Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

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नवमः पाठः – कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः

सम्पूर्णः पाठः (संस्कृत-मूलपाठः):

पाठ-परिचयः

रामायणं महाभारतं चेति द्वौ प्रसिद्धौ इतिहास-ग्रन्थौ। महाभारतम् अवलम्ब्य बहवो ग्रन्थाः विरचिताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् 'एकचक्रम्' इति लघुरूपकम् अन्यतमम्। महाभारते प्रतिपादितः बकासुरवधः अस्य कथावस्तु। अयं पाठ्य-भागः 'एकचक्रम्' इति रूपकस्य तृतीय-चतुर्थाङ्काभ्याम् उद्धृतः।  

अङ्कद्वयस्य पूर्वकथाप्रसङ्गः

पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति। गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पृच्छति। ततः शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता यत् एकचक्रनगरवासिनां नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्, तद्दिने पर्यायेण तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत् इति। तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामीति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती।

इमं विषयं ज्ञात्वा ब्राह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः सन्निहितः इति भावयन् भीमः मृष्टान्न-भाण्डसहितः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः भवति।  

(ततः प्रविशति कुन्ती भीमसेनेन सह)  

कुन्ती: पुत्र ! किञ्चित् प्रतिश्रुतं मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय।  

भीमः: सम्यगनुष्ठितम्। आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन।  

कुन्ती: आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।  

भीमः: श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः।  

कुन्ती: श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः।  

भीमः: बाढम्।  

कुन्ती: न चैतावत्। मानुषभोजी स श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः। तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी 
शोचति।  

भीमः: विदितमवशिष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्।  

कुन्ती: (मौनमवलम्बते)  

भीमः: मातः ! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्। क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। पश्य –  

भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः ॥

अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि।
  
कुन्ती: वत्स भीम ! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण। भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय। तदेतत् सज्जीक्रियतामिति प्रेरयिष्यामि ब्राह्मणकुटुम्बम्।  

भीमः: अहो ! प्रियं मे। सज्जीक्रियताम्। अपरमिदं प्रियमनुष्ठितं मे भवत्या। प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्।  

(ततः प्रविशन्ति युधिष्ठिरादयः)  

युधिष्ठिरः: (विलोक्य) अये ! हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः।  

भीमः: प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्।  

अर्जुनः: स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य।  

नकुलः: ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य।  

भीमः: पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः।  

सहदेवः: अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ?  

भीमः: तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि।  

युधिष्ठिरः: आयोधनमिति। केन ?  

भीमः: बकासुरेण।  

युधिष्ठिरः: अम्ब ! किमिदानीमुपक्षिप्तम् ?  

कुन्ती: पुत्रकाः ! बकासुरस्य भोजनपरिकल्पनं जानीथ पौराणाम्। तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य। 
ततस्ततः...  

युधिष्ठिरः: ज्ञातमवशिष्टं मातः ! न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ?  

भीमः: धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।  

युधिष्ठिरः: वत्स भीमसेन ! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते।  

भीमः: ततः किम् ? राक्षसध्वंसी भीमः स्मर्यते। अलं विशङ्कया। हनिष्यामि तं दुरात्मानम्।  

अर्जुनः: धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि।  

भीमः: मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।  

इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥
  
(ततः सर्वैरनुज्ञातः बकं हन्तुकामः भीमः प्रस्थितः)

(ततः प्रविशति भक्ष्य-भोज्यादिक-भाण्ड-पूरित-शकटेन सह)  

बकः: मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्।  

भीमः: सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। त्वां धर्मदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्।  

बकः: कथं, कः खलु अधर्मः मया सेवितः ? (सहासमुदरं परिमृजन्)  

भीमः: नरभक्षणम्।  

बकः: नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।  

भीमः: नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।  

बकः: क्षत्रियोऽसि ?  

भीमः: बाढम्, क्षत्रियोऽस्मि।  

रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम् ॥
  
बकः: अहह ! मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान् ?  

