Class 8 Sanskrit Chapter 12 Hindi Translation सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते | Class 8 Sanskrit Deepakam Translation all Chapters
Here are NCERT Class 8 Sanskrit notes and Chapter 12 “सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते” with Hindi translation, summary, and detailed explanation, designed to simplify complex chapters and make them easier to understand.
Class 8 Sanskrit Chapter 12 Summary Notes सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
प्रस्तुत पाठ का शीर्षक एक श्लोक का अंश है, जो पाणिनीय शिक्षा ग्रंथों से लिया गया है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि वर्णों का शुद्ध, मधुर और सही उच्चारण अत्यंत आवश्यक है। यह पाठ हमें यह शिक्षा देता है कि भाषा की शुद्धता केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व को भी निखारने का माध्यम है। पाठ की शुरुआत छात्र और आचार्य के संवाद से होती है, जहाँ छात्र कथा सुनने की इच्छा प्रकट करते हैं और आचार्य उन्हें एक कथा सुनाते हैं। इन्द्र और वृत्रासुर की कथा के माध्यम से शुद्ध उच्चारण के महत्व को सरल रूप में समझाया गया है।
- हे पुत्र! चाहे तुमने अनेक विषयों का अध्ययन किया हो, फिर भी व्याकरण का ज्ञान अवश्य प्राप्त करो। क्योंकि उच्चारण में थोड़ी सी भी त्रुटि अर्थ का अनर्थ कर सकती है। जैसे ‘स्वजन:’ (अपना व्यक्ति) का उच्चारण यदि ‘श्वजन:’ हो जाए, तो उसका अर्थ ‘कुत्ता’ हो जाता है। इसी प्रकार ‘सकलम्’ (संपूर्ण) को ‘शकलम्’ (टुकड़े-टुकड़े) और ‘सकृत्’ (एक बार) को ‘शकृत्’ (मल) बोल देने से अर्थ पूरी तरह बदल जाता है।
- जिस प्रकार बाघिन अपने शावकों को दाँतों में पकड़कर भी बिना चोट पहुँचाए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है, उसी प्रकार हमें भी शब्दों का प्रयोग अत्यंत सावधानी और कोमलता से करना चाहिए।
- इस प्रकार जब वर्णों का शुद्ध और सही प्रयोग किया जाता है, तो वे न तो विकृत होते हैं और न ही कष्ट पहुँचाते हैं। जो व्यक्ति सही उच्चारण करता है, वह सम्मान का पात्र बनता है और उच्च स्थान प्राप्त करता है।
- जो व्यक्ति मधुर और स्पष्ट बोलता है, उचित स्थान पर शब्दों का विभाजन करता है, सही स्वर में पढ़ता है, धैर्य रखता है और लय के साथ पाठ करता है—उसे ही उत्तम पाठक कहा जाता है। ये सभी गुण एक श्रेष्ठ पाठक में होने चाहिए।
- इसके विपरीत, जो व्यक्ति गाकर पढ़ता है, सिर हिलाकर पढ़ता है, बहुत तेज गति से पढ़ता है, बिना समझे पढ़ता है और जिसकी आवाज़ अस्पष्ट या धीमी होती है—ऐसे छह प्रकार के पाठ को अधम या निकृष्ट माना गया है।
(सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते : मूलपाठः, शब्दार्थाः, अन्वयाः, सरलार्थाः)
नमस्ते आचार्य ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छाम:। कृपया कथां श्रावयति वा महोदय !
नमस्ते छात्राः! भवतां मनोरञ्जनार्थम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्।
तर्हि सावधानं शृण्वन्तु।
देवानां राजा इन्द्र:, असुराणां च राजा आसीत् वृत्रासुरः। देवानाम् असुराणां च मध्ये सर्वदा वैरभावः भवति एव । स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान् । यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत्–‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति । यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीडयिष्यति इति विचार्य ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः । स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः। परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।
नमस्ते आचार्य ! आज हम लोग एक कथा सुनना चाहते हैं। कृपया कथा सुनाइए महोदय !
