Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका | Class 8 Sanskrit Deepakam Translation all Chapters
Here are NCERT Class 8 Sanskrit Class 8 Sanskrit notes and Chapter 1 “संगच्छध्वं संवदध्वम्” with Hindi translation, summary, and detailed explanation, designed to simplify complex chapters and make them easier to understand.
Class 8 Sanskrit Chapter 2 Summary Notes अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
प्रस्तुत पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि छोटे या कमजोर प्राणियों का समूह भी एकजुट होकर बड़े से बड़ा कार्य सफलतापूर्वक कर सकता है। यह पाठ मूल रूप से हितोपदेश से लिया गया है।
कथा के अनुसार, ग्रीष्मावकाश के दौरान कुछ मित्र धार्मिक यात्रा पर निकलते हैं और केदारधाम की ओर जा रहे होते हैं। रास्ते में अचानक तेज वर्षा होने के कारण एक पुल टूट जाता है, जिससे वे संकट में पड़ जाते हैं। उस समय उनका नेता उन्हें एक प्रेरणादायक कहानी सुनाता है।
कहानी में बताया गया है कि एक बार कुछ कबूतर एक शिकारी के जाल में फँस जाते हैं। इस आकस्मिक संकट से घबराने के बजाय उनके सरदार उन्हें अपने मित्र चूहे के पास चलने की सलाह देता है। सभी कबूतर मिलकर जाल सहित उड़ जाते हैं और चूहे के पास पहुँचते हैं। चूहा अपने दाँतों से जाल को काटकर उन्हें मुक्त कर देता है।
शिक्षा: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि छोटे-छोटे प्राणी भी यदि एकता और सहयोग के साथ कार्य करें, तो वे कठिन से कठिन कार्य को भी सफलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं।
Class 8 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका
Sanskrit Class 8 Chapter 2 Hindi Translation अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका Summary
(१ ) कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन् । तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत् । सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः। यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा । सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः। नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः । पर्वतस्खलनं सञ्जातम्। सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति । सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत्-
शब्दार्था:(Word Meaning ):
विपत्काले – संकट के समय, अवलम्ब्य – आश्रय करके, चिन्तयामः – सोचते हैं, सन्निकटे – निकट, गमिष्यामः – चलेंगे, चेत् – तब, विषादम् – चिन्ता, शान्ता – शान्त, सम्भूय – एकत्रित होकर, निर्माय – बनाकर ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) –
नायकः अरे मित्रों ! इस संकट के समय हम धैर्य का सहारा लेकर कोई उपाय सोच लेंगे।
दिनेश – (चिन्ता के साथ) अरे भ्राता ! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु ही निकट है। तब किस प्रकार उपाय सोचना चाहिए ।
नायकः – मित्र ! चिन्ता न करो। जब वर्षा शांत (हो जायेगी) और वातावरण स्वच्छ हो जायेगा, तब हम एकत्रित होकर पुल और मार्ग का निर्माण करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ेंगे।
(३ ) सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुम: ?
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) –
अवज्ञाम् – तिरस्कार, भोक्तुम् – खाने के लिए, बद्धाः – बँध गए, अनागतः – न आया हुआ, ज्ञातुम् – जानने में, विस्मयः – आश्चर्य, अभ्युदये – उन्नति में, युधि – युद्ध में, प्रकृतिः – स्वभाव, अवतीर्य – उतरकर, अनन्तर – तब, तिरस्कुर्वन्ति स्म – कोसने लगे, अकृत्वा – न करके, कापुरुष – कायर, सदसि – सभा में, पटुता – चतुरता, व्यसन – आदत, श्रुतौ – सुनो ।
अन्वयः–विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि च वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्-इदं महात्मनां प्रकृतिसिद्धम् (अस्ति ) ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation )– उसके वचन को सुनकर चित्रग्रीव की अवहेलना करके सभी कबूतर पृथ्वी पर उतरकर चावलों के दानों को खाने लगे।
तब उस जाल में सभी कबूतर बँध गए। तब जिसके वचन से कबूतर वहाँ बँधे थे, उसे सब कोसने लगे। यह देखकर चित्रग्रीव कहने लगा- ‘यह इसका दोष नहीं है । न आई हुई विपत्ति को कौन जानने में समर्थ है? इसलिए इस संकट के समय में हमें इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि संकट के समय उलाहना कायर व्यक्ति का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो- संकट में धैर्य, उन्नति होने पर क्षमा, सभा में वाणी कौशल, युद्ध में वीरता, यश के प्रति रुचि, वेदों के ज्ञान में अत्यधिक रुचि-यह महान् पुरुषों का स्वभाव सिद्ध है।
(६) अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम् । प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम् । अतः अस्माभिः
सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।”
एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।
शब्दार्थाः(Word Meaning):
अधुना – अब, प्रतीकारः – समाधान, सहतिः- समूह, एकचित्तीभूय – एकरूप होकर, उत्पतिताः – उड़ गए, अवलम्ब्य – सहारा लेकर, लघूनाम् – छोटी, आदाय – लेकर, उड्डीयताम् – उड़ चलो, विचार्य – विचार कर।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) – इसलिए अब हमें धैर्य का सहारा लेकर समाधान सोचना चाहिए। प्रिय मित्रो ! छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्य का साधक होता है – यह नीति का वचन लोकसिद्ध है। इसलिए हम सब एक रूप होकर जाल को लेकर उड़ चलें। यह सोचकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।
(७) अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः । अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोता: उक्तवन्तः–“स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?” चित्रग्रीव उवाच –‘”प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति । ” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच – सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?” ततो हिरण्यकस्तद्ववचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत्-“आः ! पुण्यवान् अस्मि मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः । ”
शब्दार्थाः(Word Meaning):
(अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका : -मूलपाठः, शब्दार्थाः, अन्वयाः, सरलार्थाः, अभ्यासकार्यम्)
(१ ) कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रदर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन् । तदानीं वर्षारम्भकालः आसीत् । सर्वेऽपि गौरीकुण्डनामकं स्थानं प्राप्तवन्तः। यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं वेगेन वृष्टिः आरब्धा । सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः। नद्याः तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः । पर्वतस्खलनं सञ्जातम्। सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति । सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सांत्वयन् प्रेरयन् च अवदत्-
शब्दार्था:(Word Meaning ):
कानिचन – कुछ, पुण्यः – धार्मिक, दर्शनाय – दर्शन के लिए, अगच्छन् – चल पड़े, तदानीम् – तब, आरोहन्तः – चढ़ते हुए, वृष्टिः – वर्षा , आरब्धा – आरम्भ हो गई, सहसा – अचानक, सर्वत्र – सभी जगह, प्राप्तवन्तः – पहुँच गए, प्रार्थयन्तः – प्रार्थना करने लगे, अस्मान् – हमें, अधैर्यम् – अधीरता, सान्त्वयन् – सान्त्वना देता हुआ, प्रसृतः – फैल गया, सेतुः – पुल, भग्नः – टूट गया, सञ्जातम् – हो गया, अक्रन्दन् – चिल्लाने लगे, प्रेरयन् – प्रेरित करता हुआ ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) -कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्म अवकाश में धार्मिक स्थानों के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड को चल पड़े। तब वर्षा का आरम्भ काल था। सभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए। जब वे श्री केदारधाम की ओर चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य प्राप्ति से पहले वेग के साथ वर्षा आरम्भ हो गई। अचानक सभी जगह अंधकार फैल गया। नदी के जल के तेज बहाव से पुल टूट गया । पर्वत फिसल गया। सभी ऊँचे स्वर से चिल्लाने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे – ‘हे प्रभु! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।’ सभी की अधीरता को देखकर नायक सुधीर ने सभी को सान्त्वना देते हुए तथा प्रेरित करते हुए कहा-
(२) नायकः – अयि भोः मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः ।
दिनेश: – (सविषादम् ) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
नायकः – मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) -कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्म अवकाश में धार्मिक स्थानों के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड को चल पड़े। तब वर्षा का आरम्भ काल था। सभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए। जब वे श्री केदारधाम की ओर चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य प्राप्ति से पहले वेग के साथ वर्षा आरम्भ हो गई। अचानक सभी जगह अंधकार फैल गया। नदी के जल के तेज बहाव से पुल टूट गया । पर्वत फिसल गया। सभी ऊँचे स्वर से चिल्लाने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे – ‘हे प्रभु! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।’ सभी की अधीरता को देखकर नायक सुधीर ने सभी को सान्त्वना देते हुए तथा प्रेरित करते हुए कहा-
(२) नायकः – अयि भोः मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य कमपि उपायं चिन्तयामः ।
दिनेश: – (सविषादम् ) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् कथम् उपायः चिन्तनीयः ?
