भूमिका (Introduction)
संस्कृत-मूलपाठः
संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति। उपनिषत्सु अनेके ज्ञानप्रदाः संवादाः सन्ति। तैत्तिरीयोपनिषदि समग्रजीवनविकासाय पञ्चकोषाणां महत्त्वं पितापुत्रसंवादरूपेण वर्णितम्। तादृशज्ञानप्रदसंवादानाम् अध्ययनेन बोधनेन च वयम् आत्मविकासं कर्तुं शक्नुमः। अस्मिन् पाठे वयं पितापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं पठिष्यामः।
हिन्दी-अनुवाद:
संस्कृत साहित्य में उपनिषद्-साहित्य का विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण स्थान है। उपनिषदों में अनेक ज्ञानवर्धक संवाद हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में समग्र जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए पाँच कोशों के महत्त्व को पिता-पुत्र के संवाद के रूप में वर्णित किया गया है। ऐसे ज्ञानवर्धक संवादों के अध्ययन और अवबोध से हम अपना आत्म-विकास कर सकते हैं। इस पाठ में हम पिता और पुत्र (वरुण और भृगु) के संवाद को पढ़ेंगे।
English Translation:
Upanishadic literature holds a distinct and significant place in Sanskrit literature. There are many knowledge-imparting dialogues in the Upanishads. In the Taittiriya Upanishad, the importance of the five sheaths (Pancha Koshas) for the holistic development of life is described through a dialogue between a father and a son. Through the study and comprehension of such insightful dialogues, we can achieve self-development. In this lesson, we will read the dialogue between the father and son, Varuna and Bhrigu.
प्रथमः संवादः
अन्नम् / अन्नमयकोषः (Food / Annamaya Kosha):
संस्कृत-मूलपाठः:
(एकदा ब्रह्मज्ञानाय तत्परः वरुणस्य पुत्रः भृगुः सविनयं पितरं प्रति गत्वा निवेदयति)
भृगुः – अयि भोः पितः ! अभिवादयेऽहं सादरम्। भगवन् ! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते ? कृपया उपदिशतु।
वरुणः – पुत्र ! शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्। तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।
भृगुः – अस्तु तात !
(ततो भृगुः अनेकवर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पुनः पितरं निकषा गच्छति। पिता तं पृच्छति –)
वरुणः – अयि पुत्र ! त्वया किं ज्ञातम् ?
भृगुः – भोः पितः ! अन्नं वै ब्रह्म इति।
वरुणः – कथम् अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातम् ?
भृगुः – हे पितः ! अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति। अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते। अतोऽन्नं ब्रह्म इति। उच्यते हि –
आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः ॥
वरुणः – पुत्र ! त्वया सम्यग् अवबुद्धम्। अत उच्यते – अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् (अन्नं) सर्वोषधम् इति उच्यते। अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्। कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत। सर्वदा सात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवताम्। परं च हे वत्स ! ब्रह्म ज्ञातुम् इतोऽपि यतताम्। तपः कुरुताम्।
भृगुः – अस्तु तात !
हिन्दी-अनुवाद:
(एक बार ब्रह्मज्ञान के लिए उत्सुक वरुण का पुत्र भृगु विनयपूर्वक पिता के पास जाकर निवेदन करता है)
भृगु: हे पिता जी! मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ। हे भगवन्! ब्रह्म के विषय में मेरे मन में एक जिज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है जिसके द्वारा यह सारा संसार संचालित होता है? कृपया उपदेश दीजिए।
वरुण: हे पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। ब्रह्मज्ञान के लिए तुम्हें स्वयं ही खोज करनी चाहिए। प्रयत्न और अभ्यास करो। तपस्या करो, क्योंकि तप से ही वह जाना जाता है।
भृगु: ठीक है, पिता जी!
(इसके बाद भृगु अनेक वर्षों तक तपस्या करता है। तपस्या करने के पश्चात् वह पुनः पिता के समीप जाता है। पिता उससे पूछते हैं –)
वरुण: हे पुत्र! तुमने क्या जाना?
भृगु: हे पिता जी! अन्न ही ब्रह्म है।
वरुण: अन्न को ब्रह्म के रूप में कैसे जाना?
