पाठः तथा अनुवादः (Paragraph-wise Sanskrit, Hindi & English)
परिच्छेदः -१ (Paragraph 1) :
भारतदेशः बहूनां ब्रह्मर्षीणां महात्मनां च भूमिः। तेषां चरित्राणि सकलस्य विश्वस्य कृते प्रेरणास्पदम्। तेषां चरित्रेषु प्रतिपदं भूतदया, समता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, ऋजुता, बन्धुता चेत्यादीनि जीवनमूल्यानि प्राप्यन्ते। महाराष्ट्रस्य प्रसिद्धः महात्मा नामदेवमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदर्शम् उपस्थापितवान्। सः सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य न केवलं सङ्कीर्तनं कृतवान् अपि तु सर्वेषु जीवेषु सः भगवन्तं दृष्टवान्। नामदेवमहाराजस्य जीवनस्य काचित् शिक्षाप्रदा घटना अत्र प्रदर्शिता अस्ति यां पठित्वा अस्माकं जीवनं परिवर्तितं भवेत्।
हिन्दी अनुवाद :
भारत देश अनेक ब्रह्मर्षियों और महात्माओं की भूमि है। उनके चरित्र संपूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके चरित्र में पग-पग पर प्राणि-दया, समानता, क्षमा, अहिंसा, करुणा, सरलता, बन्धुता आदि जीवन-मूल्य प्राप्त होते हैं। महाराष्ट्र के प्रसिद्ध महात्मा नामदेव महाराज ने अपने आचरण से करुणा का महान आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने सर्वव्यापक ईश्वर का न केवल संकीर्तन किया, अपितु सभी जीवों में भगवान को देखा। नामदेव महाराज के जीवन की एक शिक्षाप्रद घटना यहाँ प्रस्तुत की गई है, जिसे पढ़कर हमारा जीवन परिवर्तित हो सकता है।
English Translation :
India is the land of numerous divine seers (Brahmarshis) and great souls (Mahatmas). Their lives are a source of inspiration for the entire world. In their character, life values such as compassion toward living beings, equality, forgiveness, non-violence, kindness, simplicity, and brotherhood are found at every step. The renowned saint of Maharashtra, Sant Namdev Maharaj, presented a great ideal of compassion through his personal conduct. He not only sang the glories of the omnipresent God but also perceived divinity in all living beings. An instructive episode from the life of Namdev Maharaj is presented here, reading which our lives may be transformed.
परिच्छेदः २ (Paragraph 2):
कपिलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। तत्र क्रीडावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मारयितुं धावितवन्तौ। शुनकः भयेन आक्रोशं कुर्वन् वेगेन धावितवान्। तत् दृष्ट्वा कपिलः माधवी च उच्चैः हसितवन्तौ। मातामही तं प्रसङ्गं दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च।
हिन्दी अनुवाद :
कपिल और माधवी छुट्टियों के समय अपने मामा के घर गए। वहाँ खेल के समय उन्होंने एक कुत्ते को देखा। उसे देखकर हाथ में पत्थर का टुकड़ा लेकर उसे मारने के लिए दौड़े। कुत्ता डर के मारे चीखता हुआ तेजी से भागा। वह देखकर कपिल और माधवी ज़ोर-ज़ोर से हँसे। नानी ने उस दृश्य को दूर से देखा और उन दोनों को बुलाया।
English Translation :
Kapil and Madhavi went to their maternal uncle’s house during vacation. There, while playing, they saw a dog. Seeing it, they picked up pieces of stone in their hands and ran to hit it. The dog cried out in fear and ran away swiftly. Seeing that, both Kapil and Madhavi laughed aloud. Their maternal grandmother saw this incident from afar and called them over.
परिच्छेदः ३ : संवादः – भागः १ (Dialogue - Part 1)
मातामही : भोः कपिल ! माधवि ! किं कुरुतः ?
कपिलः : मातामहि ! पश्यतु किल। सः शुनकः आवयोः क्रीडायां मध्ये मध्ये प्रविश्य आवां पीडयति स्म। अतः आवां तं सम्यक् दण्डितवन्तौ। (पुनः उच्चैः हसितवन्तौ)
मातामही : वत्सौ, अधुना क्रीडया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा ?