नायकः – मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
शब्दार्था:(Word Meaning ):
विपत्काले – संकट के समय, अवलम्ब्य – आश्रय करके, चिन्तयामः – सोचते हैं, सन्निकटे – निकट, गमिष्यामः – चलेंगे, चेत् – तब, विषादम् – चिन्ता, शान्ता – शान्त, सम्भूय – एकत्रित होकर, निर्माय – बनाकर ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) –
नायकः अरे मित्रों ! इस संकट के समय हम धैर्य का सहारा लेकर कोई उपाय सोच लेंगे।
दिनेश – (चिन्ता के साथ) अरे भ्राता ! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु ही निकट है। तब किस प्रकार उपाय सोचना चाहिए ।
नायकः – मित्र ! चिन्ता न करो। जब वर्षा शांत (हो जायेगी) और वातावरण स्वच्छ हो जायेगा, तब हम एकत्रित होकर पुल और मार्ग का निर्माण करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ेंगे।
(३ ) सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुम: ?
नायकः – प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं
शक्नुमः । तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।
कपिलः – किम् इदं सम्भवति?
नायकः – नूनं सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हितोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि।
सर्वे – (उत्कण्ठया) का कथा? वद मित्र ! वद ।
नायकः – सावधानं शृण्वन्तु।
शब्दार्था:(Word Meaning ):
शब्दार्था:(Word Meaning ):
एतस्याम् – ऐसी, दुःसाध्यम् – अत्यधिक कठिन, सम्भूय – मिलकर, सम्भवति – सम्भव है, श्रावयामि – सुनाता हूँ, शक्नुमः – कर सकते हैं, सावधानम् – ध्यान से ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) –
सुरेश – इस स्थिति में क्या हम इस अत्यधिक कठिन कार्य को कर सकते हैं।
नायक – प्रिय मित्रो ! हम आत्मविश्वास के बल से इस असम्भव कार्य को भी मिलकर अवश्य सिद्ध कर सकते हैं। इससे हमारी लक्ष्य प्राप्ति और प्राणरक्षा भी होगी।
कपिल – क्या यह सम्भव है?
नायक – मित्र, अवश्य सम्भव है। इस प्रसंग में मैं हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ ।
सभी – (उत्कण्ठा से ) क्या कथा है? मित्र कहो।
नायक – ध्यानपूर्वक सुनो।
(४) अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म । अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्। ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।’ एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत्-” आः किमर्थम् एवमुच्यते ?
शब्दार्था:(Word Meaning ):
(४) अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म । अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकणान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गे गच्छति स्म। केचन कपोताः वनमध्ये तण्डुलकणान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन्। ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां सम्भवः तद् निरूप्यताम् । कश्चिद् व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम्।’ एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सदर्पम् अवदत्-” आः किमर्थम् एवमुच्यते ?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्॥१॥”
शब्दार्था:(Word Meaning ):
शाल्मली – सेमल, तरुः – वृक्ष, प्रच्छन्नः – गुप्त, सपरिवारः – परिवार सहित, निवसन्ति – निवास करते थे, अवलोक्य – देखकर, निर्जन- जन रहित, वृद्धानाम् – बूढ़े लोगों का, ग्राह्यम् – ग्रहण करना चाहिए, आगत्य – आकर , विकीर्य – बिखेर कर, विस्तीर्य – फैलाकर, निरूप्यताम् – देखिए, सर्वथा – सदा, अविचारितम् – बिना विचार, श्रुत्वा- सुनकर, सदर्पम् – अभिमान के साथ, अप्रवर्तनम् – अप्रवृत्ति ।
अन्वयः-आपत्काले हि उपस्थिते वृद्धानां वचनं ग्राह्यम् । सर्वत्र एक विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम्।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)– गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का वृक्ष था। वहाँ प्रतिदिन दूर स्थानों से आकर पक्षी निवास करते थे। एक बार वहाँ कोई शिकारी चावलों के दानों को बिखेर कर और जाल फैला कर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा परिवार सहित आकाश मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर वन के मध्य चावलों के दानों को देखकर लालच में पड़ गए।
तब चित्रग्रीव चावलों के दानों से ललचाए कबूतरों को कहने लगा- ” इस जनरहित वन में कहाँ, कैसे चावलों के दानें सम्भव हैं। यह विचार कर लीजिए। कोई शिकारी होगा । सदा बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए ।” यह वचन सुनकर कोई कबूतर घमंड के साथ कहने लगा- आह, यह किसलिए कहा गया है।