भृगु: हे पिता जी! अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न से ही सभी प्राणी जीते हैं। अन्न से ही शरीर और बल बढ़ते हैं। इसलिए अन्न ही ब्रह्म है। कहा भी गया है –
"हे राजन्! अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही बढ़ते हैं और उसी से सभी जीव जीवित रहते हैं।"
वरुण: पुत्र! तुमने भली-भाँति समझा है। इसीलिए कहा जाता है – 'अन्न ही प्राणियों में ज्येष्ठ (सर्वप्रथम) है'। इसीलिए अन्न को 'सर्वौषध' (सभी रोगों की अचूक औषधि) कहा जाता है। अतः कभी भी अन्न की निंदा नहीं करनी चाहिए। अन्न का सेवन सदा ईश्वर की बुद्धि से (प्रसाद मानकर) करना चाहिए। अन्न का कभी तिरस्कार या बर्बादी नहीं करनी चाहिए। प्रयत्नपूर्वक अन्न का प्रचुर उत्पादन करना चाहिए। सदा सात्त्विक और हितकारी भोजन ग्रहण करना चाहिए। परंतु हे वत्स! ब्रह्म को जानने के लिए इससे आगे भी प्रयास करो। तपस्या करो।
भृगु: ठीक है, पिता जी!
English Translation:
(Once, eager to attain knowledge of Brahman, Varuna's son Bhrigu humbly approaches his father and submits)
Bhrigu: O Father! I salute you respectfully. Respected Sir, I have a curiosity regarding Brahman. What is that Brahman by which this entire universe is governed? Please instruct me.
Varuna: Son! May you be blessed. You must search for the knowledge of Brahman yourself. Make effort and practice. Perform penance (Tapas), for it is known through penance alone.
Bhrigu: As you say, Father!
(Then Bhrigu practices penance for many years. After austerities, he returns to his father. The father asks him –)
Varuna: O son! What have you discovered?
Bhrigu: O Father! Food (Annam) indeed is Brahman.
Varuna: How did you realize that food is Brahman?
Bhrigu: O Father! From food alone all creatures are born. By food alone creatures live. By food alone the body and physical strength grow. Therefore, food is Brahman. Indeed, it is said:
"O King! All living beings originate from food; they grow through food, and through food alone all creatures live."
Varuna: Son! You have understood correctly. Hence it is said – 'Food is the eldest (foremost) among beings'. Therefore, it is called the universal medicine (Sarvaushadham). Hence, one should never insult food. Food should always be taken regarding it as divine. Food must never be discarded. One should produce food in abundance through effort. Always consume wholesome and pure (Sattvic) diet. Yet, dear child, strive further to realize Brahman. Perform penance.
Bhrigu: So be it, Father!
प्राणः / प्राणमयकोषः (Life-Breath / Pranamaya Kosha)
संस्कृत-मूलपाठः:
(पुनः भृगुः पर्वतं गत्वा बहूनि वर्षाणि तप आचरति। तपस्तप्त्वा पितुः समीपं गच्छति। आगतं पुत्रं दृष्ट्वा पिता पृच्छति)
वरुणः – हे पुत्र ! तपसा त्वया किं ज्ञातम् ?
भृगुः – हे पितः ! प्राणो वै ब्रह्म इति।
वरुणः – हे भृगो ! कथं प्राणो ब्रह्म इति ज्ञातम् ?
भृगुः – हे भगवन् ! प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। प्राण एव अस्माकं जीवनम्। प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। अतः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। तस्मात् प्राणो वै ब्रह्म इति विज्ञातम्।
वरुणः – पुत्र ! त्वया सत्यम् उदीरितम्। प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणशक्त्या एव शारीरिकक्रियाशक्तेर्विकासो भवति। अत एव प्राणः सर्वथा रक्षणीयः। तस्मात् प्राणविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। उक्तं हि –
यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत् ॥
पुत्र ! भवान् तपसा प्राणतत्त्वस्य महत्त्वं ज्ञातवान्। किन्तु ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि कठोरं तपः कुरुताम्।
भृगुः – अस्तु पितः !
हिन्दी-अनुवाद:
(पुनः भृगु पर्वत पर जाकर बहुत वर्षों तक तपस्या करता है। तपस्या करके पिता के पास आता है। आए हुए पुत्र को देखकर पिता पूछते हैं)
वरुण: हे पुत्र! तपस्या से तुमने क्या जाना?
भृगु: हे पिता जी! प्राण ही ब्रह्म है।
वरुण: हे भृगु! तुमने प्राण को ब्रह्म कैसे जाना?