उभावपि : कथा ! रोचते मे कथा ... मातामह्याः रोचते मे मातामही। (उपविशतम्, मातामहीम् आलिङ्गितवन्तौ)
मातामही : उपविशतम्, सावधानेन शृणुतं च। अस्माकं भारतभूमिः अनेकेषां ब्रह्मर्षीणां राजर्षीणां नररत्नानां च प्रसवित्री। बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः। किं भवन्तौ महात्मानं नामदेवं जानीतः ?
माधवी : आम्। अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति। अपि सत्यम् ?
मातामही : आम्। तस्यैव पुण्यश्लोकस्य पाण्डुरङ्गमित्रस्य नामदेवमहाराजस्य एषा कथा। नामदेवः न केवलं पाण्डुरङ्गस्य प्रियभक्तः अपि तु प्रियमित्रमपि। देवः नामदेवं परितः भवति स्म।
माधवी : किं सत्यमेव नामदेवस्य मित्रम् आसीत् पाण्डुरङ्गः ?
कपिलः : किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति ?
मातामही : आम् वत्सौ। देवः पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य प्रियसुहृदासीत्। नामदेवः प्रतिदिनं पाण्डुरङ्गाय नैवेद्यं समर्प्य, तं भोजयित्वा ततः परमेव अन्नं सेवते स्म। तस्य गुरुः आसीत् विसोबा। विसोबा तम् अध्यापितवान् यत् 'ईश्वरः न केवलं मन्दिरे भवति, अपि तु सर्वेषु भूतेषु तस्य निवासो भवति। अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु' इति।
हिन्दी अनुवाद :
नानी : अरे कपिल ! माधवी ! क्या कर रहे हो ?
कपिल : नानी जी ! देखिए तो सही। वह कुत्ता हमारे खेल में बीच-बीच में आकर हमें परेशान कर रहा था। इसलिए हम दोनों ने उसे भली-भाँति दण्डित किया। (दोनों फिर जोर से हँसे)
नानी : बच्चों, अब खेल बंद करो। क्या कहानी सुनना चाहते हो ?
दोनों : कहानी ! मुझे कहानी बहुत पसंद है ... नानी की कहानी मुझे बहुत भाती है। (बैठ गए और नानी को गले लगा लिया)
नानी : बैठो और ध्यानपूर्वक सुनो। हमारी भारतभूमि अनेक ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और नर-रत्नों को जन्म देने वाली माता है। बहुत-से सत्पुरुषों ने अपने श्रेष्ठ कर्मों से अपने जीवन को सार्थक किया है। क्या आप दोनों महात्मा नामदेव को जानते हैं ?
माधवी : हाँ! मैंने सुना है कि उनके कीर्तन में स्वयं भगवान पाण्डुरंग ने नृत्य किया था। क्या यह सच है ?
नानी : हाँ। उन्हीं पवित्र कीर्ति वाले, पाण्डुरंग के सखा नामदेव महाराज की यह कथा है। नामदेव न केवल पाण्डुरंग के प्रिय भक्त थे, बल्कि प्रिय मित्र भी थे। भगवान सदैव नामदेव के आस-पास ही रहते थे।
माधवी : क्या सचमुच पाण्डुरंग नामदेव के मित्र थे ?
कपिल : क्या भगवान के साथ भी मित्रता सम्भव है ?
नानी : हाँ बच्चों। भगवान पाण्डुरंग नामदेव के प्रिय मित्र थे। नामदेव प्रतिदिन पाण्डुरंग को भोग अर्पित करके, उन्हें भोजन कराकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करते थे। उनके गुरु विसोबा थे। विसोबा ने उन्हें उपदेश दिया था कि—'ईश्वर केवल मन्दिर में ही नहीं होते, अपितु समस्त प्राणियों में उनका वास होता है। इसलिए उस सर्वव्यापी ईश्वर की पूजा करो।'
English Translation :
Grandmother : Oh Kapil! Madhavi! What are you doing?
