Class 9 Sanskrit Iravati Chapter 4 नीतिवचनानि | NCERT Translation, Question Answers & Solutions

Class 9 Sanskrit Iravati Chapter 4 नीतिवचनानि | NCERT Translation, Question Answers & Solutions

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Chapter 4: पाठः  नीतिवचनानि  (Nītivacanāni – Moral Sayings / Maxims)


हिन्दी पाठ

प्राचीन आचार्यों ने अपने अनुभवों एवं जीवन-मूल्यों को संक्षिप्त, सरल तथा प्रभावशाली वचनों के माध्यम से प्रस्तुत किया है, जिन्हें नीतिवचन कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ ‘नीतिवचनानि’ के श्लोक मुख्यतः नारायणपण्डितरचित हितोपदेश तथा भर्तृहरि-प्रणीत नीतिशतकम् से संकलित हैं।
 
Ancient scholars expressed their wisdom, experiences and life lessons through concise and meaningful sayings known as Nītivacanas (moral maxims). The lesson ‘Nītivacanāni’ is mainly compiled from two renowned Sanskrit works—Hitopadeś by Narayanpandit and Nītiśatakam by Bhartrhari.


सम्पत्तौ च विपत्तौ च महामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये यथा॥१॥


हिन्दी अर्थ : जिस प्रकार सूर्य उदय के समय लाल दिखाई देता है और अस्त होते समय भी लाल ही दिखाई देता है, उसी प्रकार महान् व्यक्ति सुख-संपत्ति और दुःख-विपत्ति दोनों परिस्थितियों में समान भाव रखता है।
 
English Translation:  Just as the Sun remains red at both sunrise and sunset, a great person remains steady and composed in both prosperity and adversity.



पदच्छेद : सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता उदये सविता रक्तः रक्तः च अस्तमये रक्तः च यथा।

अन्वयः - यथा सविता उदये रक्तः अस्तमये च रक्तः (भवति), तथा महतां सम्पत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता (भवति)।

 
भावार्थः यथा सूर्यः उदयकाले रक्तवर्णः भवति, अस्तसमयेऽपि रक्तवर्णः एव दृश्यते, तथा एवं प्रकारेण महान् सजनानां सम्पत्तिकाले विपत्तिकाले स्वभावे, आचरणे च समानता एव भवति। ते सुखदुःखयोः प्रमाणेन न परिवर्तन्ते।

Hindi Translation: जिस प्रकार सूर्य उदय के समय लाल रंग का होता है और अस्त होते समय भी उसी लाल रंग का दिखाई देता है, उसी प्रकार महान् सज्जन व्यक्ति सुख और दुःख, सम्पत्ति और विपत्ति—दोनों परिस्थितियों में अपने स्वभाव और आचरण को समान रखते हैं। वे सुख-दुःख के अनुसार अपने व्यवहार को नहीं बदलते।

English Translation: Just as the Sun appears red both at sunrise and sunset, great and noble people maintain the same nature and conduct in both prosperity and adversity. They do not change their behaviour according to happiness or sorrow.
 

यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥२॥
Hindi Translation: 
यौवन, धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व और अविवेक—इनमें से प्रत्येक अकेला भी अनर्थ का कारण बन सकता है। फिर जहाँ ये चारों एक साथ हों, वहाँ क्या कहना!
 
English Translation: Youth, wealth, power and lack of discrimination—each of these can independently become a cause of misfortune. What, then, can be said when all four are present together?


पदच्छेद: यौवनम् धनसम्पत्तिः प्रभुत्वम् अविवेकिता एकैकम् अपि अनर्थाय किम् उ यत्र चतुष्टयम्।



अन्वय: यौवनम्, धनसम्पत्तिः, प्रभुत्वम्, अविवेकिता च एतेषु एकैकम् अपि अनर्थाय भवति; यत्र चतुष्टयम् (तत्र) किमु (कथनीयम्)?
 

भावार्थ: यौवनं, धनसम्पत्तिः, प्रभुत्वम्, अविवेकिता च एतानि चत्वारि मनुष्यस्य पतनकारणानि भवन्ति। एतेषु एकैकम् अपि महत् अनर्थं जनयति। यदा एतानि चत्वारि एकत्र भवन्ति, तदा तस्य जनस्य विनाशः निश्चितः एव भवति।

 
Hindi Translation: यौवन, धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व और अविवेक—ये चारों मनुष्य के पतन के कारण बन सकते हैं। इनमें से प्रत्येक अकेला भी बड़े अनर्थ को उत्पन्न कर सकता है। जब ये चारों एक साथ किसी व्यक्ति में होते हैं, तब उसके विनाश की संभावना निश्चित हो जाती है।
 
English Translation: Youth, wealth, power and lack of wisdom can become causes of a person's downfall. Each one of these, even individually, can cause great harm. When all four are present together, the person's downfall becomes almost certain.



दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥३॥


Hindi Translation: जिस दान को यह सोचकर दिया जाता है कि “दान देना चाहिए”, और जो बिना किसी प्रत्युपकार की अपेक्षा के, उचित स्थान, उचित समय तथा योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, उस दान को सात्त्विक दान कहा गया है।
 
English Translation: A gift that is given with the thought “it is my duty to give”, without expecting anything in return, and given at the proper place, proper time and to a worthy person, is considered Sāttvika Dāna (a pure and virtuous form of charity).


पदच्छेद: दातव्यम् इति यत् दानम् दीयते अनुपकारिणे देशे काले च पात्रे च तत् दानम् सात्त्विकम् स्मृतम्।


अन्वय: दातव्यमिति यत् दानम् अनुपकारिणे देशे काले च पात्रे च दीयते, तत् दानम् सात्त्विकम् स्मृतम्।



भावार्थ: यत दानं कर्त्तव्यबुद्ध्या, प्रत्युपकारस्य अपेक्षां विना, योग्ये देशे, उचिते काले, सुपात्राय च दीयते, तत दानं सात्त्विकदानम इति विद्वद्भिः स्मृतम। एतादृशं दानं शुद्धभावेन लोककल्याणाय क्रियते। 

Hindi Translation: जो दान कर्तव्य की भावना से, बिना बदले की उम्मीद के, सही जगह, सही समय पर और सही व्यक्ति को दिया जाता है, उसे विद्वान लोग सात्विक दान मानते हैं। ऐसा दान लोगों की भलाई के लिए सच्चे दिल से किया जाता है।

English Translation:  That charity which is given with the intellect of duty, without expectation of reciprocation, in the right place, at the right time, and to the right person, is regarded by the learned as Sattvic charity. Such charity is made with a pure heart for the welfare of the people.


त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। 
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्

Hindi Translation: परिवार के लिए एक को छोड़ो। गांव के लिए कुल को छोड़ो। जनपद के लिए गांव को छोड़ो। आत्मा के लिए धरती को छोड़ो।

English Translation: Leave one in the sense of the family. Leave the clan for the sake of the village. Leave the village for the sake of the Janapada. Leave the earth for the sake of the soul.

पदच्छेद : त्यजेत् एकम् कुलस्य अर्थे कुलम् त्यजेत् ग्रामम् जनपदस्य अर्थे आत्मार्थे पृथिवीम् त्यजेत्। 

अन्वय : कुलस्य अर्थे एकं त्यजेत्।  ग्रामस्य अर्थे कुलं त्यजेत्। जनपदस्य अर्थे ग्रामं त्यजेत्। आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्। 

भावार्थ : यदि कुलस्य हिताय आवश्यकता भवेत् तर्हि एकं जनं त्यजेत्।  ग्रामस्य हिताय कुलमपि त्यजेत्।  जनपदस्य हिताय ग्रामं त्यजेत्। आत्मनः रक्षणार्थं तु सम्पूर्णां पृथिवीमपि त्यजेत्। 

Hindi Translation: परिवार की भलाई के लिए अगर ज़रूरत हो तो एक इंसान को छोड़ देना चाहिए। गांव के लिए तो कुल भी छोड़ देना चाहिए। जनपद के लिए गांव छोड़ देना चाहिए। लेकिन अपनी रक्षा के लिए उसे पूरी धरती छोड़ देनी चाहिए।

English Translation: Leave one person if it is needed for the good of the family. Even the clan should be abandoned for the sake of the village. Leave the village for the sake of the Janapada. But he should give up the whole earth to protect himself.

मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः। 
ते नराः नरकं यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ

Hindi Translation: जो अपने दोस्तों को धोखा देता है, और एहसान फरामोश रहता है, और धोखा देता है, वे लोग चांद और सूरज की तरह नरक में जाते हैं।

English Translation: He who betrays his friends, and is ungrateful, and (becomes) a betrayer of trust, those men go to hell as long as the moon and the sun.

पदच्छेद : मित्र-द्रोही कृतघ्नः च यः च विश्वास-घातकः ते नराः नरकम् यान्ति चन्द्र-दिवाकरौ। 

अन्वय: यः मित्रद्रोही, कृतघ्नः च, विश्वासघातकः च (भवति), ते नराः चन्द्रदिवाकरौ यावत् नरकं यान्ति। 

भावार्थः ये जनाः मित्रं प्रति द्रोहं कुर्वन्ति, उपकारिणं प्रति कृतज्ञतां न ज्ञापयन्ति, विश्वासघातं कुर्वन्ति, ते पापिनः जनाः यावत् चन्द्रः सूर्यश्च विद्येते तावत् नरके दुःखानि अनुभवन्ति च। 

Hindi Translation: जो व्यक्ति मित्र से विश्वासघात करता है, उपकार करने वाले का उपकार नहीं मानता (कृतघ्न होता है) तथा विश्वासघात करता है, ऐसे मनुष्य जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं, तब तक नरक को प्राप्त होते हैं। 

English Translation: Those who betray a friend, are ungrateful to a benefactor, and betray trust are sinners and will suffer in hell as long as the moon and the sun exist.


