Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions
Explore Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 with an easy-to-understand explanation, Hindi translation, English meaning, important vocabulary, and useful question answers. This chapter introduces students to an interesting and educational Sanskrit lesson designed to improve their reading, comprehension, vocabulary, and understanding of Sanskrit language and literature.
In this blog post, students will find the complete chapter explanation, Sanskrit-to-Hindi translation, Sanskrit-to-English translation, word meanings, important questions and answers, and key points for revision. The content is presented in a simple and student-friendly format to make learning Sanskrit easier and more effective.
This resource is especially useful for Class 9 students, Sanskrit teachers, parents, and students preparing for school examinations. Students can use the chapter summary and explanations for quick revision, while the question-answer section can help them prepare for written examinations.
Whether you are looking for Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7 summary, translation, explanation, word meanings, or question answers, this post provides helpful study material in one place.
१. मूलपाठः (Sanskrit Text)
पाठः सप्तम : उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
प्रस्तावना वार्तालापः:
बालकः: मातः ! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।
माता: न हि पुत्र ! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।
बालकः: मातः ! अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति ?
माता: एहि पुत्र ! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि।
बालकः: मातः ! तर्हि कृपया सत्वरं श्रावयतु।
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation):
बुद्धिमान व्यक्ति को उपाय के साथ-साथ आने वाले संकट पर भी विचार करना चाहिए
प्रस्तावना वार्तालाप:
बालक: माँ! देखो, आज मुझे रास्ते में गिरा हुआ धन मिला है। इस धन से मैं बहुत सारे खिलौने खरीदूँगा।
माता: नहीं बेटा! यह किसी दूसरे की मेहनत की कमाई है, उसे ही वापस लौटानी चाहिए। दूसरे के धन को तिनके के समान समझना चाहिए।
बालक: माँ! दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है?
माता: आओ पुत्र! मैं तुम्हें पंचतंत्र की एक ऐसी कहानी सुनाती हूँ जिससे तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।
बालक: माँ! तो कृपया जल्दी सुनाइए।
English Translation:
A Wise Person Should Anticipate the Danger Along with the Remedy
Introductory Dialogue:
Son: Mother! Look, today I found money fallen on the road. With this money, I will buy many toys.
Mother: No, son! This is the hard-earned money of someone else, it must be returned to them. Another person's wealth should be treated like a blade of grass (worthless to greed).
Son: Mother! How can someone else’s wealth be considered like grass?
Mother: Come, son! I will narrate a story from the Panchatantra through which you can find the answer to your question.
Son: Mother! Then please tell it quickly.
कथा:
कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। अथ कदाचित्पापबुद्धिना चिन्तितं यदहं तावान्मूर्खो दरिद्रतया पीडितश्च। अत एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।
अथान्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिमुपेत्याह —
पापबुद्धिः: भो मित्र ! यदा भवान् वृद्धः भवति तदा 'बाल्ये यौवने वा मया एवं कृतम्' इति वक्तुं योग्यं किं कार्यं स्मरति ? भवता अन्यः देशः न दृष्टः एव चेत् भवतः शिशून् अन्यदेशसम्बन्धे कां कथां वदिष्यति ? उक्तमेव —
