Class 9 Sanskrit Iravati Chapter 10 सहजः स्वास्थ्यलाभः | NCERT Translation, Question Answrs & Solutions

Class 9 Sanskrit Iravati Chapter 10 सहजः स्वास्थ्यलाभः | NCERT Translation, Question Answrs & Solutions


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पाठ: १० सहजः स्वास्थ्यलाभः  

हमारे दैनिक जीवन में स्वास्थ्य-सुरक्षा एवं रोग-निवारण के लिए अनेक औषधीय वनस्पतियों का विशेष महत्त्व है। सहज रूप से उपलब्ध तुलसी, आँवला, नीम, हल्दी तथा अदरक न केवल भोजन के अंग हैं, अपितु उत्तम औषधि के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं। निरंतर उपयोग में आने वाली इन वनस्पतियों से रोग-प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि होती है। पाठ में वर्णित औषधीय गुणों से युक्त वनस्पतियाँ हमारे दैनिक जीवन के लिए सहज स्वास्थ्य लाभकारी हैं तथा प्राकृतिक गुणों से युक्त हैं। अतः 'सहजः स्वास्थ्यलाभः' पाठ के अंतर्गत आए हुए श्लोक भावमिश्र द्वारा रचित भावप्रकाश नामक आयुर्वेदीय ग्रंथ से संकलित है। इस पाठ में वर्णित वनस्पतियों के आयुर्वेदीय गुणों एवं स्वास्थ्यवर्धक महत्त्व का विवेचन किया गया है।  

Numerous medicinal plants hold special significance in our daily life for the preservation of health and the prevention of diseases. Easily available herbs such as Tulsi (Holy Basil), Amla (Indian Gooseberry), Neem, Turmeric and Ginger are not only integral parts of our diet but are also used as excellent medicines. The regular use of these plants helps enhance the body's immunity. Endowed with the medicinal properties described in the lesson, these plants are naturally beneficial for maintaining good health in everyday life. This Chapter 'Sahajah Svāsthyalābhah' is a compilation of verses from the text Bhāvaprakāśa written by Bhāvamiśra. In this Ayurvedic properties and importance of a few herbs are discussed. 

तुलसी

तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्रपार्श्वरुककफवातजित्॥

Hindi Translation :

तुलसी कटु और तिक्त रस वाली, हृदय के लिए हितकारी तथा उष्ण प्रकृति की होती है। यह दाह और पित्त को उत्पन्न कर सकती है। यह पाचन-अग्नि को प्रदीप्त करने वाली है। यह कुष्ठ, मूत्रकृच्छ्र (मूत्र त्याग में कठिनाई), रक्तदोष, पार्श्वशूल (बगल/पक्ष का दर्द) तथा कफ-वात संबंधी विकारों को दूर करने में सहायक मानी गई है।

English Translation :

Tulsi (Holy Basil) has a pungent and bitter taste, is beneficial for the heart, and has a hot potency. It may cause burning sensation and aggravate Pitta. It stimulates the digestive fire and is therefore called Deepani. It is described as being helpful in conditions such as skin disorders, difficulty in urination, blood disorders, pain in the sides of the body, and Kapha- and Vata-related disorders.

पदच्छेदः

तुलसी कटुका तिक्ता हृद्या उष्णा दाह-पित्त-कृत् दीपनी कुष्ठ कृच्छ्र अस्र पार्श्वरुक् कफ वात जित्।

अन्वयः

तुलसी कटुका, तिक्ता, हृद्या, उष्णा (च अस्ति)। सा दाहं पित्तं च करोति, दीपनी (च भवति)। सा कुष्ठ-कृच्छ्रास्र-पार्श्वरुक्-कफ वातजित्।

