Class 8 Sanskrit Chapter 11 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) | Class 8 Sanskrit Deepakam Translation all Chapters


Class 8 Sanskrit Chapter 11 Hindi Translation सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) | Class 8 Sanskrit Deepakam Translation all Chapters

Here are NCERT Class 8 Sanskrit  notes and Chapter 11 “सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)” with Hindi translation, summary, and detailed explanation, designed to simplify complex chapters and make them easier to understand. 
Class 8 Sanskrit Chapter 11 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

प्रस्तुत नाटक मृच्छकटिकम् से लिया गया है, जिसके रचयिता राजा शूद्रक हैं। इस नाटक में राजा और राज्य की रक्षा के लिए सेवक के कर्तव्य तथा उसकी सेवा-भावना की चरम सीमा का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। साथ ही, राजा भी अपने सेवक और उसके परिवार की रक्षा हेतु अपना सर्वस्व त्याग करने के लिए तत्पर दिखाई देता है।

यह शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक नाटक एक राजा और उसके सेवक की कथा पर आधारित है। इसमें कर्तव्यपालन, निष्ठा, प्रेम और सेवा-भावना जैसे उच्च आदर्शों को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह नाटक अत्यंत रोचक और प्रेरणास्पद बन जाता है।

कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 — ‘सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)’ का यह अंश विद्यार्थियों को त्याग और कर्तव्य के महत्व का गहरा संदेश देता है।


(सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः):  मूलपाठः, शब्दार्थाः, अन्वयाः, सरलार्थाः)

(1) वीरवरः नाम कश्चित् राजपुरुषः राज्ञः शूद्रकस्य सेवकरूपेण नियुक्तः। तस्मै वेतनं सुवर्णशतचतुष्टयं दीयते। प्राप्तवेतनस्य अर्धं सः देवकार्ये नियोजयति । एकचतुर्थांशं दरिद्रेभ्यः वण्टयति। अवशिष्टं च एकचतुर्थांशं स्वपत्न्याः हस्ते अर्पयति। स्वखड्गम् आदाय अहर्निशं राजद्वारे रक्षकरूपेण स्थित्वा सः सेवां करोति । एकदा रात्रौ राज्ञः आदेशेन कञ्चित् करुणक्रन्दनध्वनिम् अनुसृत्य सः नगराद् बहिः गच्छति, एकां दिव्याभरणभूषितां कामपि रोदनपरां सुन्दरीं च पश्यति । तस्याः रोदनस्य कारणं पृष्ट्वा जानाति यत् सा राज्ञः शूद्रकस्य राजलक्ष्मी अस्ति।

शब्दार्थाराज्ञः – राजा के, सुवर्णशतचतुष्टयं – चार सौ सोने की मुद्रा, अर्धं – आधा, एकचतुर्थांशं – एक चौथाई अंश , वण्टयति – बाँटता है, अवशिष्टं – बचा हुआ, स्वखड्गम् – अपनी तलवार, आदाय – लेकर, अहर्निशं – दिन-रात, रात्रौ – रात में, कञ्चित् – (कम् + चित्) कोई, अनुसृत्य – अनुसरण करके, कामपि – (काम् + अपि) किसी को भी, पृष्ट्वा – पूछकर ।

हिंदी अनुवाद ( Hindi Translation ):- वीरवर नामक कोई राजपुरुष राज शूद्रक के सेवक के रूप से नियुक्त हुआ । उसको चार सौ सुवर्ण वेतन दिया जाता। प्राप्त वेतन का आधा वह देवकार्य में लगाता । एक चौथाई अंश दरिद्रों में बाँटता है और शेष भाग अपनी पत्नी के हाथों में अर्पित करता है। अपनी तलवार लेकर दिन-रात राजद्वार पर रक्षक रूप से स्थित होकर वह सेवा करता है। एक बार राजा के आदेश से किसी के करुण क्रन्दन (रोने) की ध्वनि का अनुसरण कर वह नगर से बाहर जाता है, एक दिव्य आभूषण से सजी हुई किसी रोती हुई सुन्दरी को देखता है। उसके रोने का कारण पूछकर जानता है कि वह राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी है ।



