ति ।

छात्रः – तत् कथम् आचार्ये?

अध्यापिका – किम् “ ईशावास्यमिदं सर्वं ” इति न श्रुतवन्तः ?

छात्र: – नैव आर्ये! तस्य कः अर्थः ?

अध्यापिका – एतत् सर्वं जगत् ईशेन व्याप्तम् अस्ति । ईश्वरः सर्वत्र अस्ति इति अर्थः ।

छात्रा – मान्ये ! ईश्वरः वृक्षे, कक्षायां शिलायां, क्रीडाङ्गणे चापि अस्ति किम् ?


अध्यापिका – आम्, ईश्वरः सर्वत्र अस्ति । पुरा कश्चन भवादृशः अल्पवयस्क ः बालः ‘ईश्वरः सर्वत्र अस्ति’ इति दर्शितवान् । इदानीं तमेव प्रसङ्गं पठामः । अनन्तरम् अभिनयसहितं नाटकमपि करिष्यामः ।


शब्दार्थाः (Word Meanings) : देवालये – मंदिर में (In the Temple), ईशावास्यम् – ईश्वर से व्याप्त (Pervaded by God), सर्वम्-सब कुछ (Everything), क्रीडाङ्गणे – खेल के मैदान में (In the sports ground), पुरा – प्राचीन काल में (पहले) (In ancient times), कश्चन – कोई व्यक्ति (Someone), अल्पवयस्कः बालः – छोटा बच्चा (Little child)।


हिंदी अनुवाद(Hindi Translation):  -

अध्यापिका – अरे बच्चो ! क्या आप जानते हैं ‘ईश्वर कहाँ हैं ?

छात्रा – हम यह मानतें हैं ईश्वर मंदिर में होता है।

अध्यापिका – बच्चो ! ईश्वर केवल मंदिर में ही नहीं बल्कि सब जगह व्याप्त है।

छात्र – वह कैसे आचार्या?

अध्यापिका – ‘ईश्वर सब जगह व्याप्त है’, क्या आपने नहीं सुना ?

छात्र – नहीं, अध्यापिका जी! उसका क्या अर्थ है ?

अध्यापिका – यह सारा संसार ईश्वर के द्वारा ही व्याप्त है। इसका अर्थ है- ‘ईश्वर सब जगह है ।’

छात्रा – मानते हैं! ईश्वर ‘पेड़ पर, कमरे में, चट्टानों पर (पत्थर में) और खेल के मैदान में भी है क्या?

अध्यापिका – हाँ, ईश्वर सब जगह है। प्राचीन काल में आपके जैसा एक छोटा बच्चा ” भगवान सब जगह है ” उसने ऐसा दिखाया है। अब उसी प्रसंग को पढ़ते हैं। बाद में अभिनय सहित नाटक भी करेंगे।
 

                                                        (हिरण्यकशिपोः सभा)

राजभटः – अयि भोः सावधानाः तिष्ठन्तु । राजाधिराजः राजगम्भीर: त्रैलोक्याधिपतिः देवाधिदेवः दैत्यराज हिरण्यकशिपुः आगच्छति।

सभासदः – विजयतां महाराज! विजयताम् । विजयतां महाराज! विजयताम्।

हिरण्यकशिपुः – ह ह ह ह … (अट्टहासेन सह) अहम् एव सर्वशक्तिमान् अस्मि । अहम् अमरः अस्मि ।

मन्त्री – सत्यं दैत्यराज! सुराः असुराः यक्ष- गन्धर्व – किन्नराः भवतः सर्वे भीताः तिष्ठन्ति ।

दैत्यपुरोहितः – भगवन्! देशे सर्वत्र भवतः एव पूजा भवति । अन्यदेवतानाम् पूजाराधनं न भवति । इतः परं यज्ञभागादिकम् अपि देवेभ्यः न केऽपि दास्यन्ति ।

हिरण्यकशिपुः – साधु साधु। अयि भोः मन्त्रिन् ! सर्वत्र जनाः मामेव ध्यायन्ति खलु !

मन्त्री – देव! सर्वत्र भवतः एव नामकीर्तनं भवति, किन्तु…… (अधोमुखः मौनं तिष्ठति । )

हिरण्यकशिपुः – (सक्रोधम्) आः! जानामि जानामि । भवान् मम पुत्रस्य विषये वक्तुम् इच्छति खलु ।

मन्त्री – (मन्दध्वनिना) सत्यं देव !