Kapil : Grandma, look! That dog kept interrupting our game and troubling us. Therefore, we punished it well. (They both laughed aloud again)
Grandmother : Children, enough of playing now. Would you like to listen to a story?
Both : A story! I love stories ... I love Grandma’s stories. (They sat down and hugged their grandmother)
Grandmother : Sit down and listen carefully. Our motherland India has given birth to many Brahmarshis, Rajarshis, and gems among human beings. Many noble souls made their lives meaningful through their virtuous deeds. Do you two know Mahatma Namdev?
Madhavi : Yes! I have heard that Lord Panduranga Himself danced during his kirtans. Is that true?
Grandmother : Yes. This story belongs to that very virtuous soul and friend of Lord Panduranga, Namdev Maharaj. Namdev was not only a dear devotee of Panduranga but also a close friend. The Lord always remained around Namdev.
Madhavi : Was Panduranga truly a friend of Namdev?
Kapil : Is friendship with God even possible?
Grandmother : Yes, dear children. Lord Panduranga was Namdev’s close companion. Namdev used to offer food (naivedya) daily to Panduranga, feed Him, and only after that consume food himself. His spiritual master was Visoba. Visoba taught him: 'God resides not only in temples, but He dwells within all living beings. Therefore, revere that all-pervading God.'
परिच्छेदः ४ : संवादः – भागः २ (Dialogue - Part 2):
कपिलः : मातामहि ! किं सत्यमेव ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति ?
मातामही : आम्, शृणु वत्स ! नामदेवः प्रतिदिनम् अतीवश्रद्धया निष्ठया भक्त्या च नैवेद्यस्थालिकाम् आदाय मन्दिरं गच्छति स्म। एकदा सः नैवेद्यस्थालिकां गृहीत्वा विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान्। नेत्रे निमील्य प्रार्थनां कृतवान् —
नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥
शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य सः नेत्रे उद्घाटितवान्। अहो आश्चर्यम् ! पुरतः स्थितायां स्थालिकायां रोटिका नासीत्।
माधवी : पाण्डुरङ्गः आगत्य भक्षितवान् किल ?
मातामही : न हि। कश्चन बुभुक्षितः शुनकः आगत्य रोटिकां मुखे गृहीत्वा धावितवान्।
कपिलः : धिक् शुनकम् ! मातामहि ! पश्यतु, शुनकाः दुष्टाः एव भवन्ति।
माधवी : सत्यं भ्रातः ! नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु।
मातामही : पुत्रकौ, शृणुताम्। नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवान्। जानीतः किमर्थं कथं च ?
कपिलः : क्रोधेन लगुडम् आदाय शुनकं ताडयितुं धावितवान् स्यात् !
माधवी : दण्डयितुं पाषाणखण्डम् आदाय धावितवान् स्यात् ! सत्यं किल मातामहि !
मातामही : न हि बालौ ! नामदेवः कोपेन न धावितवान्, प्रत्युत सः करुणया धावितवान्। न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अपि तु घृतपात्रं धृत्वा।
उभावपि : (साश्चर्यम् उच्चैः) किं घृतपात्रम् आधृत्य ?
मातामही : आम्, घृतपात्रम् आधृत्य एव।
उभौ : किन्तु किमर्थम् ?
मातामही : शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान् खलु। महात्मनः नामदेवस्य चिन्ता आसीत् यत् यदि शुनकः शुष्करोटिकां खादेत् तर्हि तस्य उदरवेदना भवेत् इति। अतः तस्य पीडा मा भवतु इति चिन्तयन् घृतपात्रम् आदाय 'हे देव ! शुष्कां रोटिकां मा खादतु, घृतम् अपि स्वीकरोतु' इति वदन् अनुधावितवान् सः।
(उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।)
हिन्दी अनुवाद :
कपिल : नानी जी ! क्या सचमुच ईश्वर सभी प्राणियों में वास करते हैं ?