भीमसेनः: कामम् ! कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः।  

बकः: इदमस्ति मे भागधेयम्। चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः।  

भीमसेनः: इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां श्लाघनीयं रिपुं मन्यसे। अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्।  

बकः: वाचाट ! क्षत्रियडिम्भ, गृहाण शस्त्रम्। शातयामि ते दर्पम्।  

भीमसेनः: अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिद्रोऽस्ति ममैष मुष्टिः।  

(उभौ प्रहरतः । मल्लयुद्धं प्रवर्तते । हतः पतति बकः ।)  

२. हिन्दी-अनुवादः (Hindi Translation)

पाठ परिचय:

रामायण और महाभारत दो प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ हैं। महाभारत पर आधारित होकर अनेक ग्रंथों की रचना की गई है। उनमें महामहोपाध्याय श्रीरंगनाथ शर्मा द्वारा रचित 'एकचक्रम्' नामक लघु-नाटक प्रमुख है। महाभारत में वर्णित बकासुर-वध इसकी कथावस्तु है। यह पाठ्यांश 'एकचक्रम्' नाटक के तीसरे और चौथे अंक से उद्धृत किया गया है।  

अंकों की पूर्व-कथा:

पाण्डव एकचक्रानगरी में किसी ब्राह्मण के घर में रह रहे हैं। घर के स्वामी के घर से रोने की आवाज़ सुनकर वहाँ गई पाण्डवों की माता कुन्ती रोने का कारण पूछती हैं। तब शोकाकुल परिवार ने उन्हें बताया कि एकचक्रा नगरी के निवासियों और पास ही रहने वाले बक नामक असुर के बीच हुए समझौते के अनुसार, प्रतिदिन नगर का एक निवासी स्वेच्छा से असुर का भोजन बनेगा। उस दिन बारी के अनुसार उसी ब्राह्मण परिवार के बलिदान की बारी थी। उनकी दुर्दशा जानकर कुन्ती ने प्रतिज्ञा की कि वह अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजेंगी।
इस बात को जानकर, ब्राह्मण द्वारा किए गए उपकार का बदला चुकाने का समय आ गया है—यह सोचते हुए भीम स्वादिष्ट भोजन के बर्तनों से भरी गाड़ी लेकर बकासुर के पास जाने को तैयार होते हैं।  
(इसके बाद कुन्ती भीमसेन के साथ प्रवेश करती हैं)  

कुन्ती: पुत्र! मैंने पड़ोसी ब्राह्मण को कुछ वचन दिया है।  

भीम: बहुत अच्छा किया। वे आदरणीय अतिथि-सत्कार करने वाले हैं और हमें आश्रय देकर हमारे उपकारी हैं।  

कुन्ती: सुनो, इस एकचक्रा नगरी के निकटवर्ती पर्वत पर बक नाम का राक्षस रहता है।  

भीम: उस दुष्ट का समाचार मैंने सुन रखा है। बारी-बारी से नगरवासी उसके लिए बलि (भोजन) ले जाते हैं।  

कुन्ती: कल प्रातः इस ब्राह्मण की बारी है।  

भीम: हाँ।  

कुन्ती: और केवल इतना ही नहीं। सुना जाता है कि वह आदमखोर (मनुष्यों को खाने वाला) है। भोजन-सामग्री के 
साथ एक मनुष्य भी उसे भेजा जाना है। इसलिए उस बालक का बेचारा पिता शोक कर रहा है।  

भीम: शेष बात मुझे ज्ञात हो गई। आपने यह वचन दिया है कि मेरे पुत्रों में से कोई भेजा जाएगा।  

कुन्ती: (मौन धारण कर लेती हैं)  

भीम: माता! इसमें तनिक भी शोक करने की आवश्यकता नहीं है। एक क्षत्राणी के लिए जो उचित था, आपने वही किया। यह प्रतिज्ञा सर्वथा उचित है। वेदों के ज्ञाता यह पड़ोसी ब्राह्मण प्रत्युपकार के योग्य हैं। देखिए –  
दूसरों (इन नागरिकों) द्वारा भिक्षा देकर दीर्घकाल तक हमारा उपकार किया गया है।
उपकार के बदले उपकार किया जाना चाहिए, यही सनातन धर्म है।
मैं स्वयं ही बकासुर के पास जाऊँगा।
  