संकटकाल उपस्थित हो जाने पर ही वृद्ध लोगों का वचन ग्रहण करना चाहिए। सभी स्थानों पर विचार करने पर भोजन भी प्राप्त नहीं होता है।
(५) तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः ।
अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन् । ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म ।
इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः : अवदत्-“अयम् अस्य दोषो न । अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः । अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन् उपायश्चिन्तनीयः। यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु-
शब्दार्था:(Word Meaning ):
अन्वयः-आपत्काले हि उपस्थिते वृद्धानां वचनं ग्राह्यम् । सर्वत्र एक विचारे तु भोजने अपि अप्रवर्तनम्।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)– गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का वृक्ष था। वहाँ प्रतिदिन दूर स्थानों से आकर पक्षी निवास करते थे। एक बार वहाँ कोई शिकारी चावलों के दानों को बिखेर कर और जाल फैला कर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा परिवार सहित आकाश मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर वन के मध्य चावलों के दानों को देखकर लालच में पड़ गए।
तब चित्रग्रीव चावलों के दानों से ललचाए कबूतरों को कहने लगा- ” इस जनरहित वन में कहाँ, कैसे चावलों के दानें सम्भव हैं। यह विचार कर लीजिए। कोई शिकारी होगा । सदा बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए ।” यह वचन सुनकर कोई कबूतर घमंड के साथ कहने लगा- आह, यह किसलिए कहा गया है।
संकटकाल उपस्थित हो जाने पर ही वृद्ध लोगों का वचन ग्रहण करना चाहिए। सभी स्थानों पर विचार करने पर भोजन भी प्राप्त नहीं होता है।
(५) तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः ।
अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन् । ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत्र बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म ।
इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः : अवदत्-“अयम् अस्य दोषो न । अनागतविपत्तिं को वा ज्ञातुं समर्थः । अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा कश्चन् उपायश्चिन्तनीयः। यतोहि विपत्काले विस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्। सत्पुरुषाणां लक्षणं तु-
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥ ”
शब्दार्था:(Word Meaning ):
अवज्ञाम् – तिरस्कार, भोक्तुम् – खाने के लिए, बद्धाः – बँध गए, अनागतः – न आया हुआ, ज्ञातुम् – जानने में, विस्मयः – आश्चर्य, अभ्युदये – उन्नति में, युधि – युद्ध में, प्रकृतिः – स्वभाव, अवतीर्य – उतरकर, अनन्तर – तब, तिरस्कुर्वन्ति स्म – कोसने लगे, अकृत्वा – न करके, कापुरुष – कायर, सदसि – सभा में, पटुता – चतुरता, व्यसन – आदत, श्रुतौ – सुनो ।
अन्वयः–विपदि धैर्यम् अथ अभ्युदये क्षमा, सदसि च वाक्पटुता, युधि विक्रमः, यशसि च अभिरुचिः, श्रुतौ व्यसनम्-इदं महात्मनां प्रकृतिसिद्धम् (अस्ति ) ।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation )– उसके वचन को सुनकर चित्रग्रीव की अवहेलना करके सभी कबूतर पृथ्वी पर उतरकर चावलों के दानों को खाने लगे।
तब उस जाल में सभी कबूतर बँध गए। तब जिसके वचन से कबूतर वहाँ बँधे थे, उसे सब कोसने लगे। यह देखकर चित्रग्रीव कहने लगा- ‘यह इसका दोष नहीं है । न आई हुई विपत्ति को कौन जानने में समर्थ है? इसलिए इस संकट के समय में हमें इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि संकट के समय उलाहना कायर व्यक्ति का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो- संकट में धैर्य, उन्नति होने पर क्षमा, सभा में वाणी कौशल, युद्ध में वीरता, यश के प्रति रुचि, वेदों के ज्ञान में अत्यधिक रुचि-यह महान् पुरुषों का स्वभाव सिद्ध है।
(६) अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारश्चिन्त्यताम् । प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम् । अतः अस्माभिः
सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्।”
एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।
शब्दार्थाः(Word Meaning):