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम् ।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥
एवमेव —
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् ।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥
अतः आवां देशान्तरं गत्वा धनम् अर्जयित्वा आगच्छाव इति। अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह — अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।
(ततस्तौ गुरुजनानामनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्)
पापबुद्धिः: मित्र ! आवाभ्यामिदानीं प्रचुरं धनमुपार्जितम्। अत्रागत्य वर्षाणि व्यतीतानि, सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation):
कहानी:
किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक बार पापबुद्धि ने सोचा कि मैं बहुत मूर्ख और निर्धनता से पीड़ित हूँ। इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और बाद में इसे धोखा देकर सुखी हो जाऊँगा।
इसके बाद दूसरे दिन धर्मबुद्धि के पास जाकर पापबुद्धि बोला —
पापबुद्धि: हे मित्र! जब आप वृद्ध होंगे, तब 'मैंने बचपन या जवानी में ऐसा किया था' ऐसा कहने योग्य कौन सा काम याद करेंगे? यदि आपने दूसरा देश देखा ही नहीं, तो अपने बच्चों को दूसरे देशों के विषय में क्या कहानी सुनाएँगे? कहा भी गया है —
इस धरती पर घूमते हुए जिसने दूसरे देशों की विभिन्न प्रकार की भाषाओं और वेशभूषा आदि को नहीं जाना, उसका जीवन रूपी फल व्यर्थ ही है।
इसी प्रकार —
मनुष्य तब तक विद्या, धन और शिल्प (कला/कौशल) को भली-भाँति प्राप्त नहीं कर पाता, जब तक वह प्रसन्नचित्त होकर एक देश से दूसरे देश का भ्रमण नहीं करता।
इसलिए हम दोनों दूसरे देश जाकर धन कमाकर लौटते हैं। उसकी यह बात सुनकर प्रसन्न मन वाले धर्मबुद्धि ने कहा — ठीक है, गुरुजनों (बड़ों) की आज्ञा लेकर चलते हैं।
(फिर वे दोनों बड़ों की आज्ञा पाकर शुभ दिन पर दूसरे देश के लिए चल पड़े। धर्मबुद्धि के प्रभाव से पापबुद्धि ने भी बहुत सारा धन कमा लिया।)
पापबुद्धि: मित्र! अब हम दोनों ने पर्याप्त धन कमा लिया है। यहाँ आए हुए कई वर्ष बीत गए हैं, सारा धन लेकर अपने गाँव चलते हैं।
Story:
In a certain land lived two friends named Dharmabuddhi (the virtuous-minded) and Papabuddhi (the evil-minded). Once, Papabuddhi thought: "I am foolish and afflicted by poverty. Therefore, taking this Dharmabuddhi along, I will go to another country. There, with his support, I will earn wealth, and later, having deceived him, I will live happily."
Then, on another day, approaching Dharmabuddhi, he said:
Papabuddhi: "O friend! When you become old, what worthy deeds will you recall to say, 'I did this in my childhood or youth'? If you have never seen foreign lands, what stories will you tell your children about other regions? It has been said:
> He who, roaming on the surface of the earth, has not known various languages, customs, and attires of other lands—the fruit of his birth is in vain.
> Likewise:
> A human being does not truly acquire learning, wealth, or art until he gladly wanders across the earth from one land to another.
>
Therefore, let us go abroad, earn wealth, and return." Hearing these words, the joyful-hearted Dharmabuddhi said: "Let it be so; let us depart with the permission of our elders."
(Obtaining the permission of their elders, both set out for foreign lands on an auspicious day. By the virtue and wisdom of Dharmabuddhi, Papabuddhi also accumulated immense wealth.)
Papabuddhi: "Friend! We have now earned abundant wealth. Years have passed since our arrival here. Let us take all the wealth and return to our native village."