(2) तस्याः वचनात् शूद्रकस्य आयुः केवलं दिनत्रयम् एव अस्ति इति ज्ञात्वा तस्य दीर्घायुषः उपायं पृच्छति। ततः राज्ञलक्ष्मीः अतीव दुःसाध्यम् उपायं सूचयति । तस्याः अनुसार यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु देव्यै सर्वमङ्गलायै उपहाररूपेण समर्पयति, तर्हि तस्य राजा चिरं वर्षशतं जीविष्यति, राजलक्ष्मीरपि तेन सह सुखं स्थास्यति इति । एवं कठिनम् उपायं संसूच्य राजलक्ष्मीः वीरवरं किंकर्तव्यमूढं कृत्वा अदृश्या भवति । गुप्ततया वीरवरम् अनुसरन् राजापि तयोः संवादं शृणोति । 

शब्दार्थाः दिनत्रयम् – तीन दिन, ज्ञात्वा – जानकर, दीर्घायुषः – लम्बी आयु का, दुःसाध्यम् – अति कठिन, स्वस्य – अपनी, समर्पयति – समर्पित करता है, तर्हि – तो, वर्षशतं – सौ वर्ष, राजलक्ष्मीरपि – (राजलक्ष्मीः + अपि) राजलक्ष्मी भी, स्थास्यति – रहेगी, संसूच्य – सूचित कर, गुप्ततया – गुप्त रूप से, अनुसरन् – अनुसरण करते हुए, तयोः – उनके, शृणोति – सुनता है।

हिंदी अनुवाद ( Hindi Translation ):- उसके बचन से शूद्रक की आयु केवल तीन दिन ही है, ऐसा जानकर उसकी लम्बी आयु का उपाय पूछता है। फिर राजलक्ष्मी अति कठिन उपाय बताती है। उसके अनुसार यदि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु देवी सर्वमङ्गला को उपहार रूप से समर्पित करता है, तो उनका राजा सौ वर्ष जिएगा। राजलक्ष्मी भी उसके साथ सुख से रहेंगी। इस प्रकार कठिन उपाय सूचित कर राजलक्ष्मी वीरवर को असमंजस में देख करके अदृश्य हो जाती है। गुप्त रूप से वीरवर का पीछा करते हुए राजा भी उन दोनों के संवाद सुनता है।
Class 8 Sanskrit Chapter 11 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
 

(3) अथ राजपुत्रो वीरवरो स्वावासं गत्वा निद्रालसां पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत् अखिलराजलक्ष्मीसंवादं च अवर्णयत्।
शक्तिधरः (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) हे पितः! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु । तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः। धन्योऽहं स्वामिजीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः । तत् कोऽधुना विलम्बस्तात ? एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्ञश्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः : परमश्लाघ्यः।
यतः-
धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ १ ॥

वेदरता – यद्येवम् अस्मत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत् ?
वीरवती – धन्याहं यस्या ईदृशो जनको भ्राता च । तत् कथं विलम्ब्यते? एष एव गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः।
(ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गता:)
वीरवरः – (देवीपूजां विधाय) भगवति! प्रसीद, विजयतां महाराजः शूद्रकः, गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः ।
वीरवरः – (स्वगतम्) कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रसमर्पणेन । अधुना पुत्रवियुक्तस्य मे जीवनं निष्फलम् ।
(तत: सः आत्मानमपि देव्यै समर्पितवान्। ततस्तस्य पत्न्या दुहित्रा च तदेवाचरितम्। राजा शूद्रकोऽपि तेषां सर्वेषां सर्वमेतद् आचरितम् तददृश्य एवालोकयत् ।) 


शब्दार्था: स्वावासं – ( स्व + आवासं) अपने घर, निद्रालसां -नींद से अलसाई, दुहितरञ्च – (दुहितरम् + च) और पुत्री को, प्राबोधयत् – जगाया, अवर्णयत्- वर्णन किया, जानाम्यहं – ( जानामि अहम् ) मैं जानता हूँ, धन्योऽहं – (धन्यः + अहम् ) मैं धन्य ( हूँ), कोऽधुना – (क: + अधुना) कौन अब, विलम्बस्तात – ( विलम्बः + तात) पिता देर ( क्यों ), विनियोग – नियुक्ति, परमश्लाघ्यः – अत्यन्त प्रशंसनीय, जीवितञ्चैव – ( जीवितम् + च + एव) और जीवन ही, परार्थे – दूसरों के लिए, उत्सृजेत् – छोड़ना चाहिए, सन्निमिते – बहुत अच्छा कारण होने पर, यद्येवम् – (यदि + एवम्) यदि ऐसा, नाचरितव्यं – आचरण नहीं करना चाहिए, निस्तारो – चुकाना, गृहीतस्वामिवर्तनस्य – ग्रहण किए गए स्वामी के वेतन का, आयतनं – परिसर, विधाय – करके, गृह्यतामेष – (गृह्यताम् + एषः) यह ग्रहण करो, मद्दत: – (मत् + दत्त:) मेरे द्वारा दिया गया, स्वगतम् – मन में / स्वयं से, पुत्रवियुक्तस्य – पुत्र के वियोग के, आत्मानमपि – (आत्मानम् + अपि) स्वयं भी, समर्पितवान् – समर्पित हो गया, ततस्तस्य – ( (ततः + तस्य) फिर उसके, दुहित्रा – पुत्री द्वारा, तदेवाचरितम् – (तत् + एव + आचरितम्) वैसा ही किया गया, तददृश्य – (तत् + अदृश्य) वह अदृश्य ) ।

