Class 7 Sanskrit Chapter 5 Hindi Translation सेवा हि परमो धर्मः | NCERT Hindi Translation for Class 7 Sanskrit Deepakam दीपकम्
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Class 7 Sanskrit Chapter 5 Summary Notes सेवा हि परमो धर्मः
सेवा हि परमो धर्मः :- पाठ का परिचय (Introduction of the Lesson)
यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि सच्चा ज्ञान केवल पढ़ाई या कौशल में नहीं, बल्कि सेवा और परोपकार में निहित होता है। कहानी में नागार्जुन को दो युवकों में से अपने योग्य सहायक का चयन करना था। उन्होंने दोनों को औषधि बनाने का कार्य सौंपा। एक युवक ने अपने घर में माता-पिता के बीमार होने के बावजूद केवल औषधि निर्माण पर ध्यान दिया, जबकि दूसरा युवक एक बीमार व्यक्ति की सेवा करने में लग गया और औषधि नहीं बना सका।
नागार्जुन ने सेवा-भाव को अधिक महत्वपूर्ण मानते हुए उसी युवक को अपना शिष्य चुना, जिसने मानवता को प्राथमिकता दी।
इस पाठ के माध्यम से हम सीखते हैं कि करुणा, सेवा, उदारता, परोपकार और क्रोध न करना जैसे मानवीय गुण हर व्यक्ति में होना आवश्यक है। जीवन में विद्या, धन और पद का महत्व तो है ही, लेकिन इनके साथ अच्छे मानवीय गुणों का होना भी उतना ही आवश्यक है।
पाठ : सेवा हि परमो धर्मः– शब्दार्थ एवं सरलार्थ
शिक्षिका – प्रियच्छात्राः! जीवने सफलतायै मानवः किं किम् अर्जयेत्?
छात्राः – विद्याम्, उपाधिम्! पदवीम् ! धनम् ! …….
शिक्षिका – किम् एतदेव पर्याप्तम् ?
एकः छात्रः – अन्यत् किम् आवश्यकं महोदये ?
शिक्षिका – मानवीयाः गुणाः अपि आवश्यका : भोः ! यथा सिद्धार्थस्य जीवने विद्या, धनं, पदं च सर्वमपि आसीत् । किन्तु मानवीयगुणैः एव सः महात्मा बुद्धः जातः ।
एकाः छात्रा: – आर्ये! के ते मानवीयाः गुणाः ?
एकाः छात्रा: – आर्ये! के ते मानवीयाः गुणाः ?
शिक्षिका – सत्यं, करुणा, उदारता, सेवा, परोपकारः, अक्रोधः इत्यादयः मानवीयाः गुणाः सन्ति । अद्य एतैः गुणैः सम्बद्धाम् एकां कथां पठामः ।
एकः छात्रः – आम्, मान्ये! वयम् अपि पठितुम् इच्छामः।
शब्दार्था: (Word Meanings) : जीवने – जीवन में (In life), सफलतायै – सफलता के लिए (For success), उपाधिम् – उपाधि (Degree), पदवीम्-पदवी (Designation / Position), मानवीया: – मानवों में होने वाला (Humane)।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): -
शिक्षिका – प्रिय छात्रो! जीवन में सफलता के लिए मनुष्य को क्या-क्या अर्जित करना चाहिए?
सब छात्र – विद्या, उपाधि, पदवी, धन….
शिक्षिका – क्या ये सब काफी हैं?
एक छात्र – और क्या आवश्यक है महोदया ?
शिक्षिका – मानवीय गुण भी आवश्यक हैं! जैसे सिद्धार्थ के जीवन में विद्या, धन और पद सब कुछ था । परन्तु मानवीय गुणों के कारण ही वे महात्मा बुद्ध हुए ।
एक छात्रा – श्रीमती जी! वे मानवीय गुण कौन-से हैं?