भावार्थः

तुलसी कटु-तिक्तरससम्पन्ना, उष्णवीर्या तथा च हृद्या भवति। उष्णवीर्यत्वेन जठराग्निं प्रदीपयति, अतः दीपनी इति कथिता। कफवातशमनी सती श्वास-कासादिषु, च वातकफजविकारेषु हितकरा भवति। रक्तदोष-कुष्ठ-मूत्रकृच्छ्र-पार्श्वशूलादिषु तस्याः उपयोगः प्रशस्तः। उष्णस्वभावात् तथा पित्तप्रकोपं जनयितुमपि शक्नोति अतः पित्तप्रधानप्रकृतिषु अस्याः मितसेवनम् अपेक्षितम्।

Hindi Translation :

तुलसी का स्वाद कड़वा और तीखा होता है। इसकी प्रकृति उष्ण होती है तथा यह हृदय के लिए हितकारी मानी जाती है। अपनी उष्ण प्रकृति के कारण यह जठराग्नि को प्रज्वलित करती है, इसलिए इसे दीपनी कहा गया है। यह कफ और वात को शांत करने वाली है। इसलिए श्वास, खाँसी तथा वात-कफ से संबंधित रोगों में यह लाभकारी होती है। रक्तदोष, कुष्ठ, मूत्र करने में कठिनाई, पार्श्व में होने वाले दर्द आदि में भी इसका प्रयोग उपयोगी माना गया है। इसके उष्ण स्वभाव के कारण यह पित्त को भी बढ़ा सकती है। इसलिए पित्त-प्रधान प्रकृति वाले लोगों के लिए इसका सेवन सीमित मात्रा में करना उचित है।

English Translation :

Tulsi has a bitter and pungent taste. It possesses a hot potency and is considered beneficial for the heart. Due to its hot nature, it stimulates the digestive fire, and therefore it is called Deepani (that which kindles digestion). It helps balance Kapha and Vata and is beneficial in conditions such as breathing difficulties, cough, and disorders caused by an imbalance of Vata and Kapha. It is also considered useful in conditions related to blood disorders, skin diseases such as leprosy, difficulty in urination, pain in the sides of the body, and similar conditions. Because of its hot nature, Tulsi may also aggravate Pitta. Therefore, people with a Pitta-dominant constitution are advised to consume it in moderation.


आमलकम्

हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः।
कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित्॥

Hindi Translation :

धात्री (आँवला) का फल अपनी अम्लता (खट्टेपन) के कारण वात दोष को शांत करता है। अपनी मधुरता और शीतलता के कारण यह पित्त दोष को शांत करता है। अपनी रूक्षता और कषायता के कारण यह कफ दोष को दूर करता है। इसलिए धात्री (आँवला) का फल त्रिदोषों—वात, पित्त और कफ—को संतुलित करने वाला माना गया है।

English Translation :

The fruit of Dhatri (Amla/Indian Gooseberry) alleviates Vata because of its sourness. Due to its sweet taste and cooling nature, it alleviates Pitta. Because of its dry and astringent qualities, it helps alleviate Kapha. Therefore, Dhatri fruit is described as beneficial for balancing all three doshas—Vata, Pitta, and Kapha.

पदच्छेदः

हन्ति वातम् तत्-अम्लत्वात् पित्तम् माधुर्य-शैत्यतः कफम् रूक्ष-कषायत्वात् फलम् धात्र्याः त्रिदोष-जित्।

अन्वयः

धात्र्याः फलं तत् अम्लत्वात् वातं हन्ति, माधुर्यशैत्यतः पित्तं (हन्ति), रूक्षकषायत्वात् कफं (हन्ति)। अतः धात्र्याः फलं त्रिदोषजित् (अस्ति)।

भावार्थः

धात्रीफलम् (आमलकं) षड्रसयुक्तत्वात् विशिष्टमहत्त्वं धारयति। तस्य प्रमुखोऽम्लरसः वातशमनाय कारणं भवति। मधुरविपाकत्वात् तथा शीतवीर्यत्वात् पित्तदोषस्य प्रशमनं भवति। कषायरसप्रधानत्वेन रूक्षगुणेन च कफदोषोऽपि शमं याति। एवं परस्परविरुद्धगुणसमन्वितत्वात् धात्रीफलं त्रिदोषहराणां द्रव्याणां मध्ये श्रेष्ठत्वेन परिगण्यते। रसायनत्वात् च दीर्घायुष्य-बल-वर्ण-ओजः वर्धनाय प्रशस्यते।