नानी : हाँ, सुनो बेटा ! नामदेव प्रतिदिन अत्यंत श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति के साथ नैवेद्य (भोग) की थाली लेकर मन्दिर जाते थे। एक दिन वे भोग की थाली लेकर मूर्ति के सम्मुख रखे। आँखें बंद करके प्रार्थना की —
‘हे देव! भोग स्वीकार करें और मेरी भक्ति को अडिग बनाएँ। मुझे अभीष्ट वर प्रदान करें तथा परलोक में परम गति दें। मिश्री युक्त खाद्य पदार्थ, दही, दूध और घी, तथा नाना प्रकार के भोज्य पदार्थों का यह नैवेद्य स्वीकार करें।’
मन्त्र का उच्चारण करके और श्रद्धा से प्रणाम करके उन्होंने आँखें खोलीं। अरे आश्चर्य ! सामने रखी थाली में रोटी नहीं थी।
माधवी : क्या पाण्डुरंग आकर खा गए ?
नानी : नहीं। कोई भूखा कुत्ता आया और रोटी मुँह में दबाकर भाग गया।
कपिल : धिक्कार है उस कुत्ते को ! नानी जी ! देखिए, कुत्ते दुष्ट ही होते हैं।
माधवी : सही कह रहे हो भाई ! नामदेव को कितना दुःख हुआ होगा।
नानी : प्यारे बच्चों, सुनो। नामदेव उस कुत्ते के पीछे-पीछे दौड़े। जानते हो किसलिए और कैसे ?
कपिल : गुस्से में लाठी लेकर कुत्ते को पीटने के लिए दौड़े होंगे !
माधवी : दण्ड देने के लिए पत्थर लेकर दौड़े होंगे ! सच है न नानी जी ?
नानी : नहीं बच्चों ! नामदेव क्रोध से नहीं दौड़े, बल्कि करुणा से दौड़े। न लाठी लेकर, न पत्थर लेकर, अपितु घी का कटोरा लेकर।
दोनों : (आश्चर्य से ज़ोर से) क्या, घी का पात्र लेकर ?
नानी : हाँ, घी का पात्र लेकर ही।
दोनों : लेकिन किसलिए ?
नानी : कुत्ता सूखी रोटी लेकर भागा था। महात्मा नामदेव को चिंता हुई कि यदि कुत्ता सूखी रोटी खाएगा तो उसके पेट में दर्द हो जाएगा। इसलिए उसे कष्ट न हो—यह सोचते हुए वे घी का पात्र लेकर 'हे देव ! सूखी रोटी मत खाइए, घी भी साथ में लीजिए' यह कहते हुए उसके पीछे दौड़े।
(दोनों बच्चे एक-दूसरे को देखने लगे। अपराध-बोध से उनके चेहरे उतर गए।)
English Translation :
Kapil : Grandma! Does God truly dwell in all living creatures?
Grandmother : Yes, listen dear! Namdev used to go to the temple every day carrying a plate of food offerings (naivedya) with deep faith, sincerity, and devotion. Once, he placed the offering plate before the deity. Closing his eyes, he prayed:
'O Lord, please accept this offering and make my devotion steadfast. Grant me my cherished boon and ultimate salvation in the hereafter. Please accept this offering comprising sweets, curd, milk, clarified butter (ghee), and various wholesome foods.'
After chanting the mantra and bowing with reverence, he opened his eyes. What a surprise! There was no flatbread (roti) on the plate placed before him.
Madhavi : Did Panduranga come and eat it?
Grandmother : No. A hungry dog came, snatched the roti in its mouth, and ran off.
Kapil : Shame on that dog! Grandma, look, dogs are indeed wicked!
Madhavi : True, brother! Namdev must have felt so sad.
Grandmother : Children, listen! Namdev ran after the dog. Do you know why and how?
Kapil : He must have run with a stick in anger to beat the dog!
Madhavi : He must have picked up stones to punish it! Isn't that right, Grandma?
Grandmother : Not at all, children! Namdev did not run out of anger; rather, he ran with deep compassion. Neither with a stick nor with a stone, but carrying a bowl of clarified butter (ghee).
Both : (Exclaiming with surprise) What? Carrying a bowl of ghee?
Grandmother : Yes, holding a bowl of ghee indeed.
Both : But why?