शिक्षिका – सत्य, दया, उदारता, सेवा, दूसरों का भला, गुस्सा नहीं करना इत्यादि मानवीय गुण हैं। आज इन सब गुणों से संबंधित एक कथा पढ़ते हैं।
एक छात्र – जी, महोदया ! हम भी पढ़ना चाहते हैं ।
➤ नागार्जुनः प्रसिद्धः रसायनशास्त्रज्ञः चिकित्सकः च आसीत् । सः अहोरात्रं प्रयोगशालायां कार्यं करोति स्म। एकदा सः महाराजं निवेदितवान्– “महाराज ! मम चिकित्साकार्याय एक: सहायकः आवश्यकः ” इति । राजा एतद् अङ्गीकृतवान् उक्तवान् च- ‘अस्तु, अहं व्यवस्थां करोमि। श्वः केचन योग्याः युवकाः आगमिष्यन्ति । भवान् परीक्षां कृत्वा तेषु युवकेषु कमपि योग्यं स्वीकरोतु ‘ इति । अन्यस्मिन् दिने द्वौ युवकौ आगतवन्तौ । नागार्जुनः द्वयोः विद्याभ्यासविषये पृष्टवान् । द्वयोः अपि विद्याभ्यासविषयः समानः एव आसीत् । तदा नागार्जुनः तौ एकं विशिष्टं रसायनं निर्माय आगच्छताम् इति सूचितवान् । तदर्थं दिनद्वयस्य अवसरं दत्तवान् । “गमनसमये राजमार्गेण गच्छताम् ” इत्यपि सूचितवान् ।
दिनद्वयानन्तरं नागार्जुनस्य समीपे प्रथमः युवकः आगतवान्। “ औषधनिर्माणे किमपि कष्टं न अभवत् खलु ?” इति नागार्जुनः पृष्टवान्। युवक: स्वनिष्ठां दर्शयितुं स्वगृहस्य समस्याः वर्णितवान्- “पितुः उदरवेदना, मातुः ज्वरः च आसीत् । तथापि अहं तत्सर्वं परित्यज्य औषधं निर्मितवान्” इति उक्त्वा नागार्जुनाय रसायनं दत्तवान्।
शब्दार्था: (Word Meanings) : रसायनशास्त्रज्ञ: – रसायन शास्त्र का विशेषज्ञ (Chemist/Druggist), चिकित्सकः – डाक्टर, वैद्य (Physician), अहोरात्रं – दिन और रात (Day and night), प्रयोगशालायां – प्रयोगशाला में (In the laboratory), अङ्गीकृतवान्-स्वीकार किया (Accepted), व्यवस्थाम्-व्यवस्था (Arrangement), योग्या: – कुशल (Able), अन्यस्मिन् दिने – दूसरे दिन (On another day), आगच्छताम् – आओ (Come), अवसर – मौका (Chance), दत्तवान् – दिया (Gave), गमनसमये – जाने के समय में (At the time departure), राजमार्गेण – राजमार्ग के द्वारा जाना (Go by highway), सूचितवान् – बताया (Told), दिनद्वयानन्तरं – (दिन + द्वय+अनन्तरं) दो दिन के बाद (After two days), स्वनिष्ठां – अपनी निष्ठा (भक्ति) को (Your loyalty), दर्शयितुं – दिखाने के लिए (To show), वर्णितवान् –वर्णन किया (Described),उदरवेदना – पेट में दर्द (Stomachache), ज्वरः – बुखार (Fever)।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): -
नागार्जुन रसायनशास्त्र को जानने वाला और प्रसिद्ध वैद्य था। वह दिन-रात प्रयोगशाला में काम करता था। एक बार उसने महाराज से निवेदन किया- “महाराज, मेरे चिकित्सा के कार्य के लिए एक सहायक की आवश्यकता है। ” राजा ने इसे स्वीकार किया और कहा, ‘ठीक है, मैं व्यवस्था करता हूँ। कल कुछ योग्य युवक आएँगे। आप परीक्षा करके उन युवकों में से किसी भी योग्य (युवक) को स्वीकार कर लीजिए ।
दूसरे दिन दो युवक आए। नागार्जुन ने दोनों के विद्या के अभ्यास के विषय में पूछा। दोनों का विद्याभ्यास का विषय भी समान ही था। तब नागार्जुन ने उन दोनों को एक विशेष रसायन बनाकर लाने के लिए कहा। उसके लिए दो दिन का समय दिया । उसने ” जाने के समय राजमार्ग से जाओ” ऐसा भी कहा ।
दो दिन के बाद नागार्जुन के पास पहला युवक आया । ” दवाई बनाने में आपको कोई कष्ट तो नहीं हुआ?” ऐसा नागार्जुन ने पूछा । युवक ने अपनी निष्ठा (भक्ति) दिखाने के लिए अपने घर की समस्या का वर्णन किया- “पिता के पेट में दर्द और माता को बुखार था, तो भी मैंने सब कुछ छोड़कर दवाई बनाई” ऐसा कहकर उसने नागार्जुन को वह रसायन (दवाई) दे दिया।
➤ तदभ्यन्तरे द्वितीयः युवकः अपि आगतवान्। सः खिन्नः आसीत् । तमपि नागार्जुनः पृष्टवान्। तदा युवकः उक्तवान् “अहम् औषधं निर्मातुं न शक्तवान् ” इति । ” किमर्थं न शक्तवान् ? ” इति नागार्जुनः पृच्छति ।
युवकः उक्तवान्- “राजमार्गे अहं किञ्चित् रोगिणं दृष्टवान् । तस्य परिस्थितिः शोचनीया आसीत् । अहं तं स्वगृहं नीतवान् | दिनद्वयं तस्य एव सेवायां निरतः आसम् । अद्य प्रातः सः स्वस्थः अभवत् । अहं ततः साक्षात् अत्र आगतवान् । रसायननिर्माणार्थं समयम् एव न प्राप्तवान्” इति।
तदनन्तरं नागार्जुनः द्वितीयं युवकं सहायकत्वेन स्वीकृतवान् । राजा एतं वृत्तान्तं श्रुत्वा आश्चर्यं प्रकटितवान्। सः नागार्जुनं पृष्टवान्- “प्रथमः युवक: औषधं कृत्वा आनीतवान्। द्वितीयः तथा न कृतवान् । तथापि भवान् किमर्थं द्वितीयं चितवान् ” ?