हिरण्यकशिपुः – मम पुत्रकः एव मम शत्रुः अस्ति । कुलकलङ्कः सः प्रह्लादः अहर्निशं मम शत्रोः हरेः गुणगानं करोति ।

सेनापतिः – स्वामिन्! गजस्य पद-दलनेन अपि सः जीवति ।

हिरण्यकशिपुः – अहो महदाश्चर्यम्!

सेनापतिः – भवदाज्ञया वयम् उत्तुङ्गशिखरात् तं पातितवन्तः । तथापि सः न मृतः ।

मन्त्री – रज्ज्वा बद्ध्वा समुद्रमध्ये क्षिप्तवन्तः । तथापि

हिरण्यकशिपुः – (हस्तौ मर्दयन् सक्रोधम्) आ…. किं करवाणि, किं करवाणि एतस्य । (किञ्चिद् विचिन्त्य) आस्तां तावत् । उपायः मया चिन्तितः । द्रक्ष्यामि सः कथं जीविष्यति इति । (वदन् सभातः निर्गतः ।) ( सर्वे निष्क्रान्ताः)


शब्दार्था: (Word Meanings) : राजगम्भीरः – राजाओं में कुशलतम (The best amongst the Kings), विजयताम् – विजयी होवे (Let (him) be victorious), सर्वशक्तिमान् – सबसे अधिक शक्तिशाली (All powerful), यक्ष:- यक्ष, कुबेर के सेवक (Yakshas (types of Demi Gods)), गन्धर्वः – गन्धर्व (एक तरह के पौराणिक उपदेवता जो स्वर्ग में गाने-बजाने का काम करते हैं (Gandharvas (type of Demi-God), किन्नराः – किन्नर (एक प्रकार की देवताओं की जाति विशेष (Kinnaras (type of Demi-Gods), यज्ञभागादिकम् यज्ञ आहुति (Yajna offering), दास्यन्ति – देंगे ( Shall give ), ध्यायन्ति – ध्यान करते हैं (Meditate), खलु -निश्चित रूप से (Indeed), नामकीर्तनं-नाम जपना (Singing the name in praise), सक्रोधम् – क्रोध सहित (With anger), कुलकलङ्कः – वंश को अपमानित करने वाला (One who brings ill-fame to the family), अहर्निशं – दिन-रात (Day and night), पद-दलनेन – पैरों के द्वारा कुचलने से (Stamped (by foot), उतु शिखरात् – ऊँचे पर्वत के शिखर से (From the peak of a high mountain), मृत: – मरता है (Dies), रज्ज्वा – रस्सी के द्वारा (By the rope), बद्ध्वा – बाँधकर (Having tied), क्षिप्तवन्त:-फेंक दिया ((They) Threw), विचिन्त्य – सोचकर (Having thought), द्रक्ष्यामि – देखूँगा (Shall see), निष्क्रान्ताः- निकल जाते हैं (Went one) ।
 


हिंदी अनुवाद(Hindi Translation):  -

(हिरण्यकशिपु की सभा)

राजभट – अरे सब सावधान होकर बैठो। राजाओं के राजा, राजाओं में सबसे कुशल, तीनों लोकों के स्वामी, देवताओं के देवता, दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु आते हैं।

सभासद – जय हो! महाराज की जय हो, जय हो! महाराज की जय हो ।

हिरण्यकशिपु – हा हा हा हा ….. (जोर की हँसी के साथ) मैं ही सबसे ज़्यादा शक्तिशाली हूँ। मैं ही अमर हूँ ।

मन्त्री – सच है दैत्यराज ! देवता, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर आपसे सब डरते हैं।

दैत्यपुरोहित – भगवन्! देश में सब जगह आपकी ही पूजा होती है। दूसरे देवताओं की पूजा आराधना नहीं होती। यहाँ से यज्ञ की आहुति भी दूसरे देवताओं को नहीं दी जाएगी।

हिरण्यकशिपु – वाह-वाह! अरे हे मन्त्री ! निश्चित ही सब जगह लोग मेरा ही ध्यान करते हैं।

मन्त्री – स्वामी! सब जगह आपके नाम का ही जप होता है, परन्तु … (नीचे मुँह करके चुप खड़ा रहता है।)

हिरण्यकशिपु – (क्रोध से) आह! जानता हूँ, जानता हूँ। तुम मेरे पुत्र के विषय में बोलना चाहते हो ।

मन्त्री – (धीरे से) सच है स्वामी !