अधुना – अब, प्रतीकारः – समाधान, सहतिः- समूह, एकचित्तीभूय – एकरूप होकर, उत्पतिताः – उड़ गए, अवलम्ब्य – सहारा लेकर, लघूनाम् – छोटी, आदाय – लेकर, उड्डीयताम् – उड़ चलो, विचार्य – विचार कर।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) – इसलिए अब हमें धैर्य का सहारा लेकर समाधान सोचना चाहिए। प्रिय मित्रो ! छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्य का साधक होता है – यह नीति का वचन लोकसिद्ध है। इसलिए हम सब एक रूप होकर जाल को लेकर उड़ चलें। यह सोचकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।
(७) अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिपथात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः । अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोता: उक्तवन्तः–“स्वामिन्! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?” चित्रग्रीव उवाच –‘”प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति । सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति । ” एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् चकितस्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच – सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे?” ततो हिरण्यकस्तद्ववचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत्-“आः ! पुण्यवान् अस्मि मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः समायातः । ”
शब्दार्थाः(Word Meaning):
अपहारकान् – चुराने वाले, निवृत्तः – लौट गया, पक्षिषु-पक्षियों के , उक्तवन्तः - कहने लगे, निवसति – रहता है, तूष्णीम् – चुप, सम्भाषसे – बोलता है, प्रत्यभिज्ञाय – पहचानकर, त्वरया – शीघ्र, पाशान् – फंदों को, छेत्स्यति – काट देगा, आलोच्य – विचार कर, विवर: – बिल, अनिष्ट: – संकट, शतद्वार – सौ दरवाजे, अवपातः – गिरना, निःसृत्य – निकलकर, समायातः – आया है।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) – तब वह शिकारी दूर से जाल को चुराने वालों को देखकर पीछे दौड़ा, परन्तु उसकी दृष्टि से पक्षियों के ओझल हो जाने पर वह लौट गया। तब शिकारी को लौटा हुआ देखकर कबूतर कहने लगे – ” हे स्वामी ! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव कहने लगा – ” प्रिय कबूतरो ! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गण्डकी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह हमारे बंधनों को दाँतों के बल से काट देगा।” यह विचार कर सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक भी सदा संकट की आशंका से बिल के सौ द्वार बनाकर रहता था। तब हिरण्यक कबूतरों के पतन के भय से चकित मौन ही खड़ा रहा । चित्रग्रीव कहने लगा- ” अरे मित्र, हिरण्यक ! क्या हमारे साथ बात नहीं करोगे?” तब हिरण्यक उसके वचन को पहचानकर आनंद से शीघ्रतापूर्वक बाहर निकलकर कहने लगा-” अहा। मैं भाग्यवान हूँ। मेरा प्रियमित्र चित्रग्रीव आया है ।
(८) पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत्-“सखे ! किमेतत् ?” चित्रग्रीवोऽवदत्-” सखे ! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम् । ” तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत्-” मित्र ! ता मा एवम् । पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम । ” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – ” साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।” ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषा कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म । सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन्। सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोता: राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति – ” भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम् ” । कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – ” मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्त: । तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरश्रिताः ।
शब्दार्थाः(Word Meaning):