Hindi Translation :

धात्रीफल (आँवला) षड्रसयुक्त होने के कारण विशेष महत्त्व रखता है। इसमें मुख्य रूप से अम्ल रस पाया जाता है, जो वात दोष को शांत करने में सहायक होता है। इसके मधुर विपाक तथा शीत वीर्य के कारण पित्त दोष का शमन होता है। कषाय रस की प्रधानता और रूक्ष गुण के कारण कफ दोष भी शांत होता है।

इस प्रकार, परस्पर विरोधी गुणों से युक्त होने के कारण धात्रीफल को त्रिदोषों—वात, पित्त और कफ—को शांत करने वाले द्रव्यों में श्रेष्ठ माना गया है। इसके रसायन गुण के कारण यह दीर्घायु, बल, वर्ण और ओज की वृद्धि के लिए भी प्रशंसनीय माना गया है।

English Translation :

The Dhatri fruit (Amla/Indian Gooseberry) is considered particularly important because it possesses all six tastes (Shad-rasa). Its principal taste is sour, which helps pacify the Vata dosha. Due to its sweet post-digestive effect (Madhura Vipaka) and cooling potency (Shita Virya), it helps pacify Pitta dosha. Because of its predominant astringent taste (Kashaya Rasa) and dry quality (Ruksha Guna), it also helps calm Kapha dosha.

Thus, because of its combination of apparently opposing qualities, Dhatri fruit is regarded as one of the important substances that helps balance all three doshas—Vata, Pitta, and Kapha. Because of its Rasayana (rejuvenating) property, it is also praised for supporting longevity, strength, complexion, and Ojas (vitality).

निम्बः

निम्बफलं रसे तिक्तं पाके तु कटुभेदनम्।
स्निग्धं लघुष्णं कुष्ठघ्नं गुल्मार्शःकृमिमेहनुत्॥

Hindi Translation :

नीम का फल स्वाद में तिक्त (कड़वा) होता है और पाचन के बाद कटु प्रभाव वाला माना जाता है। यह स्निग्ध, हल्का और उष्ण होता है। यह कुष्ठ (त्वचा रोग), गुल्म (पेट की गाँठ/उदर विकार), अर्श (बवासीर), कृमि (आंतों के कीड़े) तथा मेह (मूत्र संबंधी विकार) को दूर करने में सहायक माना गया है।

English Translation :

The fruit of Neem has a bitter taste and is described as having a pungent effect after digestion. It is considered unctuous, light, and warm in nature. It is described as being helpful in conditions such as skin disorders, abdominal masses or disorders (Gulma), piles (Arsha), intestinal worms (Krimi), and urinary disorders (Meha).

पदच्छेदः

निम्बफलम् रसे तिक्तम् पाके तु कटु-भेदनम् स्निग्धम् लघु-उष्णम् कुष्ठ-घ्नम् गुल्म-अर्श-कृमि-मेह-नुत्।

अन्वयः

निम्बफलं रसे तिक्तम्, पाके तु कटु तथा भेदनं (भवति)। (तत्) स्निग्धं, लघु, उष्णं, कुष्ठघ्नं, गुल्मार्श-कृमिमेहनुत् (च भवति)।

भावार्थः

निम्ब्फलं स्वभावतः तिक्तरसप्रधानं कटुविपाकयुक्तं च भवति। स्निग्धत्वेन वातस्य अतिप्रकोपं न करोति, उष्णवीर्यत्वेन च कफवातशमनं करोति। भेदनगुणयुक्तत्वात् मलसङ्गं निवारयति। तस्य कुष्ठ-गुल्म-अर्श-कृमि-प्रमेहादिषु विशेषोपयोगिता निर्दिष्टा अस्ति। अतः निम्बफलं दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारित्वेन आयुर्वेदे प्रशस्यते।  