नमस्ते छात्रो! आपके मनोरंजन के लिए पौराणिक कथा सुनें। तत्पश्चात् पढ़ेंगे, तो सावधान होकर सुनो।
देवताओं के राजा इन्द्र और असुरों (राक्षसों) का राजा वृत्रासुर था। देवताओं और असुरों के बीच हमेशा शत्रुता ही रहती थी। अपना बल बढ़ाने के लिए और इंद्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने यज्ञ करवाया। यज्ञ में आहुतिमन्त्र था–‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ अर्थात् ‘इन्द्र के शत्रु की वृद्धि हो’। यज्ञ की समाप्ति पर वृत्रासुर बलवान होकर लोगों को पीड़ित करेगा। यह सोचकर पुरोहितों ने स्वर परिवर्तित कर दिया। स्वर के परिवर्तन से अर्थ परिवर्तित हो गया। परिणामस्वरूप वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। शक्तिशाली इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर को मार दिया।
अति सुंदर कथा महोदय ! तो हमें भी पढ़ने के समय और भाषण के समय स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करना चाहिए।
तुम ठीक बोल रही हो हिमानी । शुद्ध उच्चारण के संदर्भ में ही अभी यह पाठ पढ़ते हैं ।
पदच्छेदः – यद्यपि बहु न अधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् स्वजनः श्वजनः मा अभूत् सकलम् शकलम् सकृत् शकृत्।
अन्वयः – पुत्र! यद्यपि बहु न अधीषे तथापि व्याकरणं पठ। येन स्वजनः श्वजन: (इति) सकलं शकलं (इति) सकृत् शकृत् (इति) च मा अभूत।
भावार्थ:- अयि पुत्र! यद्यपि भवान् वा बहून् विषयान् पठितुं न पारयति तथापि व्याकरणं तु अवश्यं पठतु । येन उच्चारणसमये स्वजनः (अर्थात् बन्धुः ) इत्यस्य स्थाने श्वजन: (अर्थात् शुनकः) इति न भवेत्। एवमेव, सकृत् (अर्थात् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृत् (अर्थात् विष्ठा) इति, सकलम्, (पूर्णम्) इत्यस्य स्थाने शकलं (खण्डम् ) इति दोषपूर्णम् उच्चारणं न भवेत्। अत्र स्वजनः इत्यादीनाम् उदाहरणद्वारा एकस्य वर्णस्य उच्चारणस्य दोषेण कथं समग्रपदस्य अर्थः परिवर्तितः भवति इति दर्शितम् ।
शब्दार्थाः व्याघ्री – बाघिन, यथा – जैसे, पुत्रान् – पुत्रों को, दंष्ट्राभ्याम् – दाँतों से, न च पीडयेत् – और बिना चोट पहुँचाए, भीता – डरी हुई, वर्णान् – वर्णों को, प्रयोजयेत् – उच्चारण/ प्रयोग कर सकता है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): जैसे बाघिन दाँतों के बीच अपने पुत्रों को दबा, बिना चोट पहुँचाए, यहाँ से वहाँ ले जाती है, शब्दों के साथ तुम्हारा व्यवहार वैसा ही कोमल सतर्क होना चाहिए। भावार्थ का हिंदी अनुवाद – बाघिन अपने पुत्रों को दाँत से ले जाती है। उसके दाँत बहुत हैं, तीक्ष्ण (तेज) होते हैं। अत: वह बच्चे को वैसा नहीं पकड़ती है जिससे बच्चे को कोई हानि हो। इसी प्रकार, वैसे नहीं पकड़ती है जिससे बच्चा गिर गए। वर्णों का उच्चारण भी उसी भाँति करना चाहिए। वर्णों का उच्चारण न तो अधिक कठोर रूप से, न ही अधिक शिथिल रूप से करना चाहिए।
पदच्छेदः एवं वर्णाः प्रयोक्तव्याः न अव्यक्ताः न च पीडिताः सम्यग् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ।
अन्वयः – एवम् अव्यक्ताः पीडिताः च वर्णाः न प्रयोक्तव्याः । सम्यक् वर्णप्रयोगेण (सः) ब्रह्मलोके महीयते।
भावार्थ:- वर्णानाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वर्णाः स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च उच्चारणीयाः । एतेन श्रोता वक्तुः भावान् सम्यक्तया अवगच्छति । एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्राप्नोति ।