कुन्ती: बेटा भीम! भरतवंश के दीपक मेरे पुत्र ने सर्वथा योग्य बात कही है। खाने-पीने योग्य स्वादिष्ट भोजन से पूरी गाड़ी भरकर उस राक्षस के लिए भेजनी होगी। मैं ब्राह्मण परिवार को इसे तैयार करने के लिए कहती हूँ।  

भीम: अहा! मुझे यह बहुत प्रिय है। तैयार किया जाए। आपने मेरे लिए एक और प्रिय कार्य कर दिया। प्रचुर मात्रा में 
भोजन प्राप्त होगा।  

(तभी युधिष्ठिर आदि प्रवेश करते हैं)  

युधिष्ठिर: (देखकर) अरे! वत्स भीम की आँखें प्रसन्नता से खिली हुई सी प्रतीत हो रही हैं।  

भीम: मेरे लिए प्रचुर भोजन उपस्थित हुआ है।  

अर्जुन: पेटू (भोजन-प्रेमी) का प्रसन्न होना तो स्वाभाविक ही है।  

नकुल: अग्रज के होंठ फड़क रहे हैं।  

भीम: देखो, भुजाएँ भी फड़क रही हैं।  

सहदेव: क्या दोनों हाथों से खाओगे?  

भीम: वह भी होगा। न केवल भोजन प्रस्तुत है, अपितु युद्ध भी!  

युधिष्ठिर: युद्ध! किसके साथ?  

भीम: बकासुर के साथ।  

युधिष्ठिर: माताजी! यह इस समय क्या प्रसंग छेड़ा गया है?  

कुन्ती: पुत्रो! तुम जानते ही हो कि नगरवासियों द्वारा बकासुर के भोजन की व्यवस्था की जाती है। अब इस समय बारी  पड़ोसी ब्राह्मण की आ पड़ी है। उसके बाद...  

युधिष्ठिर: माताजी! आगे की बात मैं समझ गया! मैं आपके इस निर्णय का कदापि समर्थन नहीं कर सकता। जिस वीर के बाहुबल के सहारे हम सुखपूर्वक सोते हैं और जिसके विषय में सोचकर दुर्योधन को नींद नहीं आती, उस भीम को भेजने का संकल्प आपने कैसे कर लिया?  

भीम: धर्म को जानने वाले आपको यहाँ धर्म का मर्म देखना चाहिए। माता की आज्ञा की अवज्ञा नहीं की जा सकती।  

युधिष्ठिर: वत्स भीमसेन! सुना जाता है कि वह राक्षस बहुत बलवान और नरभक्षी है।  

भीम: तो क्या हुआ? भीम को राक्षसों का विनाशक माना जाता है। संशय छोड़िए। मैं उस दुरात्मा का वध कर दूँगा।  

अर्जुन: धनुर्धर मैं भी आपके पीछे-पीछे चलूँगा।  

भीम: नहीं, ऐसा मत करो। तीखे दाँतों वाला सिंह किसी की सहायता की अपेक्षा नहीं रखता। ये मेरी दोनों पुष्ट भुजाएँ ही मेरी स्वाभाविक सहायक हैं।

बकासुर का मैं उसी प्रकार संहार करूँगा, जैसे सिंह किसी तुच्छ मृग का करता है॥
  
(इसके उपरान्त सभी की आज्ञा पाकर बकासुर को मारने की इच्छा से भीम प्रस्थान करते हैं)

(फिर खाने-पीने की सामग्रियों के बर्तनों से भरी गाड़ी के साथ प्रवेश करते हैं)  

बक: अरे नीच मानव! मुझे मेरा भोजन परोस।  

भीम: सब कुछ मेरे पेट में स्थित भगवान् जठराग्नि को परोस दिया गया है। मैं तो तुझ धर्म को कलंकित करने वाले का वध करने आया हूँ।  

बक: कैसे? भला मैंने कौन-सा अधर्म किया है? (हँसते हुए पेट पर हाथ फेरते हुए)  

भीम: मनुष्यों का भक्षण।  

बक: मांसाहारी राक्षसों का धर्म ही नरभक्षण है।  

भीम: और पृथ्वी का पालन करने वाले क्षत्रियों का धर्म नर-रक्षा (मनुष्यों की रक्षा) है।  

बक: क्या तुम क्षत्रिय हो?  