Hindi Translation :

नीम का फल स्वभाव से तिक्त रस (कड़वे स्वाद) वाला और कटु विपाक युक्त होता है। इसके स्निग्ध गुण के कारण यह वात दोष को अत्यधिक बढ़ने नहीं देता तथा उष्ण वीर्य के कारण कफ और वात दोष को शांत करने में सहायक होता है। इसके भेदन गुण के कारण यह मल के रुकने या कब्ज जैसी स्थिति को दूर करने में सहायक होता है।

नीम के फल का कुष्ठ, गुल्म, अर्श, कृमि और प्रमेह आदि रोगों में विशेष उपयोग बताया गया है। इसलिए आयुर्वेद में नीम के फल को दोषों के शोधन और रोगों के शमन में सहायक होने के कारण प्रशंसनीय माना गया है।

English Translation :

The fruit of Neem is naturally dominated by a bitter taste (Tikta Rasa) and has a pungent post-digestive effect (Katu Vipaka). Due to its unctuous quality (Snigdha Guna), it does not excessively aggravate Vata. Because of its hot potency (Ushna Virya), it helps pacify Vata and Kapha.

Because of its clearing or evacuating property (Bhedana Guna), it helps relieve the accumulation or obstruction of stool. The fruit of Neem is described as having particular usefulness in conditions such as skin disorders (Kushtha), abdominal disorders or masses (Gulma), piles (Arsha), intestinal worms (Krimi), and Prameha.

Therefore, in Ayurveda, Neem fruit is praised for its role in helping cleanse the doshas and alleviate diseases.


हरिद्रा  

हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत्।
वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्रशोथपाण्डुव्रणापहा॥  

Hindi Translation :

हरिद्रा (हल्दी) कटु और तिक्त रस वाली, रूक्ष तथा उष्ण प्रकृति की होती है। यह कफ और पित्त दोष को शांत करने वाली मानी जाती है। यह वर्ण को निखारने वाली (वर्ण्या) है तथा त्वचा के विकार, मेह/प्रमेह, रक्तदोष, सूजन, पाण्डु रोग और घाव को दूर करने में सहायक मानी गई है।

English Translation :

Haridra (Turmeric) has a pungent and bitter taste and is dry and hot in nature. It is described as helping to pacify Kapha and Pitta doshas. It is considered beneficial for complexion and is described as being helpful in conditions such as skin disorders, urinary/metabolic disorders (Meha), blood disorders, swelling, Pandu (pallor/anemia-like condition), and wounds.


पदच्छेदः

हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षा उष्णा कफ-पित्त-नुत् वर्ण्या त्वक्-दोष-मेह-अस्र-शोथ-पाण्डु-व्रण-अपहा।  

अन्वयः

हरिद्रा कटुका, तिक्ता, रूक्षा, उष्णा, कफपित्तनुत् (च अस्ति)। (सा) वर्ण्या (तथा च) त्वग्दोषमेहास्रशोथ-पाण्डुव्रणापहा (भवति)।  

भावार्थः

हरिद्रा कटु-तिक्तरससम्पन्ना, रूक्षगुणा उष्णवीर्या च भवति। कटु-तिक्तरसाभ्यां कफस्य शमनं करोति, उष्णवीर्येण स्तब्धतां शोथं च निवारयति। तस्याः रक्तप्रसादकत्वात् वर्ण्यत्वं प्रसिद्धम्। प्रमेह-त्वग्विकार-रक्तदोष-शोथ-पाण्डुरोग-व्रणेषु हरिद्राया विशिष्टोपयोगिता आयुर्वेदग्रन्थेषु प्रतिपादिता। व्रणशोधन-रोपणकर्मणि कुष्ठादिरोगेषु च अपि हरिद्रा प्रशस्ता मन्यते।  