धर्मबुद्धिः: अथ किम्। तथैवास्तु।
(यदा तौ स्वनगरसमीपमागतवन्तौ तदा)
पापबुद्धिः: भद्र ! एतत् सर्वं धनं गृहं प्रति नेतुं न उचितम्। अतः एतद् धनमत्रैव गहनारण्ये कुत्रापि भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावः।
धर्मबुद्धिः: सत्यमेवाभिहितं भवता, तथैव कुर्वः।
यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।
(अथ कतिचिद्दिनानन्तरम्)
पापबुद्धिः: सखे ! मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि। अतः तत्र गत्वा किञ्चिन्मात्रं धनमानयावः।
धर्मबुद्धिः: अस्तु मित्र ! गच्छावः।
(अथ द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद्रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्)
पापबुद्धिः: भोः धर्मबुद्धे ! त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन। तत्प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि।
धर्मबुद्धिः: भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः खल्वहम्। नैतत् चौरकर्म करोमि।
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥
(एवं द्वावपि विवदमानौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ)
धर्माधिकारी: ननु न कोऽपि साक्षी युवाभ्यामन्यतरस्य चौरकर्मणः। अतः यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति। अतः प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। तत्रैव निर्णयः भविष्यति।
(अत्रान्तरे पापबुद्धिः गृहं गत्वा स्वजनकं प्रबोधितवान्)
पापबुद्धिः: तात ! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्यति।
धर्मबुद्धि: हाँ, बिल्कुल! ऐसा ही हो।
(जब वे दोनों अपने नगर के समीप पहुँचे, तब)
पापबुद्धि: भद्र! यह सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है। इसलिए इस धन को यहीं घने जंगल में कहीं जमीन में दबाकर, थोड़ा सा ही धन लेकर घर में प्रवेश करते हैं।
धर्मबुद्धि: आपने बिल्कुल सच कहा, ऐसा ही करते हैं।
जैसी दोनों ने योजना बनाई थी, वैसे ही गड्ढा खोदकर वहीं धन गाड़कर वे अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन आधी रात को पापबुद्धि ने जंगल जाकर वह सारा धन निकाल लिया और गड्ढे को भर कर अपने घर लौट आया।
(कुछ दिनों के बाद)
पापबुद्धि: मित्र! मेरे परिवार में बहुत से लोग हैं, धन के अभाव से कष्ट हो रहा है। इसलिए वहाँ चलकर थोड़ा सा धन ले आते हैं।
धर्मबुद्धि: ठीक है मित्र! चलते हैं।
(फिर दोनों ने जाकर जब उस स्थान को खोदा, तो बर्तन को खाली देखा। इसी बीच पापबुद्धि अपना सिर पीटते हुए बोला)
पापबुद्धि: अरे धर्मबुद्धि! यह धन तुम्हारे द्वारा ही चुराया गया है, किसी और द्वारा नहीं। इसलिए मुझे मेरा आधा हिस्सा दे दो, अन्यथा मैं राजदरबार में शिकायत कर दूँगा।
धर्मबुद्धि: अरे दुष्ट! ऐसा मत कहो। मैं वास्तव में धर्मबुद्धि हूँ, मैं चोरी जैसा नीच कर्म नहीं करता।
धर्मबुद्धि (धार्मिक विचार वाले) लोग पराई स्त्री को माता के समान, पराए धन को मिट्टी के ढेले (पत्थर) के समान और सभी प्राणियों को अपनी ही आत्मा के समान देखते हैं।
(इस प्रकार विवाद करते हुए वे दोनों न्यायाधीश के पास पहुँचे।)
धर्माधिकारी (न्यायाधीश): तुम दोनों में से किसी के भी चोरी करने का कोई गवाह नहीं है। अतः जहाँ मानवीय प्रमाण उपलब्ध न हो, वहाँ वनदेवता ही न्याय का निर्णय करेंगे। इसलिए कल प्रातःकाल तुम दोनों हमारे साथ उस वन प्रदेश में चलना, वहीं निर्णय होगा।
(इसी बीच पापबुद्धि ने घर जाकर अपने पिता को समझाया)
पापबुद्धि: पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का बहुत सारा धन चुरा लिया है। यदि आप मेरे कहे अनुसार बोलेंगे तो वह धन हमारे पास सुरक्षित रहेगा, अन्यथा हमारे प्राण चले जाएँगे।
English Translation:
Dharmabuddhi: "Certainly! Let it be so."
(When they arrived near their hometown)
Papabuddhi: "Good friend! It is unwise to take all this wealth home. Therefore, burying this wealth here in the dense forest in the ground, let us carry only a small amount and enter our homes."
Dharmabuddhi: "You have spoken the truth; let us do so."