हिरण्यकशिपु – मेरा पुत्र ही मेरा शत्रु है। कुल का कलंक वह प्रह्लाद ही रात – दिन मेरे शत्रु विष्णु का गुणगान करता है।

सेनापति – स्वामी! हाथी के पैर से कुचले जाने पर भी वह जिंदा है।

हिरण्यकशिपु – अहो! महान् आश्चर्य है ।

सेनापति – आपकी आज्ञा से हमने उसे ऊँचे पहाड़ की चोटी से भी गिराया। तो भी वह नहीं मरा।

मन्त्री – रस्सी से बाँधकर समुद्र के बीच में फेंका। तो भी….

हिरण्यकशिपु – (गुस्से में हाथों को मसलते हुए) आह… क्या करूँ, क्या करूँ इसका । (कुछ सोचकर) अच्छा तो मैंने उपाय सोच लिया। देखूँगा वह कैसे जिंदा रहेगा । (ऐसे बोलता हुआ सभा से निकल गया)

(सब निकल जाते हैं)




➤  हिरण्यकशिपुः – अयि भोः अनुजे ! होलिके!! होलिके!!! कुत्र असि त्वम्? इत इतः।

होलिका – प्रणमामि भ्रातः! कथं मां स्मरसि ? किमर्थं दुःखितः भासि ? किं कारणम् अस्य दुःखस्य ? वद भ्रातः ! वद ।

हिरण्यकशिपुः – अनुजे! त्वं जानासि एव, मम पुत्रः एव मम शत्रुः जातः । (क्षीणस्वरेण सर्वं वृत्तान्तं कथयति)

होलिका – भ्रातः! अलं चिन्तया, ब्रह्मणः वरप्रसादात् अग्निः मां न दहति, अहं ज्वालयिष्यामि प्रह्लादम् । आश्वस्तो भव । (होलिका प्रह्लादकक्षं प्रविशति)

प्रह्लादः – (होलिकां दृष्ट्वा ) पितृष्वसः ! (आलिङ्गति)

होलिका – अयि भोः प्रह्लाद ! आगच्छ, आवां क्रीडिष्यावः।

प्रह्लादः – (सहर्षम्) बाढम्।

होलिका – प्रथमं त्वं माम् अन्विष्यसि ।

प्रह्लादः – (सहर्षम्) साधु ।

(होलिका प्रह्लादस्य नेत्रयोः पट्टिकां बध्नाति । किञ्चित् दूरे अग्निं प्रज्वलयति । स्वयम् अग्नौ उपविश्य करतलध्वनिना आह्वयति ।)

होलिका – अत्र, अहम् अत्र अस्मि इत इतः ।

प्रह्लादः – अहो! तापम् अनुभवामि खलु अहम्। (प्रह्लादः अग्निकुण्डस्य समीपं गच्छति । होलिका तम् अङ्के स्वीकरोति।)

होलिका : ह…..ह…..ह… प्रह्लाद ! अहं तव मृत्युः अस्मि । अहं त्वाम् अग्नये दास्यामि ।

प्रह्लादः – (करौ बद्ध्वा हरिं स्मरति) ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय….
(नारायणस्य कृपया प्रह्लादः रक्षितः भवति । ब्रह्मणः वरस्य दुरुपयोगकारणात् अग्निः होलिकाम् एव ज्वालयति। होलिका अग्निदाहात् आर्तनादं कुर्वती प्राणान् त्यजति ।)

दैत्याः – अहो किमेतत् ? होलिका एव दग्धा ।



शब्दार्था: (Word Meanings) : भासि – प्रतीत होते हो (Seem), वृत्तान्तम् – घटना को (Anecdote), अलं चिन्तया –चिन्ता मत करो (Do not worry), पितृष्वसः – हे बुआ (Hey! Paternal sister), बाढम् – अवश्य (Certainly), अन्विष्यसि – खोजोगे ((You) shall search)), प्रज्वलयति- जलाता है (Kindles), करतलध्वनिम् – ताली बजाना (Clap sound), इत इत: – इस ओर (This way), आर्तनाद – चिल्लाकर रोना (Cry for help)।
 

हिंदी अनुवाद(Hindi Translation):  -

हिरण्यकशिपु
– अरे ओ ! छोटी बहन होलिका ! होलिका ! कहाँ हो तुम, यहाँ !