Hindi Translation :

हरिद्रा (हल्दी) कटु और तिक्त रस से युक्त, रूक्ष गुण वाली तथा उष्ण वीर्य की होती है। कटु और तिक्त रस के कारण यह कफ दोष को शांत करने में सहायक होती है। अपनी उष्ण वीर्यता के कारण यह जकड़न और सूजन को दूर करने में सहायक मानी जाती है।

हरिद्रा के रक्त को प्रसन्न/शुद्ध करने वाले गुण के कारण इसे वर्ण को निखारने वाली माना जाता है। आयुर्वेद के ग्रंथों में प्रमेह, त्वचा के विकार, रक्तदोष, सूजन, पाण्डुरोग और घावों में हरिद्रा के विशेष उपयोग का वर्णन किया गया है। घावों की शोधन और रोपण क्रिया तथा कुष्ठ आदि रोगों में भी हरिद्रा को उपयोगी माना गया है।

English Translation :

Haridra (Turmeric) possesses a pungent and bitter taste, has a dry quality, and has hot potency. Due to its pungent and bitter tastes, it helps to pacify Kapha dosha. Because of its hot potency, it is described as helping to relieve stiffness and swelling.

Because Haridra is traditionally regarded as having a blood-purifying or blood-supporting effect, it is considered beneficial for improving complexion. Ayurvedic texts describe the specific usefulness of Haridra in conditions such as Prameha, skin disorders, blood disorders, swelling, Pandu, and wounds. Haridra is also traditionally considered beneficial for wound cleansing and healing, as well as for Kushtha and related disorders.


आर्द्रकम्

कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा।
ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्यास्तेऽपि सन्त्यार्द्रकेऽखिलाः॥

Hindi Translation :

शुण्ठी (सूखी अदरक) कटु रस वाली और पाचन के बाद मधुर विपाक वाली होती है। यह रूक्ष गुण वाली है तथा वात और कफ दोष को शांत करने वाली मानी जाती है।

शुण्ठी के जो-जो गुण बताए गए हैं, वे सभी गुण आर्द्रक (ताजा अदरक) में भी पाए जाते हैं।

English Translation :

Shunthi (dry ginger) has a pungent taste and a sweet post-digestive effect (Madhura Vipaka). It has a dry quality and is described as helping to pacify Vata and Kapha doshas.

All the qualities that are described for Shunthi (dry ginger) are also present in Ardraka (fresh ginger).

पदच्छेदः

कटुका मधुरा पाके रूक्षा वात-कफ-अपहा ये गुणाः कथिताः शुण्ठ्याः ते अपि सन्ति आर्द्रके अखिलाः।
अन्वयः

(शुण्ठी) कटुका मधुरा पाके रूक्षा वातकफापहा (च अस्ति)। ये गुणाः शुण्ठ्याः कथिताः, ते अखिलाः अपि (गुणाः) आर्द्रके सन्ति।

भावार्थः

अत्र आर्द्रकस्य गुणाः शुण्ठ्या समानाः एवेति निरूपिताः। यद्यपि आर्द्रकं शुण्ठ्याः पूर्वावस्था अस्ति, तथापि तयोः गुणास्तु समाना एव। आर्द्रकं कटुरसात्मकं, मधुरविपाकयुक्तं, रूक्षगुणप्रधानं, वातकफशामकं च भवति। अतः अग्निमान्द्ये, अरचौ, आमदोषे, कफप्रधानकास-श्वासयोः, ग्रहणीविकारादिषु चैतत् हितकरम्।

Hindi Translation :

यहाँ बताया गया है कि आर्द्रक (ताजा अदरक) के गुण शुण्ठी (सूखी अदरक) के समान ही होते हैं। यद्यपि आर्द्रक, शुण्ठी की प्रारम्भिक अवस्था है, फिर भी दोनों के गुण समान माने गए हैं।