As both had planned, they dug the earth, deposited the wealth there, and went to their respective homes. On another day at midnight, Papabuddhi went to the forest, took away all that wealth, refilled the hole, and returned to his house.
(After a few days)
Papabuddhi: "Friend! There are many members in my family; I am suffering from lack of money. Therefore, let us go there and fetch a small portion of the wealth."
Dharmabuddhi: "Sure, friend! Let us go."
(Both went and dug up that spot, only to find the vessel empty. Thereupon, striking his own forehead, Papabuddhi cried out:)
Papabuddhi: "O Dharmabuddhi! This wealth has been stolen by you and no one else! Give me my half share, or else I will report you to the royal court."
Dharmabuddhi: "O wicked soul! Do not speak such falsehood. I am truly of virtuous mind. I do not commit theft.
> The righteous-minded view another man’s wife as a mother, another's possessions as a clod of earth, and all living beings as their own self."
>
(Arguing thus, both approached the judicial magistrate.)
Judge (Dharmadhikari): "Indeed, there is no witness to the act of theft by either of you. Therefore, where human evidence is unavailable, the forest deity alone shall deliver the judgment. Hence, tomorrow morning, both of you accompany us to the forest; the verdict will be delivered right there."
(Meanwhile, Papabuddhi went home and instructed his father)
Papabuddhi: "Father! I have stolen vast wealth from Dharmabuddhi. If you speak as I direct, that wealth will stay permanently with us; otherwise, it will cost us our lives."
पिता: वत्स ! द्रुतं वद, अहं किं करवाणि येन तद्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत् ।
पापबुद्धिः: तात ! अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः। तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान् साम्प्रतमेव प्रविशतु। ततः प्रभाते यदाहं सत्यश्रावणाय निवेदयामि, तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौर इति।
(तथा कृते, प्रातःकाले स्नात्वा पापबुद्धिः धर्मबुद्धिना धर्माधिकारिणा च सह न्यायार्थं वनदेवतायाः समीपमुपागतः। अन्येऽपि सामाजिकाः तद्रष्टुमागताः)
पापबुद्धिः:
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च ।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम् ॥
भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय।
पिता शमीकोटरस्थः: भोः ! शृणुत, शृणुत! धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्।
(तद् आकर्ण्य ते सर्वे जनाः विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः)
सर्वे जनाः: धनापहरणदोषहेतोः शास्त्रविहितप्रकारेण धर्मबुद्धये दण्डः दातव्यः।
धर्मबुद्धिः: इदं मिथ्याभाषितमस्ति। नाहं चोरितवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि। (तथा करोति)
(अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरे अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः)
जनाः: (साश्चर्यम्) भोः ! किमिदम् ? किमिदम् ?
पिता पापबुद्धेः: एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)
धर्माधिकारी: एष पापबुद्धिः दण्डनीयः।
(राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च)
सर्वे जनाः: भो धर्मबुद्धे ! त्वया सम्यक् कृतम्। पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् ।
Hindi Translation:
पिता: बेटा! जल्दी बताओ, मैं क्या करूँ जिससे वह धन सुरक्षित रह सके?