शब्दार्थाः माधुर्यम् – मधुरता (स्वर में मिठास ), अक्षरव्यक्तिः – स्पष्ट उच्चारण/अक्षर स्पष्टता, पदच्छेदः – उचित स्थान पर शब्दों को अलग करना, सुस्वरः – मधुर स्वर, धैर्यम् – संयम, आत्मविश्वास, लयसमर्थः – लय में पढ़ने की क्षमता, पाठकाः – पढ़ने से संबंधित, गुणाः – गुण ।
सरलार्थ:- जो व्यक्ति मधुर, स्पष्ट, उचित स्थानों पर पदों का विभाजन करने वाला, मधुर स्वर में बोलने वाला, धैर्यशील, लय में पढ़ने वाला हो – वही उत्तम पाठक कहलाता है। ये सभी छह गुण एक श्रेष्ठ पाठक में होने चाहिए।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): मधुरतापूर्वक स्पष्ट उच्चारण, उचित स्थानों पर पदों का विभाजन, सभी के सुनने के योग्य समुचित स्वर से कहना । सन्देह रहित पढ़ने के लिए धैर्य और विषय में तल्लीनता – ये श्रेष्ठ पाठक के छह गुण होते हैं। पठन – कौशल को संपादित करने के लिए हमें इन गुणों को बढ़ाने चाहिए।
पदच्छेदः – गीति शीघ्री शिर: कम्पी तथा लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च षट् एते पाठकाधमाः ।
अन्वयः – गीती शीघ्री शिरःकम्पी लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च एते षट् पाठकाधमाः भवन्ति ।
भावार्थ:- यः जनः गीतगानम् इव पठति, शीघ्रं – शोघ्रं वेगेन वा पठति, मस्तकदोलनं कृत्वा पठति, यः जनः लिखित्वा लिखित्वा पठति, अर्थबोधं विना पठति, मन्दस्वरेण पठति सः अधमपाठकः इति उच्यते । अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् परिष्कृत्य पठामः चेत् आदर्शपाठकाः भवामः।
देवानां राजा इन्द्र:, असुराणां च राजा आसीत् वृत्रासुरः। देवानाम् असुराणां च मध्ये सर्वदा वैरभावः भवति एव । स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान् । यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत्–‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति । यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीडयिष्यति इति विचार्य ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्तितवन्तः । स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः। परिणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम्। बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान्।
बहु सुन्दरी कथा महोदय ! तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुर्मः ।
त्वं यथार्थं भाषसे हिमानि ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः ।
शब्दार्था: अद्य – आज, वयम् – हम लोग, श्रोतुम् – सुनने के लिए, श्रावयति – सुनाइए, देवानाम् – देवताओं का, असुराणाम्- असुरों (राक्षसों) का, सर्वदा – हमेशा, वैरभावः – शत्रुता, वर्धयितुम् – बढ़ाने के लिए, जेतुम् – जीतने के लिए, यज्ञावसाने – यज्ञ की समाप्ति पर, भूत्वा – होकर, विचार्य – सोचकर, वज्रेण – वज्र से, मारितवान् – मारा।
सरलार्थ-
शब्दार्था: अद्य – आज, वयम् – हम लोग, श्रोतुम् – सुनने के लिए, श्रावयति – सुनाइए, देवानाम् – देवताओं का, असुराणाम्- असुरों (राक्षसों) का, सर्वदा – हमेशा, वैरभावः – शत्रुता, वर्धयितुम् – बढ़ाने के लिए, जेतुम् – जीतने के लिए, यज्ञावसाने – यज्ञ की समाप्ति पर, भूत्वा – होकर, विचार्य – सोचकर, वज्रेण – वज्र से, मारितवान् – मारा।
सरलार्थ-
नमस्ते आचार्य ! आज हम लोग एक कथा सुनना चाहते हैं। कृपया कथा सुनाइए महोदय !