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation ) – तब वह शिकारी दूर से जाल को चुराने वालों को देखकर पीछे दौड़ा, परन्तु उसकी दृष्टि से पक्षियों के ओझल हो जाने पर वह लौट गया। तब शिकारी को लौटा हुआ देखकर कबूतर कहने लगे – ” हे स्वामी ! अब क्या करना उचित है?” चित्रग्रीव कहने लगा – ” प्रिय कबूतरो ! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गण्डकी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह हमारे बंधनों को दाँतों के बल से काट देगा।” यह विचार कर सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक भी सदा संकट की आशंका से बिल के सौ द्वार बनाकर रहता था। तब हिरण्यक कबूतरों के पतन के भय से चकित मौन ही खड़ा रहा । चित्रग्रीव कहने लगा- ” अरे मित्र, हिरण्यक ! क्या हमारे साथ बात नहीं करोगे?” तब हिरण्यक उसके वचन को पहचानकर आनंद से शीघ्रतापूर्वक बाहर निकलकर कहने लगा-” अहा। मैं भाग्यवान हूँ। मेरा प्रियमित्र चित्रग्रीव आया है ।
(८) पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविस्मयं क्षणं स्थित्वा अवदत्-“सखे ! किमेतत् ?” चित्रग्रीवोऽवदत्-” सखे ! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम् । ” तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति। तदा चित्रग्रीवोऽवदत्-” मित्र ! ता मा एवम् । पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम । ” एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – ” साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।” ततो हिरण्यकः स्वमित्रैः सह सर्वेषा कपोतानां बन्धनानि छिनत्ति स्म । सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन्। सहर्षं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोता: राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति – ” भवतः नीतिशिक्षया नायकधर्मेण च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम् ” । कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – ” मित्राणि ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्त: । तर्हि किमर्थं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?” नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरश्रिताः ।
शब्दार्थाः(Word Meaning):
स्थित्वा – रूक कर, छेतुम् – काटने के लिए, सत्वरम् – शीघ्र, उपसर्पति – पास आता है, मद्ः – मेरा, आकर्ण्य – सुनकर, प्रहृष्टमनाः – प्रसन्न मन, वात्सल्येन – प्रेम से, भगीरथ – महान्, अन्येषाम् – अन्य लोगों का, त्रैलोक्यस्य – तीनों लोकों का, विमुक्ताः – मुक्त, सहर्षम् – प्रसन्नता के साथ, उड्डीय – उड़कर, प्रशंसन्ति – प्रशंसा करते हैं, श्रावयित्वा – सुनाकर, सम्बोधयति – सम्बोधित करता है, आपद्ग्रस्ताः – संकट में फँसे, विहाय – छोड़कर, संलग्नाः – लगे हुए।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation):
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation):
बन्धन में बँधे कबूतरों को देखकर आश्चर्य के साथ पल भर रुककर कहने लगा- ‘मित्र ! यह क्या है?’ चित्रग्रीव कहने लगा- ‘हे मित्र ! यह हमारी विचारहीनता का फल है।’ यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन को काटने के लिए शीर्घ पास आया। तब चित्रग्रीव कहने लगा – ‘मित्र ! ऐसा नहीं। पहले मेरे आश्रित इनके बंधनों को काटो, पश्चात् मेरे।’ यह सुनकर प्रसन्न मन वाला पुलकित होता हुआ हिरण्यक कहने लगा – साधु मित्र । साधु ! इस आश्रितों के प्रति प्रेम के कारण तुम तीनों लोकों के स्वामी होने के योग्य हो ।’ तब हिरण्यक अपने मित्रों के साथ उन कबूतरों के बंधनों को काटने लगा। सभी कबूतर बंधन से मुक्त हो गए। प्रसन्नता के साथ उड़कर आकाश के मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करने लगे- ‘आप की नीति शिक्षा के द्वारा तथा नायक के धर्म के कारण हम सभी सुरक्षित हैं। हम धन्य हैं।
कथा को सुनाकर नायक सभी को सम्बोधित करने लगा – ‘ अरे मित्रो ! संकट में फँसे कबूतरों ने बुद्धि बल के द्वारा तथा संगठन के सामर्थ्य से आत्म रक्षा की। तब किस प्रकार हम संगठित होकर आत्मरक्षा नहीं कर सकते?’ नायक के प्रेरक वचनों के द्वारा उत्साहित सभी भय, शोक तथा संदेह का त्याग कर पुल के निर्माण कार्य में लग गए । महान् प्रयासों के द्वारा पुल का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों की तथा अन्य लोगों के प्राणों की रक्षा की।
कथा को सुनाकर नायक सभी को सम्बोधित करने लगा – ‘ अरे मित्रो ! संकट में फँसे कबूतरों ने बुद्धि बल के द्वारा तथा संगठन के सामर्थ्य से आत्म रक्षा की। तब किस प्रकार हम संगठित होकर आत्मरक्षा नहीं कर सकते?’ नायक के प्रेरक वचनों के द्वारा उत्साहित सभी भय, शोक तथा संदेह का त्याग कर पुल के निर्माण कार्य में लग गए । महान् प्रयासों के द्वारा पुल का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों की तथा अन्य लोगों के प्राणों की रक्षा की।

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