होलिका – भाई प्रणाम करती हूँ। मुझे कैसे याद कर रहे हो? किसलिए दुखी मालूम होते हो ? इस दुख का क्या कारण है ? बोलो भाई ! बोलो।

हिरण्यकशिपु – सत्य है छोटी बहन ! तुम जानती ही हो, मेरा पुत्र ही मेरा शत्रु हो गया है। (दुखी स्वर में सारी घटना बताता है।)

होलिका – भाई! चिन्ता मत कीजिए, ब्रह्मा के वरदान से आग मुझे नहीं जलाती है, मैं प्रह्लाद को जलाऊँगी। निश्चित हो जाओ।

(होलिका प्रह्लाद के कमरे में प्रवेश करती है )

प्रह्लाद – (होलिका को देखकर) बुआ ! (गले लगता है)

होलिका – अरे प्रह्लाद! आओ, हम दोनों खेलेंगे।

प्रह्लाद – (खुशी से) अच्छा!

होलिका – पहले तुम मुझे ढूँढ़ोगे (खोजोगे) ।

प्रह्लाद – (खुशी से) अच्छा।

(होलिका प्रह्लाद के दोनों आँखों पर पट्टी बाँधती है। कुछ दूरी पर आग जला देती है। खुद आग में बैठकर ताली बजा कर बुलाती है)

होलिका – यहाँ, मैं यहाँ हूँ, इधर-इधर से।

प्रह्लाद – ओह! निश्चित ही मैं गर्मी का अनुभव कर रहा हूँ। (प्रह्लाद आग के कुण्ड के पास जाता है। होलिका उसे गोद में ले लेती है।)

होलिका – ह…..ह…..ह… (हँसते हुए) प्रह्लाद ! मैं तेरी मृत्यु हूँ। मैं तुझे आग में जला दूँगी ।

प्रहलाद – (हाथ बाँधकर विष्णु को याद करता है) ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
(नारायण की कृपा से प्रह्लाद की रक्षा हो जाती है। ब्रह्मा के वरदान के दुरुपयोग के कारण आग होलिका को ही जला देती है। होलिका चिल्लाती हुई प्राण त्याग देती है।)

सब दैत्य – आह! यह क्या हुआ? होलिका ही जल गई।



➤  (ततः प्रविशति प्रह्लादः हिरण्यकशिपुः च)

प्रह्लादः – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय…
हिरण्यकशिपुः – (सक्रोधं दन्तान् विघट्टयन्) आः, नारायण ! नारायण ! दर्शय, कुत्र अस्ति तव नारायण : ?
प्रह्लादः – तात ! श्रीहरिः तु सर्वत्र अस्ति ।
हिरण्यकशिपुः – किं ते हरिः अत्र अस्ति ? तत्र अस्ति ? सोपानेषु अस्ति ? अथवा अस्मिन् स्तम्भे अस्ति?
प्रह्लादः – नूनं हरिः सर्वत्र अस्ति । अस्मिन् स्तम्भे अपि अस्ति ।
हिरण्यकशिपुः – आः, मूढ! पश्य पश्य, अनेन खड्गेन स्तम्भं भक्ष्यामि ।
प्रह्लादः – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय ….
(हिरण्यकशिपुः स्तम्भं प्रहरति । महता गर्जनेन नृसिंहः स्तम्भात् बहिः आगच्छति )
नृसिंहः – (क्रोधेन सिंहगर्जनं कुर्वन्) रे पापात्मन्! अद्य तव मृत्युः सन्निहितः । कालोऽहं तव ।
हिरण्यकशिपुः – (आदौ आश्चर्येण पश्यति पुनः कथयति) आः, असत्यवादिन् ! अहं ब्रह्मदेवात् वरं प्राप्य अमरः अस्मि । त्वाम् एव मृत्युलोकं प्रेषयिष्यामि ।
(तस्मिन् सन्ध्याकाले नृसिंह: हिरण्यकशिपुं केशेषु गृहीत्वा कर्षति)
नृसिंहः – रे मूर्ख! अधम ! त्वं ब्रह्मदेवात् वरं प्राप्तवान् असि तं वरम् अनुल्लङ्घ्य अहं त्वां मारयिष्यामि । (राजभवनस्य अन्तः बहिः च एतयोः मध्ये – विद्यमानायां देहल्यां तं गृह्णाति)
मूढ! पश्य, न त्वमसि भुवि; न च स्वर्गे, न वा पाताले; न च आकाशे, न गृहाभ्यन्तरे बहिर्भागे वा, नायं दिवसो न वा रात्रिः, नाहं मनुष्यो न च पशुः । न अस्त्रेण न च शस्त्रेण, निजनखैः तव वक्षःस्थलं विदीर्यं हनिष्यामि ।
हिरण्यकशिपुः – (भीत:) प्रभो ! क्षमस्व मां, क्षमस्व ।
नृसिंह: – अधम! न तेऽपराधः क्षम्यः । (सिंहगर्जनं कुर्वन् हिरण्यकशिपोः वक्षःस्थलं भिनत्ति ।)
अध्यापिका – एवं बालः प्रह्लादः ईश्वरः सर्वत्र अस्ति इति दर्शितवान् । अत एव उच्यते, ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम् इति ।’