हिंदी अनुवाद ( Hindi Translation ):-  इसके बाद राजपुत्र वीरवर अपने घर जाकर नींद से अलसाई पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाया और राजलक्ष्मी का सारा संवाद सुनाया।

शक्तिधर – (वह सुनकर आनंद से) हे पिता ! मैं आपकी सर्वप्रिय वस्तु को जानता हूँ। तो वह मैं ही आपका प्रियतम हूँ, यह सर्वविदित है। मैं धन्य हूँ यदि स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए नियुक्त होऊँ। तो अब देर क्यूँ ? इस प्रकार के कर्म में राष्ट्र का और राजा के हित के लिए मेरा सब प्रयुक्त हो, अत्यत्न प्रशंसा के योग्य है। क्योंकि – बुद्धिमान को दूसरों के लिए धन और जीवन त्यागना चाहिए। श्रेष्ठ कारण होने पर विनाश निश्चित होने पर त्याग श्रेयस्कर है।

वेदरता – तो स्वामी के ग्रहण किए वेतन को कैसे चुकाया जाए? यह जो हमारे कुल का उचित आचरण नहीं है।

वीरवती – मैं धन्य हूँ जिसके ऐसे पिता और भाई हैं तो विलम्ब क्यूँ? यह ही स्वामी के ग्रहण वेतन के चुकाने का उपाय है।
 (फिर वे सभी सर्वमङ्गला के परिसर में गए ।)
वीरवर – (देवी की पूजा करके) भगवती ! प्रसन्न हो, महाराज शूद्रक की विजय हो, मेरा यह उपहार ग्रहण करो।
वीरवर: (स्वयं से/ मन में) स्वामी के ग्रहण किए वेतन का चुकता अपने पुत्र के समर्पण से किया गया। अब पुत्र के बिछोह (विरह) से मेरा जीवन निष्फल है।
(फिर उसने अपने को भी देवी को समर्पित कर दिया। फिर उसकी पत्नी और पुत्री द्वारा भी वैसा ही किया गया। राजा शूद्रक ने भी उन सभी का किया गया यह सब दृश्य ही देखा।)  

Class 8 Sanskrit Chapter 11 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)


(4) ततोऽसौ व्यचिन्तयत्-
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः ।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति ॥ २॥


तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् । (देवीं प्रति प्रकटयन्) हे मातः ! सर्वमङ्गले ! गृहाण मे सर्वस्वम्। नेष्टं मे राज्यं न च जीवितं।

देवी – (ततः प्रत्यक्षीभूतया भगवत्या सर्वमङ्गलया राज्ञः करं धृत्वा) वत्स ! प्रसन्ना भवामि त्वां, अलं साहसेन। नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति ।
राजा – (साष्टाङ्गं प्रणिपत्य) भगवति ! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा । यदि मयि कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुः शेषणापि प्रत्यावर्तेत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च । अन्यत्र मया यथाप्राप्ता गतिर्गन्तव्या जगदम्ब !
देवी – वत्स! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि । तद् गच्छ, विजयी भव । अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः।