भीम: हाँ, निश्चय ही मैं क्षत्रिय हूँ।  

मैं सज्जनों का रक्षक हूँ, बलवानों में श्रेष्ठ हूँ।
हिडिम्ब का संहारक हूँ और तुम जैसों के लिए काल (मृत्यु) हूँ ॥
  
बक: अहा! मेरे मित्र हिडिम्ब के घातक कुन्ती-पुत्र तुम हो?  

भीमसेन: निसंदेह! मैं ही कुन्ती-पुत्र भीमसेन हूँ।  

बक: यह तो मेरा सौभाग्य है! दीर्घकाल से खोजा जा रहा मृग स्वयं ही बाघ की गुफा में आ कूदा है। तुम मेरे लिए एक 
प्रशंसनीय शत्रु हो।  

भीमसेन: यह मेरे लिए कल्याणकारी है कि तुम मुझे प्रशंसनीय शत्रु मानते हो। अब अपने मित्र हिडिम्ब के मार्ग का अनुसरण करो (अर्थात् यमलोक जाओ)।  

बक: अरे वाचाल! क्षत्रिय बालक! शस्त्र उठाओ। मैं तुम्हारा घमंड चूर-चूर करता हूँ।  

भीमसेन: शस्त्र उठाने का ढोंग रहने दो, तुम्हारी खोपड़ी की हड्डियों को चकनाचूर करने के लिए मेरी यह मुट्ठी ही पर्याप्त है।  

(दोनों एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं। मल्लयुद्ध प्रारंभ होता है। बकासुर मारा जाकर गिर पड़ता है।)


English Translation :

Introduction:

The Ramayana and the Mahabharata are two renowned epic histories. Numerous literary works have been composed based on the Mahabharata. Among them, the short play titled Ekachakram, composed by Mahamahopadhyaya Sri Ranganatha Sharma, is notable. The slaying of Bakasura described in the Mahabharata forms its plot. This chapter is extracted from the third and fourth acts of the play 
Ekachakram.  

Background Context:

The Pandavas were residing in the house of a Brahmin in the town of Ekachakra. Hearing weeping sounds from the landlord's house, Kunti, the mother of the Pandavas, went there and enquired about the cause of their distress. The sorrow-stricken family informed her that according to a treaty between the citizens of Ekachakra and a demon named Baka who lived nearby, one citizen had to willingly go every day as food for the demon. On that particular day, by rotation, it was the turn of this Brahmin family to make the sacrifice. Learning of their plight, Kunti promised to send one of her sons to Bakasura.
Knowing this, Bhima, realizing that the time had come to repay the benevolence shown by the Brahmin who had sheltered them, prepared to go to Bakasura with a cart loaded with delicious food.  

(Then enters Kunti along with Bhimasena)  

Kunti: Son! I have made a promise to our neighbor, the Brahmin.  

Bhima: You did well. Indeed, he is a venerable host who has done us a great favor by giving us shelter.  

Kunti: Listen, on a nearby mountain of this town of Ekachakra lives a demon named Baka.  

Bhima: I have heard about that evil soul. The citizens bring offerings to him by turns.  

Kunti: Tomorrow morning, it is the turn of this Brahmin.  

Bhima: Indeed.  

Kunti: And not only that. He is known to be a man-eater. Along with the food provisions, a human must 
also be sent to him. Therefore, the poor father of the boy is grieving.  

Bhima: I understand the rest. You promised that one of your sons would be sent.  

Kunti: (Remains silent)  

Bhima: Mother! There is nothing to lament here. You acted as befits a Kshatriya woman. This promise is entirely just. This neighbor, learned in the Vedas, deserves repayment of his kindness. See –  We have long been sustained and benefited by others through their gifts of alms.

A favor received must be returned with a favor; this is eternal righteousness (Sanatana Dharma).
I myself shall go to Bakasura.
  
Kunti: Dear child Bhima! Well spoken by my son, the light of the Bharata dynasty. A full cartload of delicious food and sweets must be sent to the demon. I shall urge the Brahmin family to prepare this.  