नमस्ते छात्रो! आपके मनोरंजन के लिए पौराणिक कथा सुनें। तत्पश्चात् पढ़ेंगे, तो सावधान होकर सुनो।
देवताओं के राजा इन्द्र और असुरों (राक्षसों) का राजा वृत्रासुर था। देवताओं और असुरों के बीच हमेशा शत्रुता ही रहती थी। अपना बल बढ़ाने के लिए और इंद्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने यज्ञ करवाया। यज्ञ में आहुतिमन्त्र था–‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ अर्थात् ‘इन्द्र के शत्रु की वृद्धि हो’। यज्ञ की समाप्ति पर वृत्रासुर बलवान होकर लोगों को पीड़ित करेगा। यह सोचकर पुरोहितों ने स्वर परिवर्तित कर दिया। स्वर के परिवर्तन से अर्थ परिवर्तित हो गया। परिणामस्वरूप वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। शक्तिशाली इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर को मार दिया।
अति सुंदर कथा महोदय ! तो हमें भी पढ़ने के समय और भाषण के समय स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करना चाहिए।
तुम ठीक बोल रही हो हिमानी । शुद्ध उच्चारण के संदर्भ में ही अभी यह पाठ पढ़ते हैं ।
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥१॥
पदच्छेदः – यद्यपि बहु न अधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् स्वजनः श्वजनः मा अभूत् सकलम् शकलम् सकृत् शकृत्।
अन्वयः – पुत्र! यद्यपि बहु न अधीषे तथापि व्याकरणं पठ। येन स्वजनः श्वजन: (इति) सकलं शकलं (इति) सकृत् शकृत् (इति) च मा अभूत।
भावार्थ:- अयि पुत्र! यद्यपि भवान् वा बहून् विषयान् पठितुं न पारयति तथापि व्याकरणं तु अवश्यं पठतु । येन उच्चारणसमये स्वजनः (अर्थात् बन्धुः ) इत्यस्य स्थाने श्वजन: (अर्थात् शुनकः) इति न भवेत्। एवमेव, सकृत् (अर्थात् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृत् (अर्थात् विष्ठा) इति, सकलम्, (पूर्णम्) इत्यस्य स्थाने शकलं (खण्डम् ) इति दोषपूर्णम् उच्चारणं न भवेत्। अत्र स्वजनः इत्यादीनाम् उदाहरणद्वारा एकस्य वर्णस्य उच्चारणस्य दोषेण कथं समग्रपदस्य अर्थः परिवर्तितः भवति इति दर्शितम् ।
शब्दार्था: यद्यपि – भले ही, बहु – बहुत (विषय), नाधीषे-न पढ़ा हो, तथापि – फिर भी, पठ पुत्र व्याकरणम् – हे पुत्र ! व्याकरण का अध्ययन करो, स्वजन: – अपना जन/ अपना व्यक्ति, श्वजनः – कुत्ता, सकलम् – टुकड़ा, सकृत्—एक बार, शकृत् – विष्ठा (मल) ।
सरलार्थ:- हे पुत्र! भले ही तुमने अनेक विषयों का अध्ययन न किया हो, फिर भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। क्योंकि (यदि उच्चारण में थोड़ी भी चूक हो जाए), तो ‘स्वजन:’ (बन्धु) का अर्थ ‘श्वजन:’ (कुत्ता) हो जाता है । ‘सकलम्’ (पूर्ण) शब्द (यदि गलती से) ‘शकलम्’ (खंडित) बन जाए या ‘संकृत्’ (एक बार) को शकृत् (मल) बोल दिया जाए, तो पूरा अर्थ ही बदल जाता है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): – हे पुत्र ! भले ही आप बहुत विषयों को पढ़ने में समक्ष नहीं हो फिर भी व्याकरण तो अवश्य पढ़ो। जिसमें उच्चारण के समय में स्वजन (अर्थात् भाई) के स्थान पर श्वजन (अर्थात् कुत्ता) नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार, सकृत ( अर्थात् एक बार ) इसके स्थान पर शकृत् (अर्थात् मल) न हो जाए, सकल (पूर्ण) इसके स्थान पर शकल (खण्ड) इस तरह के दोषपूर्ण उच्चारण नहीं होना चाहिए। यहाँ स्वजन इत्यादि के उदाहरण से एक वर्ण के उच्चारण के दोष से किस तरह पूरे पद का अर्थ बदल जाता है यही दर्शाया गया है।