अत्र इदम अवधेयम् 

१. कर्मवाच्ये/ भाववाच्ये क्रियापदानाम् उदाहरणानि पश्यत् -


दीयते- दिया जाता है। 

पठ्यते - पढ़ा जाता है। 

लिख्यते - लिखा जाता है। 

कथ्यते - कहा जाता है। 

श्रूयते - सुना जाता है। 

दृश्यते - देखा जाता है। 

खाद्यते - खाया जाता है। 

पीयते - पिया जाता है। 

गम्यते - जाया जाता है। 

सेव्यते - सेवन किया जाता है। 


कर्मवाच्ये/भाववाच्ये वाक्यप्रयोगं पश्यत् -

मया  पुस्तकं पठ्यते - मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है। 

मया पत्रं लिख्यते - मेरे द्वारा पत्र लिखा जाता है। 

मया जलं पीयते - मेरे द्वारा जल पिया जाता है। 

मया फलं खाद्यते - मेरे द्वारा फल खाया जाता है। 

मया सत्यं कथ्यते - मेरे द्वारा सत्य कहा जाता है। 


२. 'नञ् तत्पुरुषः' तत्पुरुषसमासस्य एकः भेदः अस्ति।  अस्मिन् समासे पूर्वपदं  'नञ्' (न/अन्) भवति। यदि उत्तरपदे व्यंजनं भवति तर्हि 'न' इत्यस्य स्थाने 'अ' आदेशः भवति यदि स्वरः भवति तर्हि 'अन्' इति आदेशः भवति। 

यथा- 

अक्रोधः - न क्रोधः 

असाधुः - न साधुः 

असत्यम् - न सत्यम् 

अनृतं - न ऋतम् 

अनिष्टम् - न इष्टम् 

अनीश्वरः - न ईश्वरः 

अनुपकारिणे - न उपकारिणे 



वयम्  अभ्यासं कुर्मः 

१. एकपदेन उत्तरत -

(क) यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वम् अविवेकता च किमर्थं भवन्ति?

(ख) सात्त्विकं दानं कस्मै दीयते?

(ग) ग्रामस्यार्थे किं त्यजेत्?

(घ) मित्रद्रोही कुत्र गच्छति?

(ङ) सम्पत्तौ विपत्तौ च केषां एकरूपता भवति?

उत्तरम्-

(क) अनर्थाय। 

(ख) अनुपकारिणे। 

(ग) कुलम्। 

(घ) नरकम्। 

(ङ) महताम्।  

२. पट्टिकातः चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत -

पट्टिकात: (अविवेकता, अनुपकारिणे, आत्मार्थे, अस्तमये , नरकं )

(क) यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वम् ........................................।

(ख) दातव्यमिति यद्दानं दीयते .......................................।

(ग) ग्रामं जनपदस्यार्थे ......................................पृथिवीं त्यजेत्। 

(घ) ते नराः ....................................... यान्ति। 

(ङ) उदये सविता रक्तः रक्तश्च .......................................यथा। 

उत्तरम्-

(क) यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वम् अविवेकिता

(ख) दातव्यमिति यद्दानं दीयते अनुपकारिणे

(ग) ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्। 

(घ) ते नराः नरकं  यान्ति। 

(ङ) उदये सविता रक्तः रक्तश्च अस्तमये यथा। 

३. श्लोकांशान् मेलयत-

(क) यौवनं धनसंपत्तिः           १. महतामेकरूपता 

(ख) दातव्यमिति यद्दानम्       २. यश्च विश्वासघातकः 

(ग) त्यजेदेकं कुलस्यार्थे         ३. ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् 

(घ) मित्रद्रोही कृतघ्नश्च             ४.दीयतेSनुपकारिणे 

(ङ) सम्पत्तौ च विपत्तौ च         ५. प्रभुत्वमविवेकिता 


उत्तरम्-

(क) यौवनं धनसंपत्तिः               ५. प्रभुत्वमविवेकिता 

(ख) दातव्यमिति यद्दानम्           ४.दीयतेSनुपकारिणे 

(ग) त्यजेदेकं कुलस्यार्थे             ३. ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् 

(घ) मित्रद्रोही कृतघ्नश्च                २. यश्च विश्वासघातकः

(ङ) सम्पत्तौ च विपत्तौ च           १. महतामेकरूपता
 
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