Grandmother : The dog had fled with dry bread. Mahatma Namdev was concerned that eating dry bread might give the dog a stomachache. Thus, hoping to save it from discomfort, he ran after it holding the bowl of ghee, pleading: 'O Lord! Please do not eat dry bread; please accept some ghee as well!'
(Both children looked at each other. Their faces paled with guilt.)
परिच्छेदः ५ : संवादः – भागः ३ (Dialogue - Part 3) :
मातामही : धावन् शुनकः अदृश्यः जातः। तस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतः। स नामदेवम् उक्तवान् – 'वत्स नामदेव ! उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम्। 'ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति' इति गुरूपदेशं न केवलं भवान् श्रुतवान् अपि तु अनुपालितवान्। सुतरां धन्यो भवान्'।
कपिलः : मातामहि ! अहं प्रमादं कृतवान्। अकारणं हि शुनकं ताडितवान्। इतः पूर्वमपि बहुवारं जीवान् पीडितवान्। अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु जीवेषु ईश्वरः निवसति, अतः कमपि न पीडयिष्यामि इति।
माधवी : मातामहि ! क्षाम्यतु माम्। अहमपि कदापि कस्यापि पीडां न जनयिष्यामि।
मातामही : चिरञ्जीविनौ ! मां निकषा आगच्छताम्। (आलिङ्गनं कृत्वा) अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यापि पीडा न भवेत्। तथैव कस्यापि या कापि पीडा स्यात् तां निवारयितुं प्रयतामहे इति सङ्कल्पं कुर्मः। इदमस्तु अस्माकं ध्येयम् —
'आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।'
हिन्दी अनुवाद :
नानी : दौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर भगवान पाण्डुरंग प्रकट हो गए। उन्होंने नामदेव से कहा—'पुत्र नामदेव! तुम परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। ‘ईश्वर सभी प्राणियों में वास करते हैं’—गुरु के इस उपदेश को तुमने केवल सुना ही नहीं, बल्कि उसका पूर्ण पालन भी किया। तुम सचमुच धन्य हो।'
कपिल : नानी जी! मुझसे बड़ी भूल हो गई। मैंने बिना कारण ही कुत्ते को मारा। इससे पहले भी कई बार जीवों को सताया है। आज मैंने जान लिया कि सभी जीवों में ईश्वर निवास करते हैं, इसलिए अब मैं किसी को भी कष्ट नहीं दूँगा।
माधवी : नानी जी! मुझे क्षमा करें। मैं भी अब कभी किसी को कोई पीड़ा नहीं पहुँचाऊँगी।
नानी : दीर्घायु हो बच्चों! मेरे पास आओ। (गले लगाकर) हमारे शरीर, वाणी अथवा मन से किसी को भी कष्ट न हो। साथ ही यदि किसी को कोई पीड़ा हो तो उसे दूर करने का प्रयास करेंगे—यह संकल्प लेते हैं। यही हमारा जीवन-ध्येय होना चाहिए—
‘जो सभी प्राणियों को अपने समान देखता है, वही सच्चा ज्ञानी (पण्डित) है।’
English Translation :
Grandmother : The running dog disappeared. In its place, Lord Panduranga manifested Himself. He said to Namdev: 'Dear child Namdev! You have passed the test. You did not merely listen to your Guru's teaching that "God resides in all beings," but you truly practiced it. You are truly blessed!'
Kapil : Grandma! I committed a grave mistake. I struck the dog without reason. Even before this, I have troubled animals many times. Today I have understood that God resides in every living being; hence, I will never harm anyone again.
Madhavi : Grandma! Please forgive me. I too will never cause distress to anyone.
Grandmother : May you both live long, my children! Come near me. (Embracing them) May no one suffer harm through our body, speech, or thought. Likewise, let us resolve to try our best to relieve whoever is in pain. Let this be our life's motto:
'One who sees all living beings as oneself is truly wise.'
अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
१. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत —
(क) मातामही कस्य कथां श्रावितवती ?
(ख) नामदेवस्य गुरुः नामदेवं किम् अध्यापितवान् ?
(ग) नामदेवः कया भावनया धावनं कृतवान् ?