भृगु: हे भगवन्! प्राण ही प्राणियों की आयु (जीवन-अवधि) है। प्राण में ही शरीर टिका हुआ है। प्राण ही हमारा जीवन है। प्राण के बिना शरीर निश्चेष्ट (निष्क्रिय) हो जाता है। अतः प्राण सबसे बड़ा और सबसे श्रेष्ठ है। इसलिए मैंने जाना कि प्राण ही ब्रह्म है।
वरुण: पुत्र! तुमने सत्य कहा। प्राण से ही ये सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं। जन्म लेकर प्राण से ही जीवित रहते हैं। प्राण-शक्ति से ही शरीर की कार्य-शक्ति का विकास होता है। इसलिए प्राण की सब प्रकार से रक्षा की जानी चाहिए। अतः प्राण के विकास हेतु प्रतिदिन प्राणायाम करना चाहिए। कहा भी गया है –
"जब तक देह में वायु (प्राण) स्थित रहता है, तब तक ही जीवन कहलाता है। उस प्राण का निकल जाना ही मृत्यु है, इसलिए प्राण-वायु का नियमन (प्राणायाम) करना चाहिए।"
पुत्र! आपने तपस्या से प्राणतत्त्व के महत्त्व को जान लिया। किन्तु ब्रह्म के ज्ञान के लिए इससे भी कठोर तपस्या करो।
भृगु: ठीक है, पिता जी!
English Translation:
(Again, Bhrigu goes to the mountains and practices penance for many years. After austerities, he approaches his father. Seeing the arrived son, the father asks)
Varuna: O son! What have you realized through penance?
Bhrigu: O Father! Life-breath (Prana) indeed is Brahman.
Varuna: O Bhrigu! How did you realize that Prana is Brahman?
Bhrigu: O Lord! Prana is indeed the lifespan of beings. The body is established in Prana. Prana alone is our life. Without Prana, the body becomes void of action. Therefore, Prana is the eldest and the foremost. Hence, I realized that Prana indeed is Brahman.
Varuna: Son! You have spoken the truth. From Prana alone do all these beings arise. Born, they live by Prana. Through the vital energy of Prana alone does physical work-capacity develop. Therefore, Prana must be safeguarded in every way. Hence, for the development of Prana, one must practice Pranayama daily. Indeed, it is said:
"As long as the vital air resides in the body, it is called life. Its departure is death; therefore, one should regulate the breath."
Son! Through penance, you have comprehended the importance of the Prana principle. However, engage in even more rigorous penance for the realization of Brahman.
Bhrigu: Very well, Father!
तृतीयः संवादः
मनः / मनोमयकोषः (Mind / Manomaya Kosha)
(सः पुनः बहुकालं यावद् वनं गत्वा तपश्चर्यां कुरुते। तपस्तप्त्वा प्रसन्नवदनो वरुणं निकषा प्राप्नोति, वरुणः भृगुं पृच्छति –)
वरुणः – हे पुत्र ! त्वया तपसा किं ज्ञातम् ?
भृगुः – हे तात ! मया तपसा मनो वै ब्रह्म इति ज्ञातम्।
वरुणः – पुत्र ! कथं मनो वै ब्रह्म इति ?
भृगुः – हे पितः ! मया तपसा एवम् अनुभूतं यद् अस्माकं मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते। मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति। मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। अतो मनो वै ब्रह्म इति।
वरुणः – हे वत्स ! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सर्वमिति। अत उपनिषदि उच्यते –
कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा
धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव।
वत्स ! मानवः चिन्तनशक्त्या मननशक्त्या दृढसङ्कल्पशक्त्या च सर्वं लब्धुं शक्नोति। अतो मनसः शक्तिप्राप्तये मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। शोकादिरहितम् उत्साहयुक्तं शान्तं च करणीयम्। आहारशुद्धिश्च करणीया। किञ्च हे पुत्र ! ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि प्रयतस्व।
भृगुः – अस्तु श्रीमन् !
हिन्दी-अनुवाद:
(वह पुनः लंबे समय तक वन में जाकर तपस्या करता है। तपस्या करके प्रसन्न मुख से वरुण के पास पहुँचता है, वरुण भृगु से पूछते हैं –)
वरुण: हे पुत्र! तुमने तपस्या से क्या जाना?