आर्द्रक कटु रस वाला, मधुर विपाक युक्त, रूक्ष गुण प्रधान तथा वात और कफ दोष को शांत करने वाला होता है। इसलिए यह अग्निमांद्य (पाचन शक्ति की कमी), अरुचि (भूख न लगना/खाने में रुचि न होना), आमदोष, कफ प्रधान कास-श्वास (खाँसी और श्वास संबंधी विकार) तथा ग्रहणी विकार आदि में हितकर माना गया है।

English Translation :

It is stated here that the qualities of Ardraka (fresh ginger) are the same as those of Shunthi (dry ginger). Although Ardraka is considered the earlier or fresh form of Shunthi, both are described as having the same qualities.

Ardraka has a pungent taste, a sweet post-digestive effect (Madhura Vipaka), is predominantly dry in quality, and is described as helping to pacify Vata and Kapha doshas. Therefore, it is considered beneficial in conditions such as weak digestion (Agnimandya), loss of appetite or taste (Aruchi), Ama-related disorders, Kapha-dominant cough and breathing disorders (Kasa-Shwasa), and disorders of Grahani.



अत्र इदम् अवधेयम्

अनेकपदानाम् एकपदीकरणं समासः इति कथ्यते, यथा—

 विग्रहवाक्यम् 

 समस्तपदम् 

 माता च पिता च

 मातापितरौ

 महान् पुरुषः

 महापुरुषः

 पीतम् अम्बरं यस्य सः

 पीताम्बरः

 राज्ञः सेवकः

 राजसेवकः

 त्रयाणां भुवनानां समाहारः

 त्रिभुवनम्

 दिने दिने

 प्रतिदिनम्


अस्मिन् पाठे कानिचन समस्तपदानि अपि सन्ति, यथा—
 * कफं वातं च जयति इति – कफवातजित्
 * माधुर्यं च शैत्यं च, तस्मात् – माधुर्यशैत्यतः
 * कुष्ठं हन्ति इति – कुष्ठघ्नम्
 * रूक्षा चासौ उष्णा चेति – रूक्षोष्णा
 * पित्तं वर्धयति इति – पित्तवर्धनम्


वयम् अभ्यासं कुर्मः
१. एकपदेन उत्तरत—

क. कस्य फलं त्रिदोषजित् अस्ति ?

ख. कफवातशामिनी सती श्वास-कासादिषु का हितकरा भवति ?

ग. हरिद्रा कस्मात् कारणात् वर्ण्या प्रसिद्धा ?

घ. निम्बफलस्य रसः कीदृशः भवति ?

उत्तरम् : 

क. आम्लक्याः  

ख. तुलसी 

ग. रक्तप्रसादकत्वात् 

घ. तिक्त्त 

२. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

क. धात्रीफलं रसायनत्वात् किमर्थं प्रशस्यते ?

ख. आर्द्रकस्य गुणाः कया सह समाना निरूपिताः सन्ति ?

ग. हरिद्रा केषां रोगाणां नाशं करोति ?


उत्तरम् : 

क. धात्रीफलं रसायनत्वात् दीर्घायुष्य-बल-वर्णः-ओजः वर्धनाय प्रशस्यते। 

ख. आर्द्रकस्य गुणाः शुण्ठ्या  सह समाना निरूपिताः सन्ति। 

ग. हरिद्रा प्रमेह-त्वग्विकार-शोथ-पान्दुरोगादि  रोगाणां नाशं करोति। 
 
३. कोष्ठकात् उचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत—

क. तुलसी ................. स्वभावत्वात् दाहं जनयितुमपि शक्नोति। (शीत / उष्ण)

ख. निम्बफलम् ................. दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारि भवति। (आयुर्वेदे / भोजने).