(घ) बालकयोः मुखे किमर्थं म्लाने संजाते ?
(ङ) कपिलः माधवी च कं सङ्कल्पं कृतवन्तौ ?
(च) 'तं दृष्ट्वा पाषाणखण्डं स्वीकृत्य मारयितुं धावितवन्तौ' इति वाक्ये 'तम्' इति सर्वनामशब्दः कस्य कृते प्रयुक्तः ?
(छ) कपिलः माधवी च कुत्र गतवन्तौ ?
(ज) 'मातामही तं प्रसङ्गं दृष्टवती, तौ आहूतवती च'। इति वाक्ये 'तौ' इति शब्दः कस्यां विभक्तौ अस्ति ?
उत्तरम् :
(क) मातामही नामदेवस्य कथां श्रावितवती।
(ख) नामदेवस्य गुरुः नामदेवं ईश्वरस्य सर्वव्याप्तत्वम अध्यापितवान्।
(ग) नामदेवः भक्ति भावनया धावनं कृतवान्।
(घ) बालकयोः मुखे दुःखेन म्लाने संजाते।
(ङ) कपिलः माधवी च ईश्वरस्य सर्वत्र दर्शनस्य सङ्कल्पं कृतवन्तौ।
(च) 'तम्' इति सर्वनामशब्दः शुनकस्य कृते प्रयुक्तः।
(छ) कपिलः माधवी च मंदिरं गतवन्तौ।
(ज) 'तौ' इति शब्दः प्रथमा द्विवचन विभक्तौ अस्ति।
२. अधोलिखितानि वाक्यानि भूतकालेन परिवर्त्य पुनः लिखत —
यथा — नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गच्छति । → नामदेवः स्थालिकां स्वीकृत्य मन्दिरं गतवान् ।
(क) नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापयति ।
(ख) नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं करोति ।
(ग) गुरुः विसोबा तम् अध्यापयति ।
(घ) अहं शृणोमि ।
(ङ) सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कुर्वन्ति ।
(च) नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावति ।
उत्तरम् :
(क) नैवेद्यं विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान् ।
(ख) नेत्रे निमील्य प्रार्थनायाः आरम्भं कृतवान् ।
(ग) गुरुः विसोबा तम् अध्यापितवान् ।
(घ) अहं शृतवान्।
(ङ) सत्पुरुषाः स्वकर्तृत्वेन जन्म सार्थकं कृतवन्तः।
(च) नामदेवः शुनकस्य पृष्ठे अनुधावितवाने।
३. अधोलिखितानि कथनानि कः / का / कं / कां च प्रति कथयति इति लिखत —
यथा — "हे देव ! शुष्कां रोटिकां न खादतु घृतमपि स्वीकरोतु ।" → नामदेवः शुनकं प्रति
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कथनम्
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कः / का
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कं / कां प्रति
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(क) कथां
श्रोतुम् इच्छतः वा ?
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(ख) अहं श्रुतवती
यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति ।
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(ग) किं देवेन सह
अपि मित्रता सम्भवति ?
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(घ) अतः तस्य
सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु ।
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(ङ) नैवेद्यं
गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु ।
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(च) धिक् शुनकम्
।
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(छ) नामदेवस्य
कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु ?
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(ज) किं
घृतपात्रम् आधृत्य ?
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(झ) अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु ईश्वरः निवसति इति ।
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(ञ) उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम् ।
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उत्तरम् :
कथनम् | कः / का | कं / कां प्रति |
(क) कथां श्रोतुम् इच्छतः वा ? | मातामही | बालकौ |
(ख) अहं श्रुतवती यत् तस्य कीर्तने स्वयं देवः पाण्डुरङ्गः नृत्यं कृतवान् इति । | मातामही | बालकौ |
(ग) किं देवेन सह अपि मित्रता सम्भवति ? | बालकः | मातामही |
(घ) अतः तस्य सर्वात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु । | गुरुः | नामदेवं |
(ङ) नैवेद्यं गृह्यतां देव भक्तिं मे ह्यचलां कुरु । | नामदेवः | देवम् |
(च) धिक् शुनकम् । | नामदेवः | शुनकम |
(छ) नामदेवस्य कियत् दुःखं जातं स्यात् खलु ? | मातामही | बालकौ |
(ज) किं घृतपात्रम् आधृत्य ? | कपिलः | माधवीम् |
(झ) अद्य अहं ज्ञातवान् यत् सर्वेषु ईश्वरः निवसति इति । | नामदेवः | गुरुम् |
(ञ) उत्तीर्णः भवान् परीक्षाम् । | गुरुः | नामदेवम् |
४. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत —
यथा — पाण्डुरङ्गः नामदेवस्य मित्रम् आसीत् । → पाण्डुरङ्गः कस्य मित्रम् आसीत् ?