भृगु: हे पिता जी! मैंने तपस्या से जाना कि मन ही ब्रह्म है।
वरुण: पुत्र! मन ब्रह्म कैसे है?
भृगु: हे पिता जी! मैंने तपस्या से ऐसा अनुभव किया कि हमारा मन ही सभी कार्यों का प्रेरक (प्रवर्तक) है। समस्त इन्द्रियाँ भी मन के द्वारा ही संचालित होती हैं। मनुष्य मन से ही सभी कार्य संपन्न करता है। मन से ही संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। इसलिए मन ही ब्रह्म है।
वरुण: हे वत्स! तुमने भली-भाँति अनुभव किया कि मन ही सब कुछ है। इसीलिए उपनिषद् में कहा गया है –
"इच्छा (कामना), संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधीरता, लज्जा, बुद्धि और भय – यह सब मन ही है।"
वत्स! मनुष्य चिंतन-शक्ति, मनन-शक्ति और दृढ संकल्प-शक्ति से सब कुछ प्राप्त कर सकता है। अतः मन की शक्ति प्राप्त करने के लिए मन को सदा सत्कर्मों से संस्कारित करना चाहिए। इसे शोक आदि से रहित, उत्साह से युक्त और शांत बनाना चाहिए। और आहार की शुद्धि भी करनी चाहिए। फिर भी हे पुत्र! ब्रह्मज्ञान के लिए इससे आगे भी प्रयत्न करो।
भृगु: जो आज्ञा, मान्यवर!
English Translation:
(He again goes to the forest and engages in austerities for a long time. Having done penance, he approaches Varuna with a joyful countenance; Varuna asks Bhrigu –)
Varuna: O son! What have you realized through penance?
Bhrigu: O Father! Through penance, I have recognized that Mind (Manas) indeed is Brahman.
Varuna: Son! How is Mind Brahman?
Bhrigu: O Father! I realized through penance that our mind alone is the instigator of all actions. All sense organs are also governed by the mind. Man performs every task solely through the mind. Resolutions, feelings, and thoughts arise from the mind. Therefore, Mind is Brahman.
Varuna: O child! You have rightly realized that Mind is everything. Hence it is stated in the Upanishads:
"Desire, resolve, doubt, faith, lack of faith, steadfastness, fickleness, modesty, intellect, and fear—all these are indeed the mind."
Child! Through the power of thinking, contemplation, and firm determination, man can achieve everything. Therefore, to acquire mental power, the mind must always be cultured through noble actions. It must be kept free from grief, filled with enthusiasm, and peaceful. Purity of food must also be maintained. Yet, dear son, make further efforts to realize Brahman.
Bhrigu: Very well, Sir!
चतुर्थः संवादः
विज्ञानम् / विज्ञानमयकोषः (Intellect / Vijnanamaya Kosha)
संस्कृत-मूलपाठः:
(पुनः भृगुः बहुकालं यावत् कठोरं तपः कुरुते, तपः कृत्वा पितुः समीपं प्राप्नोति, पिता तं पृच्छति)
वरुणः – हे भृगो ! तपसा किम् अनुभूतम् ?
भृगुः – हे पितः ! मया तपसा सूक्ष्मज्ञानेन च इदं ज्ञातं यद् विज्ञानं वै ब्रह्म इति।
वरुणः – पुत्र ! किं नाम विज्ञानम् ?
भृगुः – हे भगवन् ! बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्।
वरुणः – पुत्र ! कथं विज्ञानं (बुद्धितत्त्वम्) ब्रह्म इति विज्ञातम् ?
भृगुः – हे पितः ! बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवति। बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। समग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते। अत एव विज्ञानं वै ब्रह्म इति।
वरुणः – पुत्र ! सत्यं भाषसे। अतः बौद्धिकविकासाय विज्ञानमयकोषस्य विकासः कर्तव्यः। तदर्थं प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। किञ्च यदि ब्रह्मणः स्वरूपं वेत्तुम् इच्छसि तर्हि इतोऽपि प्रयतताम्, अन्विष्यतां च।
भृगुः – अस्तु श्रीमन् !
हिन्दी-अनुवाद:
(पुनः भृगु बहुत समय तक कठोर तपस्या करता है। तप करके पिता के पास पहुँचता है, पिता उससे पूछते हैं)
वरुण: हे भृगु! तपस्या से क्या अनुभव किया?