पापबुद्धि: पिताजी! जंगल में एक बड़ा शमी का पेड़ है। उसमें एक बड़ा खोखला कोटर (खोल) है। आप अभी ही उसमें छिप जाइए। फिर सुबह जब मैं सत्य बोलने की प्रार्थना करूँगा, तब आपको कहना है कि धर्मबुद्धि ही चोर है।
(वैसा ही किया गया। प्रातःकाल स्नान करके पापबुद्धि, धर्मबुद्धि और न्यायाधीश के साथ न्याय के लिए वनदेवता के समीप आया। नगर के अन्य लोग भी यह देखने आए।)
पापबुद्धि:
सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यमराज, दिन, रात, दोनों संध्याएँ और धर्म — ये सभी मनुष्य के आचरण को जानते हैं।
हे भगवती वनदेवता! हम दोनों के बीच में जो चोर है, वह आप बताइए।
शमी के कोटर में छिपा पिता: अरे! सुनो, सुनो! यह धन धर्मबुद्धि द्वारा ही चुराया गया है।
(यह सुनकर सभी लोग आश्चर्य से खुली आँखों वाले हो गए।)
सभी लोग: धन चुराने के अपराध के कारण धर्मबुद्धि को शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार दंड दिया जाना चाहिए।
धर्मबुद्धि: यह झूठ कहा गया है। मैंने चोरी नहीं की है। मैं इस शमी के कोटर को आग में जलने वाली सूखी लकड़ियों आदि से घेरकर आग लगाता हूँ। (वह ऐसा ही करता है।)
(फिर उस शमी के कोटर के जलने पर आधे जले हुए शरीर वाला, फूटी आँखों वाला और करुण विलाप करता हुआ पापबुद्धि का पिता बाहर निकला।)
लोग: (आश्चर्य से) अरे! यह क्या है? यह क्या है?
पापबुद्धि का पिता: यह सब पापबुद्धि का ही षड्यंत्र था। (ऐसा कहकर वह मर गया।)
धर्माधिकारी: यह पापबुद्धि दंड देने योग्य है।
(राजकर्मचारियों ने नियमानुसार पापबुद्धि को दंडित किया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की।)
सभी लोग: हे धर्मबुद्धि! तुमने बहुत अच्छा किया। पापबुद्धि की व्यर्थ चतुराई के कारण उसका पिता आग में जलकर मारा गया। इसलिए ठीक ही कहा गया है —
बुद्धिमान व्यक्ति को उपाय की योजना बनाते समय उससे होने वाले अनर्थ (संकट) पर भी विचार कर लेना चाहिए।
Father: "Son! Tell me quickly, what should I do so that the wealth remains secure?"
Papabuddhi: "Father! There is a large Shami tree in the forest. It has a huge hollow trunk. Enter it right away. In the morning, when I request the forest deity to reveal the truth, you must proclaim that Dharmabuddhi is the thief."
(This was done. In the morning, after bathing, Papabuddhi, along with Dharmabuddhi and the judge, came before the tree for justice. Other citizens also gathered to witness it.)
Papabuddhi:
"The Sun, the Moon, the Wind, Fire, the Sky, the Earth, Water, the Conscience, Yama (Lord of Justice), Day, Night, both Twilights, and Dharma know the conduct of man."
"O Divine Forest Deity! Declare which of us is the thief."
Father (inside the hollow trunk): "Listen, listen! This wealth has been stolen by Dharmabuddhi!"
(Hearing this, all the people were wide-eyed with astonishment.)
All People: "For the crime of stealing wealth, Dharmabuddhi must be punished according to the prescribed legal codes."
Dharmabuddhi: "This is a blatant lie. I did not steal it. I shall surround this Shami tree's hollow with combustible materials and set it ablaze." (He did so.)
(As the hollow of the Shami tree burned, Papabuddhi’s father emerged crying pitifully, his body half-charred and his eyes damaged.)
People: (With astonishment) "Oh! What is this? What is this?"
Papabuddhi's Father: "All of this was the wicked plot of Papabuddhi!" (Saying this, he died.)
Judge: "This Papabuddhi must be punished."
(The king’s officers punished Papabuddhi according to the law and praised Dharmabuddhi.)
All People: "O Dharmabuddhi! You acted rightly. Due to Papabuddhi’s false cleverness, his own father was killed by fire. Hence it is rightly said:
" A wise person should think of the remedy, but should also consider the prospective disaster."
अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (Questions & Answers)
१. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत-
(Answer the following questions in full sentences:)
(क) नरस्य वृत्तं के जानन्ति ?
उत्तरम्: आदित्यः, चन्द्रः, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयं, यमः, अहः, रात्रिः, उभे संध्ये, धर्मः च नरस्य वृत्तं जानन्ति।
(ख) धर्मबुद्धयः किं वीक्षन्ते ?