शब्दार्था: मादृशाः – मेरे जैसे, क्षुद्रजन्तवः – छोटे जीव, सदृशो – जैसा, प्रयोजनम् – लक्ष्य / उद्देश्य, प्रकटयन् – प्रकट होते हुए, गृहाण – ग्रहण करो, प्रत्यक्षीभूतया – प्रत्यक्ष रूप से उपस्थिति के द्वारा, भगवत्या – भगवती द्वारा, राज्ञः करं धृत्वा – राजा का हाथ पकड़कर, नेदानीं – ( (न + इदानीं ) अब नहीं, राज्यभङ्गस्ते – (राज्यभङ्गः + ते) तेरे राज्य का नाश, प्रणिपत्य – प्रणाम करके, ममायुः – ( मम + आयुः) मेरी आयु, प्रत्यावर्तेत – लौटा दो, सत्त्वोत्कर्षेण – सत्त्वगुण की पराकाष्ठा से, भृत्यवात्सल्येन – सेवक के स्नेह से, प्रीतास्मि – ( प्रीता + अस्मि) प्रसन्न हूँ, जयतु – जय हो ।

हिंदी अनुवाद ( Hindi Translation ):-  फिर वह सोचता है – ‘ मेरे जैसे छोटे जीव जीते हैं और मर जाते हैं। इस जैसे संसार में न हुआ, न होगा । इस त्याग से मेरे राज्य का भी क्या प्रयोजन ( उद्देश्य) । (देवी के प्रति प्रकट होते हुए) हे माता ! सर्वमङ्गला! मेरा सब ग्रहण करो। मुझे न राज्य, न जीवन की इच्छा है।

देवी – (फिर प्रत्यक्ष रूप से उपस्थिति के द्वारा भगवती सर्वमङ्गला द्वारा राजा का हाथ पकड़कर) बेटा ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ । दुःसाहस मत करो। अब तुम्हारे राज्य का नाश नहीं होगा।

राजा – (साष्टाङ्ग प्रणाम करके) भगवती ! मेरे राज्य और जीवन से क्या प्रयोजन ? यदि भगवती की मुझ पर कृपा हुई है, तब मेरी शेष आयु से भी राजपुत्र वीरवर पुत्र, पत्नी और पुत्री सहित लौटा दो। हे जगदम्बा ! मेरे द्वारा जैसे प्राप्त हुई दशा गमन करने योग्य है।

देवी – पुत्र ! इस सत्त्वगुण की पराकाष्ठा से और सेवक के प्रति स्नेह से बहुत प्रसन्न हूँ। तो जाओ, विजयी हो। यह भी आदर्श चरित्र वाला राजपुत्र वीरवर परिवार सहित जीवित हो ।
Class 8 Sanskrit Chapter 11 Summary Notes सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
 

(5) ततो देवी गताऽदर्शनम्। ततो वीरवरः सपरिवारो सानन्दं स्वगृहं गतः। नृपतिरपि सर्वेषामदृश्य एव स्वप्रासादं प्राविशत् । अन्येद्युः वीरवरोऽपि पुनः द्वारि सेवानिरतोऽभवत् ।
राजा – (तं वीक्ष्य) का वार्ता राजपुत्र !
वीरवरः – देव! सा रोदनपरा नारी मद्दर्शनाददृश्यतां गता। न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्! ततः परमां प्रीतिं गतो महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय । (पृष्ठ 126)


शब्दार्थाः गताऽदर्शनम् – (गता + अदर्शनम्) अदृश्य हो गई, नृपतिरपि – (नृपतिः + अपि) राजा ने भी, सर्वेषामदृश्य – (सर्वेषाम् + अदृश्य) सबसे अदृश्य, स्वप्रासादं – अपने महल, अन्येद्युः – दूसरे दिन, द्वारि – द्वार पर, वीक्ष्य – देखकर, मद्दर्शनाददृश्यतां – (मत् + दर्शनात् + अदृश्यतां) मेरे दर्शन से अदृश्य हो गई, वार्ताऽन्या – (वार्ता + अन्या) अन्य बात, महीपतिस्तस्मै – (महीपतिः + तस्मै) राजा ने उसको।

हिंदी अनुवाद ( Hindi Translation ):- इसके बाद देवी अदृश्य हो गई। फिर वीरवर परिवार सहित आनन्द से अपने घर गया। राजा ने भी सबसे अदृश्य ही अपने महल में प्रवेश किया। दूसरे दिन वीरवर भी द्वार पर सेवा में निरत हो गया ।

राजा – (उसको देखकर) राजपुत्र ! क्या वार्ता ( बात) हुई।

वीरवर – देव ! वह रोती हुई नारी मेरे दर्शन से अदृश्य हो गई। स्वामी ! कोई अन्य बात नहीं। फिर अत्यधिक प्रेम को प्राप्त हुए राजा ने सारा कर्णाट राज्य उस राजपुत्र वीरवर को दे दिया।

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