Bhima: Wonderful! That pleases me. Let it be prepared. You have done me another great favor—an abundance of food will be brought!  

(Then enter Yudhishthira and the other brothers)  

Yudhishthira: (Looking at him) Ah! Brother Bhima's eyes seem wide with delight!  

Bhima: A feast of food is before me!  

Arjuna: It is truly natural for a glutton to rejoice!  

Nakula: Look, elder brother's lips are quivering!  

Bhima: Look, my arms are twitching too!  

Sahadeva: Will you eat with both hands?  

Bhima: That too shall happen. Not only is food waiting, but a battle as well!  

Yudhishthira: A battle! With whom?  

Bhima: With Bakasura!  

Yudhishthira: Mother! What is being brought up right now?  

Kunti: My sons! You know of the arrangement made by the citizens for Bakasura's food. Now the turn has fallen upon our neighbor, the Brahmin. And so...  

Yudhishthira: I understand the rest, Mother! I certainly cannot support your resolve. Relying on the strength of whose arms we rest in peace, and thinking of whom Duryodhana finds no sleep—how could 
you decide to send that very Bhima?  

Bhima: Being one who knows Dharma, you should see the higher righteous duty here. A mother's command must never be disobeyed.  

Yudhishthira: Dear Bhimasena! It is heard that the demon is immensely strong and a man-eater.  
Bhima: What of it? Bhima is remembered as the destroyer of demons. Cast aside your doubts. I will destroy that wicked soul!  

Arjuna: Being an archer, I shall follow you.  

Bhima: No, don't do that. The sharp-fanged lion does not look for assistance.  
These two robust arms of mine are my natural allies.
I shall destroy Baka just as a lion crushes a small deer.
  
(Permitted by everyone, Bhima departs, eager to slay Baka)
(Then Bhima enters with the cart full of delicious delicacies and food vessels)  

Baka: You wretched human, serve me my food!  

Bhima: Everything has already been served to the sacred fire residing in my belly! I have come here to kill you, the defiler of Dharma!  

Baka: What? What unrighteous deed have I committed? (Stroking his belly with laughter)  

Bhima: Consuming humans.  

Baka: Eating human flesh is the duty (nature) of carnivorous demons!  

Bhima: And protecting humans is the duty of Kshatriyas, the protectors of the earth!  

Baka: Are you a Kshatriya?  

Bhima: Yes, indeed, I am a Kshatriya!  

I am the protector of noble people, foremost among the mighty-armed.
Slayer of Hidimba, and death incarnate to beings like you!
  
Baka: Aha! Are you that son of Kunti who killed my friend Hidimba?  

Bhimasena: Indeed! I am Bhimasena, son of Kunti!  

Baka: This is my good fortune! The long-sought prey has jumped into the tiger's den on its own! You are a worthy adversary.  

Bhimasena: It is a blessing to me that you consider me a worthy enemy. Now follow your friend Hidimba (to death)!  

Baka: Talkative Kshatriya boy! Pick up your weapon. I shall shatter your pride!  

Bhimasena: Enough with the pretense of taking up weapons; this fist of mine is sufficient to crush the bones of your skull!  

(Both strike each other. A wrestling duel ensues. Bakasura falls dead.)  

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 9 Solution

अभ्यासः (प्रश्नोत्तराणि / Questions and Answers)

१. अधः प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत -

(क) भीमस्य जननी का?

उत्तरम्: कुन्ती  

(ख) कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति?

उत्तरम्: युधिष्ठिरः  

(ग) पाण्डवानाम् उपकर्ता कः?

उत्तरम्: ब्राह्मणः / विप्रः  

(घ) कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते?

उत्तरम्: भीमम्  

(ङ) पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म?

उत्तरम्: एकचक्रनगरे 
 
(च) भरतवंशप्रदीपः कः?

उत्तरम्: भीमः  


(छ) कः भृशं परिदेवयते?

उत्तरम्: विप्रः (बालकस्य पिता)  



२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत -

(क) “भैक्षप्रदानेन........" इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः?

उत्तरम्: “भैक्षप्रदानेन..." इति श्लोकानुसारं कृते उपकारे सति प्रत्युपकारः करणीयः (कृतं प्रतिकृतं भूयात्) एषः सनातनः धर्मः अस्ति।
  
(ख) बकनामा दैत्यः कुत्र वसति?