उत्तरम्: धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।
(ग) कस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् ?
उत्तरम्: येन धरणीपीठे भ्रमता देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम्।
(घ) पापबुद्धिः स्वपितरं किम् उक्तवान् ?
उत्तरम्: पापबुद्धिः स्वपितरम् उक्तवान् यत् वनप्रदेशे शमीवृक्षस्य महाकोटरे भवान् प्रविशतु, प्रभाते च 'धर्मबुद्धिः चौरः' इति वदतु।
(ङ) प्राज्ञः किं-किं चिन्तयेत् ?
उत्तरम्: प्राज्ञः उपायं तथा अपायं च चिन्तयेत्।
(च) मानवः कदा विद्यां वित्तं शिल्पं च प्राप्नोति ?
उत्तरम्: यावत् मानवः हृष्टः भूमौ देशाद् देशान्तरं न व्रजति तावत् न प्राप्नोति (अर्थात् यदा मानवः देशाद् देशान्तरं व्रजति तदा विद्यां वित्तं शिल्पं च सम्यक् प्राप्नोति)।
(छ) पापबुद्धिः किं चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः ?
उत्तरम्: पापबुद्धिः चिन्तितवान् यत् अहं मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च अस्मि, अतः धर्मबुद्धेः आश्रयणेन धनं सम्पाद्य तं वञ्चयित्वा सुखी भविष्यामि इति चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः।
२. अधोलिखितवाक्येषु स्थूलाक्षरपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(Frame questions based on the emphasized words:)
(क) एनम् अपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि।
उत्तरम्: एनम् अपि किं कृत्वा सुखी भवामि ?
(ख) सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
उत्तरम्: सर्वं धनं स्वीकृत्य कुत्र / कम् गच्छावः ?
(ग) निशीथे अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान्।
उत्तरम्:कदा अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान् ?
(घ) तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः विस्मयोत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः।
उत्तरम्: तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः कीदृशाः सञ्जाताः ?
(ङ) अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निना प्रज्वालयामि।
उत्तरम्: अहम् एतत् शमीकोटरं केन प्रज्वालयामि ?
३. अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति लिखत-
(Write who said the following statements to whom:)
कः (Who) कं प्रति (To whom)
(ख) प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। .................. ......................
(ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। .................. ......................
(घ) भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद। .................. ......................
(ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। .................. ......................
उत्तरम्:
कः (Who) कं प्रति (To whom)
(ख) प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। धर्माधिकारी धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च (उभौ)
(ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। पापबुद्धिः धर्मबुद्धिम्
(घ) भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद। धर्मबुद्धिः पापबुद्धिम्
(ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। पापबुद्धेः पिता जनान् (सर्वान्)
४. उदाहरणानुसारं भूतकालिकवाक्यानि वर्तमानकालिकवाक्येषु परिवर्तयत-
(Convert the past tense sentences into present tense sentences as per example:)
उदाहरणम् - भवानपि मया सहैव प्रभूतं धनं प्राप्तवान्। भवानपि मया सहैव प्रभूतं धनं प्राप्नोति।
(क) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। ..............................................................
(ख) पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्। ..............................................................
(ग) पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्। ..............................................................
(घ) अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्। ..............................................................
(ङ) सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः। ..............................................................