(क) देवः नामदेवं परितः भवति स्म ।
(ख) ईश्वरः सर्वेषु भूतेषु निवसति ।
(ग) शुनकः आगत्य मुखे रोटिकां धृत्वा धावितवान् ।
(घ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान् ।
(ङ) आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ।
उत्तरम् :
(क) देवः कम् परितः भवति स्म ?
(ख) ईश्वरः कुत्र/केषु निवसति ?
(ग) शुनकः आगत्य मुखे काम् धृत्वा धावितवान्?
(घ) शुनकस्य स्थाने कः आविर्भूतवान् ?
(ङ) आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स कः?
५. घटनाक्रमानुसारं लिखत —
(क) नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान् ।
(ख) नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान् ।
(ग) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान् ।
(घ) शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान् ।
(ङ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान् ।
(च) नामदेवः मन्दिरं गतवान् ।
उत्तरम् :
(च) नामदेवः मन्दिरं गतवान् ।
(ग) नामदेवः नैवेद्यस्थालिकां विग्रहस्य पुरतः स्थापितवान् ।
(क) नामदेवः मन्त्रम् उच्चार्य श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उद्घाटितवान् ।
(घ) शुनकः शुष्करोटिकाम् अपहृत्य पलायितवान् ।
(ख) नामदेवः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधावितवान् ।
(ङ) शुनकस्य स्थाने पाण्डुरङ्गः आविर्भूतवान् ।
६. कोष्ठकेषु दत्तानां पदानाम् उचितां विभक्तिं योजयित्वा अनुच्छेदं पूरयत —
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः । ________ (क्षीर) सह तण्डुलाः पक्वाः। ________ (शर्करा) विना कथं शक्यते। शीघ्रमेव ________ (आपण) प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। ________ (आपण) निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। ________ (शर्करा) परितः पिपीलिकाः आगताः। पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। ________ (मधुर) विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना ________ (पायस) परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् ________ (अन्ये मधुरपदार्थाः) इति एकः वदति, ________ (तत्) विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः। ________ (पायस) सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः। तेषां वचनानि श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः विलसति।
उत्तरम् :
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः
आगच्छन्तु, पायसं कुर्मः । क्षीरेण (क्षीर) सह तण्डुलाः पक्वाः। शर्कराम (शर्करा) विना कथं शक्यते। शीघ्रमेव आपणम् (आपण) प्रति गत्वा शर्कराम् आनयतु। अपणम् (आपण) निकषा वाहनानि तिष्ठन्ति। शर्करा महानसे स्थापिता। शर्कराम् (शर्करा) परितः पिपीलिकाः आगताः। पिपीलिकाः अपनीय पायसे शर्करा योजिता। मधुरम् (मधुर) विना पायसं रुचिकरं न भवति। अधुना पायसम् (पायस) परितः बालक-बालिकावृन्दं तिष्ठति। धिक् अन्यान् मधुरपदार्थान् (अन्ये मधुरपदार्थाः) इति एकः वदति, तम् (तत्) विना जीवनम् अपूर्णम् इति अपरः। पायसेन् (पायस) सह एव भोजनं सरसम् इति अन्यः। तेषां वचनानि श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः विलसति।
७. अनुच्छेदे स्थूलाक्षरेण दत्तानां क्रियापदानां स्थाने उचितं क्तवतुप्रत्ययान्तरूपं योजयित्वा पुनः लिखत —
कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् अददात्। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन अजीवन्। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिम् अकरोत्। कालान्तरम् अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनम् अकुर्वन्। महिलाः पर्वसमये नदीम् अपूजयन्। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि अक्षिपत्। क्रमशः अन्ये अपि अक्षिपन्। तेन नदी मलिना अभवत्, मीनाः अम्रियन्त। स्त्रियः रोगैः पीडिताः अभवन्। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् अवदत्। सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम् अरोपयत्। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यम् अकुर्वन्। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीम् अशोधयन्। पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च अददात्। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीम् अपूजयन् वृक्षरोपणं च अकुर्वन्।
उत्तरम् :
कञ्चित् ग्रामं निकषा एका नदी आसीत्। नदी सर्वदा स्वच्छजलम् दत्तवती (अददात्)। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन जीवितवन्तः (अजीवन्)। एकः कृषकः तेन जलेन सर्वदा कृषिम् कृतवान् (अकरोत्)। कालान्तरम् अन्ये कृषकाः अपि तेन जलेन क्षेत्रसेचनम् कृतवन्तः (अकुर्वन्)। महिलाः पर्वसमये नदीम् पूजितवन्त्यः (अपूजयन्)। एकवारं कश्चित् परिवारः नद्यां मालिन्यानि क्षिप्तवान् (अक्षिपत्)। क्रमशः अन्ये अपि क्षिप्तवन्तः (अक्षिपन्)। तेन नदी मलिना अभवत्, मीनाः मृतवन्तः (अम्रियन्त)। स्त्रियः रोगैः पीडिताः भवितवत्यः (अभवन्)। तदा एका शिक्षिता बालिका जलस्य महत्त्वं सर्वान् उक्तवती (अवदत्)। सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम् रोपितवती (अरोपयत्)। महिलाः अपि ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यम् कृतवन्त्यः (अकुर्वन्)। सर्वे ग्रामवासिनः मिलित्वा नदीम् शोधितवन्तः (अशोधयन्)। पुनः नदी स्वच्छा जाता निर्मलं जलं च दत्तवती (अददात्)। ततः आरभ्य वर्षे एकवारं जनाः नदीम् पूजितवन्तः (अपूजयन्) वृक्षरोपणं च कृतवन्तः (अकुर्वन्)।
८. एतेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत —
यथा — महान् आत्मा → महात्मा
(क) घृतस्य पात्रम् → ________
(ख) पाषाणस्य खण्डः → ________
(ग) प्रियः सुहृद् → ________
(घ) उदरे वेदना → ________
(ङ) स्वीयः व्यवहारः, तेन → ________
(च) जीवनस्य मूल्यानि → ________
(छ) मातुलस्य गृहम्, तत् → ________
(ज) नरेषु रत्नानि इव, तेषाम् → ________
(झ) स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन → ________
(ञ) अपराधस्य भावना, तया → ________
(ट) गुरोः उपदेशः, तम् → ________
(ठ) दिने दिने → ________
(ड) राजा ऋषिः इव, तेषाम् → ________
उत्तरम् :
(क) घृतस्य पात्रम् → घृतपात्रम्
(ख) पाषाणस्य खण्डः → पाषाणखण्डम्
(ग) प्रियः सुहृद् → प्रियसुहृद
(घ) उदरे वेदना → उदरवेदना
(ङ) स्वीयः व्यवहारः, तेन → स्वव्यवहारः
(च) जीवनस्य मूल्यानि → जीवनमुल्यानि
(छ) मातुलस्य गृहम्, तत् → मातुलगृहम्
(ज) नरेषु रत्नानि इव, तेषाम् → नररत्नानाम्
(झ) स्वीयं कर्तृत्वम्, तेन → स्वकर्तृत्वेन
(ञ) अपराधस्य भावना, तया → अपराधभावनया
(ट) गुरोः उपदेशः, तम् → गुरुपदेशम्
(ठ) दिने दिने → प्रतिदिने
(ड) राजा ऋषिः इव, तेषाम् → राजर्षिणाम्
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