नागार्जुनः अवदत्– “द्वितीयः अपि औषधनिर्माणे कुशलः अस्ति । किन्तु तेन समयः न प्राप्तः । यतः सः सेवायां निरतः आसीत्। तं रोगिणम् अहं पूर्वमेव मार्गे दृष्टवान् । अतः “ राजमार्गेण गन्तव्यम्” इति अहं युवकद्वयं सूचितवान् । प्रथमः रोगिणं
दृष्ट्वा अपि अग्रे गतवान्। सः यन्त्रवत् कार्यं करोति । तस्मिन् सेवायाः भावना नास्ति । सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत् ? अतः अहं द्वितीयस्य चयनं कृतवान्” इति।
शब्दार्था: (Word Meanings) : तदभ्यन्तरे – इसके बाद (After that), खिन्नः – दुखी (Sad), निर्मातुम् – बनाने के लिए (To make), शक्तवान् – समर्थ (सका) (Could do), किञ्चित – किसी (Any), रोगिणं – बीमार को (For sick person), शोचनीया – दयनीया (गम्भीर) (Miserable), स्वगृहं – अपने घर (Your home), नीतवान् – ले गया (Took away), निरतः – मग्न (Engrossed), प्राप्तवान् – मिला (Found), स्वीकृतवान् – स्वीकार किया (Accepted), वृत्तान्तम् – प्रसङ्ग को (Anecdote), प्रकटितवान् – प्रकट किया (Revealed), आनीतवान्-लाया (Brought), कृतवान् – किया (Did), चितवान् – चुना (Selected), पूर्वमेव – पहले ही (Already), गन्तव्यम् – जाना चाहिए, सेवाभावनां – सेवा (Should go), अग्रे – आगे (Ahead), यन्त्रवत् – मशीन की तरह (Like a machine), सेवायाः – सेवा की (Served), सेवाभावनां – सेवा की भावना (Spirit of Service)।
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation): -
उसके बाद दूसरा युवक भी आया। वह दुखी था । उसको भी नागार्जुन ने पूछा। तब युवक ने कहा, “मैं दवाई नहीं बना सका । ” क्यों नहीं बना सके? नागार्जुन ने पूछा।
युवक ने कहा- राजमार्ग में मैंने किसी रोगी को देखा। उसकी हालत बहुत दयनीय थी । मैं उसे अपने घर ले गया। दो दिन उसकी ही सेवा में लगा हुआ था। आज सुबह वह स्वस्थ (ठीक) हो गया। उसके बाद मैं यहाँ आ गया। दवाई बनाने का समय ही नहीं मिला।
उसके बाद नागार्जुन ने दूसरे युवक को सहायक के रूप में स्वीकार कर लिया। राजा ने इस घटना को सुनकर आश्चर्य प्रकट किया। उसने नागार्जुन से पूछा – ” पहला युवक दवाई बनाकर लाया। दूसरे ने वैसा नहीं किया। तो भी आपने दूसरे को क्यों चुना?” नागार्जुन बोला- “दूसरा भी दवाई बनाने में कुशल है ।
किन्तु उसे समय नहीं मिला। क्योंकि वह सेवा में लगा हुआ था। उस रोगी को मैंने पहले ही रास्ते में देखा था। इसलिए ‘राजमार्ग से जाना’ ऐसा मैंने दोनों युवकों को सूचित किया। पहला (युवक) रोगी को देखकर भी आगे चला गया। वह मशीन की तरह काम करता है। उसमें सेवा भावना नहीं है । सेवा भावना के बिना वैद्य (डॉक्टर) कैसे हो सकता है ? इसलिए मैंने दूसरे को चुना । “
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