उत्तरम्: बकनामा दैत्यः एकचक्रस्य पुरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते वसति।  

(ग) कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती?

उत्तरम्: कुन्ती प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयिष्यति इति प्रतिश्रुतवती।  

(घ) भीमस्य अग्रजः कः?
उत्तरम्: भीमस्य अग्रजः युधिष्ठिरः अस्ति।  

(ङ) का प्रत्यादेशं न अर्हति?

उत्तरम्: मातुः आज्ञा प्रत्यादेशं न अर्हति।
  
(च) पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति?

उत्तरम्: पौराः बकासुराय पर्यायक्रमेण बलिम् आहरन्ति।  

(छ) क्षत्रियाणां धर्मः कः?

उत्तरम्: नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः अस्ति।  



३. अधस्तात् दत्तानि वाक्यानि केन कं प्रति उक्तानि इति निर्दिशत -

उत्तरम् :

 क्र.सं.

 वाक्यानि

 केन/कया

 कं/कां प्रति

 

यथा- तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति

कुन्त्या

भीमम्

 1.

न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति

भीमेन

युधिष्ठिरम्

 2.

न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते

भीमेन

अर्जुनम्

 3.

क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठित

भीमेन

कुन्तीम्

 4.

अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?

सहदेवेन

भीमम्

 5.

तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ?

युधिष्ठिरेण

कुन्तीम्

 6.

नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः

बकेन

भीमम्

 

४. रेखाङ्कितपदेषु सन्धिं विभज्य सन्धिनाम लिखत -

उत्तरम् :

(क) सम्यगनुष्ठितम् = सम्यक् + अनुष्ठितम् (व्यञ्जन-सन्धिः / जश्त्वसन्धिः)  

(ख) पुरस्यादूरवर्तिनि = पुरस्य + अदूरवर्तिनि (दीर्घ-स्वरसन्धिः)  

(ग) दुरात्मनो वृत्तम् = दुरात्मनः + वृत्तम् (विसर्ग-सन्धिः / उत्वसन्धिः)  

(घ) मानुषोऽपि = मानुषः + अपि (विसर्ग-सन्धिः / उत्व-पूर्वरूपसन्धिः)  

(ङ) नास्त्यत्र = नास्ति + अत्र (यण्-स्वरसन्धिः)  

(च) यदुचितम् = यत् + उचितम् (व्यञ्जन-सन्धिः / जश्त्वसन्धिः)  

(छ) खल्वेकपुत्रः = खलु + एकपुत्रः (यण्-स्वरसन्धिः)  

(ज) सङ्कल्पितम् = सम् + कल्पितम् (व्यञ्जन-सन्धिः / अनुस्वार-परसवर्णसन्धिः)  

(झ) धर्मसङ्ग्रहोऽत्र = धर्मसङ्ग्रहः + अत्र (विसर्ग-सन्धिः / उत्व-पूर्वरूपसन्धिः)  

(ञ) राक्षस इति = राक्षसः + इति (विसर्गलोप-सन्धिः)  


५. पर्यायवाचि-पदानां मेलनं कुरुत -

यथा- पिता - जनकः 

उत्तरम् :

(क) आयोधनम् - युद्धम्  

(ख) विप्रः - ब्राह्मणः  

(ग) असुरः - दैत्यः / राक्षसः  

(घ) अम्ब - माता

(ङ) हुताशनः - अग्निः  


६. अधोलिखितानां पदानां विपरीतार्थक-शब्दान् लिखत -

यथा: पीवरः - कृशः  

(क) उपकृतः 

 

(ख) अग्रजस्य

 

(ग) उचितम् 

 

(घ) हर्षः

 


उत्तरम् :

(क) उपकृतः 

 अपकृतः / अनुपकृतः 

(ख) अग्रजस्य

 अनुजस्य

(ग) उचितम् 

 अनुचितम्  

(घ) हर्षः

 शोकः / विषादः 



७. मञ्जूषातः समुचितं विशेषणपदं चित्वा लिखत -

(मञ्जूषा: क्षत्रियाणी, शकटपूरं, प्रतिवेशी, खरदंष्ट्रः, जठरस्थः, कौन्तेयः, पीवरौ)  