पदच्छेद:- व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्याम् न च पीडयेत् भीता पतनभेदाभ्याम् तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ।
अन्वयः – यथा पतनभेदाभ्यां भीता व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् हरेत् न च पीडयेत् तद्वत् (जनः) वर्णान् प्रयोजयेत।
भावार्थ:- व्याघ्री स्वशिशुं दन्तैः नयति । तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भवन्ति । अतः सा शिशुं तथा न गृह्णाति येन शिशुः क्षतः भवेत्। एवमेव तथा न गृह्णाति येन शिशुः पतेत् । वर्णानाम् उच्चारणम् अपि तथैव कर्तव्यम् । वर्णोच्चारणम् अतिकठोररूपेण अतिशैथिल्येन वा न कर्तव्यम् ।
सरलार्थ:- हे पुत्र! भले ही तुमने अनेक विषयों का अध्ययन न किया हो, फिर भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। क्योंकि (यदि उच्चारण में थोड़ी भी चूक हो जाए), तो ‘स्वजन:’ (बन्धु) का अर्थ ‘श्वजन:’ (कुत्ता) हो जाता है । ‘सकलम्’ (पूर्ण) शब्द (यदि गलती से) ‘शकलम्’ (खंडित) बन जाए या ‘संकृत्’ (एक बार) को शकृत् (मल) बोल दिया जाए, तो पूरा अर्थ ही बदल जाता है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): – हे पुत्र ! भले ही आप बहुत विषयों को पढ़ने में समक्ष नहीं हो फिर भी व्याकरण तो अवश्य पढ़ो। जिसमें उच्चारण के समय में स्वजन (अर्थात् भाई) के स्थान पर श्वजन (अर्थात् कुत्ता) नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार, सकृत ( अर्थात् एक बार ) इसके स्थान पर शकृत् (अर्थात् मल) न हो जाए, सकल (पूर्ण) इसके स्थान पर शकल (खण्ड) इस तरह के दोषपूर्ण उच्चारण नहीं होना चाहिए। यहाँ स्वजन इत्यादि के उदाहरण से एक वर्ण के उच्चारण के दोष से किस तरह पूरे पद का अर्थ बदल जाता है यही दर्शाया गया है।
व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत्।
भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ॥ २ ॥
पदच्छेद:- व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्याम् न च पीडयेत् भीता पतनभेदाभ्याम् तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ।
अन्वयः – यथा पतनभेदाभ्यां भीता व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् हरेत् न च पीडयेत् तद्वत् (जनः) वर्णान् प्रयोजयेत।
भावार्थ:- व्याघ्री स्वशिशुं दन्तैः नयति । तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भवन्ति । अतः सा शिशुं तथा न गृह्णाति येन शिशुः क्षतः भवेत्। एवमेव तथा न गृह्णाति येन शिशुः पतेत् । वर्णानाम् उच्चारणम् अपि तथैव कर्तव्यम् । वर्णोच्चारणम् अतिकठोररूपेण अतिशैथिल्येन वा न कर्तव्यम् ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): जैसे बाघिन दाँतों के बीच अपने पुत्रों को दबा, बिना चोट पहुँचाए, यहाँ से वहाँ ले जाती है, शब्दों के साथ तुम्हारा व्यवहार वैसा ही कोमल सतर्क होना चाहिए। भावार्थ का हिंदी अनुवाद – बाघिन अपने पुत्रों को दाँत से ले जाती है। उसके दाँत बहुत हैं, तीक्ष्ण (तेज) होते हैं। अत: वह बच्चे को वैसा नहीं पकड़ती है जिससे बच्चे को कोई हानि हो। इसी प्रकार, वैसे नहीं पकड़ती है जिससे बच्चा गिर गए। वर्णों का उच्चारण भी उसी भाँति करना चाहिए। वर्णों का उच्चारण न तो अधिक कठोर रूप से, न ही अधिक शिथिल रूप से करना चाहिए।
एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः ।
सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ॥३॥
पदच्छेदः एवं वर्णाः प्रयोक्तव्याः न अव्यक्ताः न च पीडिताः सम्यग् वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ।
अन्वयः – एवम् अव्यक्ताः पीडिताः च वर्णाः न प्रयोक्तव्याः । सम्यक् वर्णप्रयोगेण (सः) ब्रह्मलोके महीयते।
भावार्थ:- वर्णानाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वर्णाः स्पष्टतया स्वाभाविकरूपेण च उच्चारणीयाः । एतेन श्रोता वक्तुः भावान् सम्यक्तया अवगच्छति । एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्राप्नोति ।
शब्दार्था: एवं – इस प्रकार, वर्णाः – वर्ण (अक्षर/ध्वनि), न च पीडिताः – और न ही कष्ट पाते हैं, सम्यग्-वर्ण-प्रयोगेण – शुद्ध और उचित वर्ण-प्रयोग से, ब्रह्मलोके – ब्रह्मलोक में, महीयते – सम्मानित होता है।
सरलार्थ:- इस प्रकार वर्णों के शुद्ध प्रयोग से वे न तो विचलित होते हैं और न ही कष्ट पाते हैं। जो व्यक्ति सम्यक् (उचित) वर्ण-प्रयोग करता है, वह ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): वर्णों के उच्चारण के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ण स्पष्ट और स्वाभाविक रूप से उच्चारित होना चाहिए। इससे श्रोता वक्ताओं के भावों को सम्यक् रूप से समझता है। इस प्रकार, सावधान उच्चारणशील व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
पदच्छेदः- माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वर : धैर्यं लयसमर्थं च षट् एते पाठका गुणाः ।
अन्वयः – माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वरः धैर्य लयसमर्थं च एते षट् पाठकाः गुणाः (भवन्ति ) ।
भावार्थ:- मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेक्षितस्थाने पदच्छेदः, सर्वेषां श्रवणयोग्येन समुचितस्वरेण कथनम्, सन्देहं विना पठनाय धैर्यं, विषये च तल्लीनता इति एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः भवन्ति । पठनम् इति कौशलं सम्पादयितुं वयम् एतान् गुणान् वर्धयामः।
सरलार्थ:- इस प्रकार वर्णों के शुद्ध प्रयोग से वे न तो विचलित होते हैं और न ही कष्ट पाते हैं। जो व्यक्ति सम्यक् (उचित) वर्ण-प्रयोग करता है, वह ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): वर्णों के उच्चारण के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ण स्पष्ट और स्वाभाविक रूप से उच्चारित होना चाहिए। इससे श्रोता वक्ताओं के भावों को सम्यक् रूप से समझता है। इस प्रकार, सावधान उच्चारणशील व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।
माधुर्यमक्षरव्यक्ति: पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः ॥४॥
पदच्छेदः- माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वर : धैर्यं लयसमर्थं च षट् एते पाठका गुणाः ।
अन्वयः – माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वरः धैर्य लयसमर्थं च एते षट् पाठकाः गुणाः (भवन्ति ) ।
भावार्थ:- मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेक्षितस्थाने पदच्छेदः, सर्वेषां श्रवणयोग्येन समुचितस्वरेण कथनम्, सन्देहं विना पठनाय धैर्यं, विषये च तल्लीनता इति एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः भवन्ति । पठनम् इति कौशलं सम्पादयितुं वयम् एतान् गुणान् वर्धयामः।