उत्तरम्:
(क) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डयन्ति।
(ख) पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्। पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादयति।
(ग) पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्। पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगच्छति।
(घ) अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्। अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् वदति / कथयति।
(ङ) सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः। सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसन्ति।
५. श्लोकानां भावार्थान् विचिन्त्य कोष्ठकात् समुचितपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत-
(Fill in the blanks with appropriate words from the brackets:)
(क) सूर्यः चन्द्रः .....................अग्निः आकाशः भूमिः जलं ........................यमः दिवसः रात्रिः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सर्वविधं ....................जानन्ति। अतः वयं सर्वदा उत्तमं व्यवहारं कुर्मः। (कोष्ठकम्: व्यवहारं / पवनः / हृदयं)
(ख) यः ...............न अटति, विविधदेशानां संस्कृतीः .......................च न जानाति, पृथिवीपृष्ठे तस्य जन्म ..................भाति। (कोष्ठकम्: भाषाः / व्यर्थं / अन्यदेशेषु)
(ग) सज्जनाः सर्वासु नारीषु .....................इव, अन्येषां .................मृत्पिण्डम् इव, सर्वेषु प्राणिषु च ....................इव चिन्तयन्ति। (कोष्ठकम्: द्रव्येषु / स्वयम् / मातरः)
(घ) बुद्धिमान् मनुष्यः ......................मार्गान् समस्यादूरीकरणस्य .......................... च.........................।
(कोष्ठकम्: कौशलानि / कार्यसाधनस्य / जानीयात्)
उत्तरम्:
(क) सूर्यः चन्द्रः पवनः अग्निः आकाशः भूमिः जलं हृदयं यमः दिवसः रात्रिः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सर्वविधं व्यवहारं जानन्ति। अतः वयं सर्वदा उत्तमं व्यवहारं कुर्मः। (कोष्ठकम्: व्यवहारं / पवनः / हृदयं)
(ख) यः अन्यदेशेषु न अटति, विविधदेशानां संस्कृतीः भाषाः च न जानाति, पृथिवीपृष्ठे तस्य जन्म व्यर्थं भाति।
(कोष्ठकम्: भाषाः / व्यर्थं / अन्यदेशेषु)
(ग) सज्जनाः सर्वासु नारीषु मातरः इव, अन्येषां द्रव्येषु मृत्पिण्डम् इव, सर्वेषु प्राणिषु च स्वयम् इव चिन्तयन्ति।
(कोष्ठकम्: द्रव्येषु / स्वयम् / मातरः)
(घ) बुद्धिमान् मनुष्यः कार्यसाधनस्य मार्गान् समस्यादूरीकरणस्य कौशलानि च जानीयात्।
(कोष्ठकम्: कौशलानि / कार्यसाधनस्य / जानीयात्)
६. उदाहरणं दृष्ट्वा अधोलिखितानां पदानां समस्तपदं विग्रहं वा कुरुत-
(Make compound words or split compounds as shown in the example:)
उदाहरणम् — अर्थोपार्जनम् अर्थस्य उपार्जनम्
(क) गुरुजनाज्ञया - ................................
(ख) वनदेवता - ................................
(ग) ................................ - वित्तस्य अभावात्
(घ) बुद्धिप्रभावेण - ................................
(ङ) ................................ - धरण्याः पीठे
उत्तरम्:
(क) गुरुजनाज्ञया - गुरुजनानाम् आज्ञया
(ख) वनदेवता - वनस्य देवता
(ग) वित्ताभावात् -वित्तस्य अभावात्
(घ) बुद्धिप्रभावेण - बुद्धेः प्रभावेण
(ङ) धरणीपीठे - धरण्याः पीठे
७. अधोलिखितानि वाक्यानि कथाक्रमानुसारं पुनः लिखत-
(Rearrange the following sentences in chronological story order:)
शुद्धः कथाक्रमः (CorreCorrect Story Order):
(क) भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति।
(ख) ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
(ग) द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
(घ) कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
(ङ) यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ।
(च) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
उत्तरम्:
(घ) कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
(ख) ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
(ङ) यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ।
(ग) द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
(क) भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति।
(च) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
Keywords: Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 7, Sanskrit Sharada Class 9, Class 9 Sanskrit Chapter 7, Sharada Sanskrit Chapter 7, Class 9 Sanskrit translation, Sanskrit Chapter 7 summary, Class 9 Sanskrit question answers.

Post a Comment
please do not enter any spam link in the comment box.