शब्दार्थाः (Word Meanings) : भक्ष्यामि – तोड़ दूँगा (I shall break), सन्निहितः – पास आया (Came near), कालोऽहम् – मैं मृत्यु हूँ (I am death), मृत्युलोकम् – यमलोक (Realm of death), कर्षति – खींचता है (Pulls), देहल्याम् – देहरी में (Threshold), निजनखैः – अपने नाखूनों से (By own nails), अधम – हे नीच (O’ Low calibre person !), क्षम्य: – क्षमा करने योग्य (Worthy of forgiving),वक्षःस्थलम् – छाती (Chest), भिनत्ति – चीरता है (Tears apart)।



हिंदी अनुवाद(Hindi Translation):  -

(इसके बाद प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु प्रवेश करते हैं)

प्रह्लाद – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय ……..

हिरण्यकशिपु – (गुस्से से दाँतों को पीसते हुए) आह, नारायण ! नारायण ! दिखाओ, कहाँ है तुम्हारा नारायण?

प्रह्लाद – पिताजी, श्री विष्णु तो सब जगह हैं।

हिरण्यकशिपु – क्या तुम्हारे, विष्णु यहाँ हैं? वहाँ हैं? सीढ़ियों में हैं? अथवा इस खम्भे में हैं।

प्रह्लाद – निश्चित ही भगवान सब जगह है। इस खम्भे में भी है।

हिरण्यकशिपु – ओह! मूर्ख! देखो, देखो, इस तलवार से खम्भे को तोड़ दूँगा ।

प्रहलाद – ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय ।

(हिरण्यकशिपु स्तम्भ पर प्रहार (मारता) करता है। गर्जना करते हुए नरसिंह खंभे से बाहर आते हैं ।)

नरसिंह – (गुस्से में शेर की गर्जना) रे पापी ! आज तेरी मृत्यु पास आई है। मैं तुम्हारी मृत्यु हूँ ।

हिरण्यकशिपु – (शुरू में आश्चर्य से देखता है फिर कहता है) अरे झूठ बोलने वाले ! मैं ब्रह्मदेव से वरदान पाकर अमर हूँ। तुमको यमलोक भेजूँगा ।

(शाम के समय में नरसिंह हिरण्यकशिपु को बालों से पकड़कर खींचते हैं। )

नरसिंह – रे नीच ! तुमने ब्रह्मदेव से जो वरदान प्राप्त किया, उसी वरदान के उल्लंघन किए बिना मैं तुमको मारूँगा । (राजभवन के अन्दर और बाहर इन दोनों के बीच में देहरी पर उसको पकड़ते हैं ।)
मूर्ख! देखो न तुम पृथ्वी पर हो और न स्वर्ग में हो, न पाताल में हो और न आकाश में, न घर के अंदर, न घर के बाहर, ना यह दिन है और न रात और न मैं मनुष्य हूँ और न पशु हूँ। न अस्त्र से न शस्त्र से, अपने नाखूनों से तुम्हारी छाती चीर दूँगा ।

हिरण्यकशिपु – (डरकर) हे प्रभो ! क्षमा करो, मुझे क्षमा करो।

नृसिंह – हे नीच ! तुम्हारा अपराध क्षमा करने योग्य नहीं है । (शेर की गर्जना करते हुए हिरण्यकशिपु की छाती को चीरते हैं।)

अध्यापिका – इसी प्रकार बालक प्रहलाद ने ईश्वर सर्वत्र है यह दिखाया है। इसलिए कहा गया है। ईश्वर सभी जगह हैं।

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