शब्दार्थाः माधुर्यम् – मधुरता (स्वर में मिठास ), अक्षरव्यक्तिः – स्पष्ट उच्चारण/अक्षर स्पष्टता, पदच्छेदः – उचित स्थान पर शब्दों को अलग करना, सुस्वरः – मधुर स्वर, धैर्यम् – संयम, आत्मविश्वास, लयसमर्थः – लय में पढ़ने की क्षमता, पाठकाः – पढ़ने से संबंधित, गुणाः – गुण ।
सरलार्थ:- जो व्यक्ति मधुर, स्पष्ट, उचित स्थानों पर पदों का विभाजन करने वाला, मधुर स्वर में बोलने वाला, धैर्यशील, लय में पढ़ने वाला हो – वही उत्तम पाठक कहलाता है। ये सभी छह गुण एक श्रेष्ठ पाठक में होने चाहिए।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): मधुरतापूर्वक स्पष्ट उच्चारण, उचित स्थानों पर पदों का विभाजन, सभी के सुनने के योग्य समुचित स्वर से कहना । सन्देह रहित पढ़ने के लिए धैर्य और विषय में तल्लीनता – ये श्रेष्ठ पाठक के छह गुण होते हैं। पठन – कौशल को संपादित करने के लिए हमें इन गुणों को बढ़ाने चाहिए।
गीति शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः ।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥५॥
पदच्छेदः – गीति शीघ्री शिर: कम्पी तथा लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च षट् एते पाठकाधमाः ।
अन्वयः – गीती शीघ्री शिरःकम्पी लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च एते षट् पाठकाधमाः भवन्ति ।
भावार्थ:- यः जनः गीतगानम् इव पठति, शीघ्रं – शोघ्रं वेगेन वा पठति, मस्तकदोलनं कृत्वा पठति, यः जनः लिखित्वा लिखित्वा पठति, अर्थबोधं विना पठति, मन्दस्वरेण पठति सः अधमपाठकः इति उच्यते । अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् परिष्कृत्य पठामः चेत् आदर्शपाठकाः भवामः।
शब्दार्थाः गीति – गाकर पढ़ने वाला, शीघ्री – बहुत तेजी से पढ़ने वाला, शिरः कम्पी – सिर हिलाते हुए पढ़ने वाला, तथा – और / एवं, लिखितपाठकः – केवल लिखे हुए पढ़ने वाला, अनर्थज्ञः – अर्थ नहीं जानने वाला, अल्पकण्ठः – जिसकी आवाज़ बहुत धीमी है, च – और, एते – ये, षट् – छह, पाठकाधमाः – सबसे निकृष्ट पाठक, अधम पाठक ।
सरलार्थ:- जो व्यक्ति गाकर पढ़ता है, बहुत तेज़ पढ़ता है, सिर हिलाकर को पढ़ता है, सिर्फ लिखे हुए पढ़ता है, अर्थ नहीं जानता और जिसकी आवाज़ धीमी है- ये छह प्रकार के पाठक ‘अधम’ (घटिया निकृष्ट) कहे गए हैं।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): जो व्यक्ति गीत गाने के समान पढ़ता है, जल्दी-जल्दी या तेजी से पढ़ता है, सिर हिलाकर पढ़ता है, जो लिख-लिखकर पढ़ता है, अर्थ समझे बिना पढ़ता है, धीमी स्वर से पढ़ता है, वह अधम (नीच) पाठक कहलाता है। अतः पढ़ने के समय हमें इन दोषों को त्याग कर पढ़ना चाहिए और इस तरह से हम एक आदर्श पाठक बनें।
सरलार्थ:- जो व्यक्ति गाकर पढ़ता है, बहुत तेज़ पढ़ता है, सिर हिलाकर को पढ़ता है, सिर्फ लिखे हुए पढ़ता है, अर्थ नहीं जानता और जिसकी आवाज़ धीमी है- ये छह प्रकार के पाठक ‘अधम’ (घटिया निकृष्ट) कहे गए हैं।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): जो व्यक्ति गीत गाने के समान पढ़ता है, जल्दी-जल्दी या तेजी से पढ़ता है, सिर हिलाकर पढ़ता है, जो लिख-लिखकर पढ़ता है, अर्थ समझे बिना पढ़ता है, धीमी स्वर से पढ़ता है, वह अधम (नीच) पाठक कहलाता है। अतः पढ़ने के समय हमें इन दोषों को त्याग कर पढ़ना चाहिए और इस तरह से हम एक आदर्श पाठक बनें।

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