ग. आर्द्रकं ................. विपाकयुक्तं भवति। (कटु / मधुर)

उत्तरम् : 

क. तुलसी उष्ण स्वभावत्वात् दाहं जनयितुमपि शक्नोति।

ख. निम्बफलम् आयुर्वेदे दोषशोधनपूर्वकं रोगप्रशमनकारि भवति। 

ग. आर्द्रकं मधुर विपाकयुक्तं भवति। 

४. उचितं मेलनं कुरुत—

 स्तम्भः 'क'

 स्तम्भः 'ख'

 (१) निम्बः

 क. षड्रसयुक्तं त्रिदोषजित् च अस्ति। 

(२) तुलसी

 ख. अग्निमान्द्ये अरचौ च हितकरं भवति।

(३) आर्द्रकम्

 ग. कटु-तिक्तरससम्पन्ना हृद्या च भवति।

(४) आमलकम्

 घ. स्वभावतः तिक्तरसप्रधानं कुष्ठघ्नं च भवति।

 (५) हरिद्रा

 ङ. व्रणशोधन-रोपणकर्मणि सर्वथा प्रशस्ता अस्ति।


उत्तरम् : 

स्तम्भः 'क'

 स्तम्भः 'ख'

(१) निम्बः

 घ. स्वभावतः तिक्तरसप्रधानं कुष्ठघ्नं च भवति।

(२) तुलसी

 ग. कटु-तिक्तरससम्पन्ना हृद्या च भवति।

(३) आर्द्रकम्

ख. अग्निमान्द्ये अरचौ च हितकरं भवति।

(४) आमलकम्

क. षड्रसयुक्तं त्रिदोषजित् च अस्ति।

(५) हरिद्रा

ङ. व्रणशोधन-रोपणकर्मणि सर्वथा प्रशस्ता अस्ति।


क्रियाकलापः

१. अभिनय-कला-माध्यमेन वानस्पति-परिचयः

गतिविधिः छात्राः कक्षायां पञ्चसमूहेषु विभक्ताः भवेयुः। प्रत्येकं समूहः एकस्याः वनस्पतेः (तुलसी, आमलकं, निम्बः, हरिद्रा, आर्द्रकम्) रूपं धृत्वा आत्मपरिचयं संस्कृतेन प्रस्तौतु।

संवाद-प्रारूपम् (यथा हरिद्रा) “अहं हरिद्रा अस्मि। मम रसः कटु-तिक्तः अस्ति। अहं त्वग्दोषं व्रणं च नाशयामि। मम वर्णः पीतः अस्ति।” अनेन छात्राणां सम्भाषणकौशलस्य विकासः भविष्यति।


२. औषध-पर्ण-चित्रणम्

गतिविधिः छात्राः स्वगृहात् उद्यानात् वा एतासां वनस्पतीनां (तुलसी, निम्बः, आमलकम् इत्यादि) पादपानां पर्णानि एकत्रितानि कृत्वा तेषाम् उपयोगेन एकां 'सञ्चिका' रचयन्तु।

३. विषयः- 'मम गृहे स्वास्थ्य-रक्षक-वनस्पतयः'

कार्यविवरणम्

छात्राः स्वगृहे पाकशालायाम् उद्याने वा उपलब्धानां वनस्पतीनां सूचीं निर्मान्तु। जननी-जनकयोः (मातापित्रोः) साहाय्येन तासाम् आयुर्वेदीयं महत्त्वं ज्ञात्वा संस्कृते पञ्च वाक्यानि सचित्रं लिखन्तु।

४. विषयः- 'त्रिदोष-शमन-सारणी'

कार्यविवरणम्

पाठाधारेण वात-पित्त-कफदोषान् शमयितुं के पादपाः योग्याः इति प्रदर्शयन्तीम् एकां 'भित्तिपत्रिकां' रचयन्तु। यथा— 'आमलकम् अम्लत्वात् वातं हन्ति, माधुर्यात् पित्तं हन्ति' इत्यादिविषयः भित्तिपत्रिकायां चित्रमाध्यमेन सुस्पष्टीकृतः भवेत्।

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