यथा: पीवरौ - बाहू  

(क) ....................... मृष्टान्नम्  

(ख) .......................ब्राह्मणः  

(ग) .......................मृगाधिपः  

(घ) .......................भीमः  

(ङ) .......................कुन्ती  

(च) .......................हुताशनः  

उत्तरम् :

(क) शकटपूरं मृष्टान्नम्  

(ख) प्रतिवेशी ब्राह्मणः  

(ग) खरदंष्ट्रः मृगाधिपः  

(घ) कौन्तेयः भीमः  

(ङ) क्षत्रियाणी कुन्ती  

(च) जठरस्थः हुताशनः  



८. समस्तपदानि लिखत -

यथा: मृष्टम् अन्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयम् -                         मृष्टान्नम्  

(क) वीरस्य भुजयोः बलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे -             ...........................

(ख) भवता धर्माणां सङ्ग्रहः द्रष्टव्यः -                                  ...........................

(ग) नहि मातुः आज्ञा प्रत्यादेशमर्हति -                                 ...........................

(घ) धनुः धरति इति अहम् अनुगमिष्यामि -                          ...........................

(ङ) नहि खरदंष्ट्रः मृगाणाम् अधिपः सहायमपेक्षते -               ............................

(च) अस्य पुरस्य न दूरे वर्तते पर्वते वसति बकनामा दैत्यः -     ............................

उत्तरम् :

(क) वीरस्य भुजयोः बलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे - भुजबलम्  

(ख) भवता धर्माणां सङ्ग्रहः द्रष्टव्यः - धर्मसङ्ग्रहः  

(ग) नहि मातुः आज्ञा प्रत्यादेशमर्हति - मातुराज्ञा  

(घ) धनुः धरति इति अहम् अनुगमिष्यामि - धनुर्धरः  

(ङ) नहि खरदंष्ट्रः मृगाणाम् अधिपः सहायमपेक्षते - मृगाधिपः  

(च) अस्य पुरस्य न दूरे वर्तते पर्वते वसति बकनामा दैत्यः - अदूरवर्तिनि  


९. अधोलिखितवाक्यानाम् उचितभावैः सह सम्मेलनं कुरुत -

यथा: प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम् - हर्षः  


उत्तरम् :

(क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि - भ्रातृस्नेहः / उत्साहः  

(ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ? - विषादः / ग्लानिः  

(ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? - हासः (परिहासः)  

(घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम् - उत्साहः / आत्मविश्वासः  

(ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते - करुणा / दया  

(च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम् - अधिकारः / दर्पः  


१०. वाच्यपरिवर्तनं कुरुत (कर्म/भाववाच्यात् कर्तृवाच्ये) -

                कर्तृवाच्यम्                                         कर्मवाच्यम् 

यथा: भवत्या प्रतिश्रुतम्                -                     भवती प्रतिश्रुतवती।  

(क) क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्             -                  .........................................     

(ख) भवत्या सज्जीक्रियताम्           -                   .........................................    

(ग) भवत्या उपक्षिप्तम्                 -                    ......................................... 

(घ) त्वया सङ्कल्पितम्                   -                   .........................................    

(ङ) भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः     -                   .........................................   

(च) पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः     -                   .........................................  

उत्तरम् :

             कर्तृवाच्यम्                                         कर्मवाच्यम् 

यथा: भवत्या प्रतिश्रुतम्                -                     भवती प्रतिश्रुतवती।  

(क) क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्             -                     क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती।  

(ख) भवत्या सज्जीक्रियताम्           -                     भवती सज्जीकरोतु।  

(ग) भवत्या उपक्षिप्तम्                 -                     भवती उपक्षिप्तवती।  

(घ) त्वया सङ्कल्पितम्                   -                     त्वं सङ्कल्पितवान् / सङ्कल्पितवती।  

(ङ) भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः     -                     भवान् धर्मसङ्ग्रहं पश्यतु।  

(च) पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः     -                     पौरजनाः मानुषं प्रेषयेयुः।  

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