भृगु: हे पिता जी! मैंने तपस्या और सूक्ष्म ज्ञान से यह जाना कि विज्ञान (बुद्धि) ही ब्रह्म है।
वरुण: पुत्र! विज्ञान का क्या अर्थ है?
भृगु: हे भगवन्! बुद्धि-तत्त्व ही विज्ञान है।
वरुण: पुत्र! बुद्धि-तत्त्व (विज्ञान) ब्रह्म कैसे है, यह कैसे जाना?
भृगु: हे पिता जी! बुद्धि-तत्त्व के बिना हमारी समझ (बोध-शक्ति), तर्क-शक्ति, विवेक-शक्ति, निर्णय-शक्ति और
स्मरण-शक्ति का विकास नहीं होता। बुद्धि ही सारथि बनकर हमें कर्म में प्रवृत्त करती है। सारा ज्ञान बुद्धि में ही
विद्यमान रहता है। इसलिए विज्ञान ही ब्रह्म है।
वरुण: पुत्र! तुम सत्य कहते हो। अतः बौद्धिक विकास के लिए विज्ञानमय कोष का विकास करना चाहिए। उसके लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए। फिर भी यदि तुम ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते हो, तो इससे आगे भी प्रयास करो और खोजो।
भृगु: जो आज्ञा, पूज्यवर!
English Translation:
(Again, Bhrigu performs severe austerities for a long duration. Having done so, he returns to his father; the father asks him)
Varuna: O Bhrigu! What have you experienced through penance?
Bhrigu: O Father! Through penance and subtle wisdom, I have known that Intellect/Wisdom (Vijnana)
indeed is Brahman.
Varuna: Son! What is meant by Vijnana?
Bhrigu: O Lord! The element of intellect (Buddhi) itself is Vijnana.
Varuna: Son! How did you realize that Intellect (Vijnana) is Brahman?
Bhrigu: O Father! Without the intellect, our powers of comprehension, logic, discrimination, decision-
making, and memory cannot develop. The intellect alone, like a charioteer, guides us into action. All knowledge resides in the intellect alone. Therefore, Intellect/Wisdom is Brahman.
Varuna: Son! You speak the truth. Therefore, for intellectual growth, the development of the Vijnanamaya Kosha (wisdom sheath) is essential. For that purpose, meditation and Yogasanas should be practiced daily. However, if you wish to realize the ultimate nature of Brahman, strive and investigate even further.
Bhrigu: Very well, Sir!
पञ्चमः संवादः
आनन्दः / आनन्दमयकोषः (Bliss / Anandamaya Kosha) & उपसंहारः
संस्कृत-मूलपाठः:
(भृगुः पुनः बहुकालं यावत् तपश्चर्यां करोति। तपस्तप्त्वा प्रसन्नमुखेन पितुः निकटे समुपस्थितो भवति।)
वरुणः – भोः वत्स ! तपसा त्वया किं विज्ञातम् ?
भृगुः – हे भगवन् ! अत्यन्तं सूक्ष्मचिन्तनेन तपसा च मया एवम् अवबुद्धम् – आनन्दो वै ब्रह्म इति।
वरुणः – हे पुत्र ! कथम् आनन्दो वै ब्रह्म इति ?
भृगुः – हे पितः ! अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय भवन्ति। अस्माकं कर्मणो लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिरेव। आनन्देन एव प्राणिनो जीवन्ति। आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपमिति। तस्मात् आनन्दो वै ब्रह्म इति।
वरुणः – हे वत्स ! त्वया सत्यं प्रकटितम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। परोपकारः कर्तव्यः। रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।
भृगुः – अस्तु श्रीमन् ! तथैव आचरामि।
वरुणः – हे पुत्र ! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिरेव अस्माकं पूर्णविकासो भवति, अतः एते ब्रह्मपदेन व्यवह्रियन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति। यदि एतेषां क्रमशो विकासं करिष्यसि तर्हि ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भविष्यति। उक्तञ्च –
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति ॥
भृगुः – अस्तु श्रीमन् ! अनुगृहीतोऽस्मि।
हिन्दी-अनुवाद:
(भृगु पुनः बहुत समय तक तपस्या करता है। तपस्या करके प्रसन्न मुख से पिता के पास उपस्थित होता है।)
वरुण: हे वत्स! तपस्या से तुमने क्या जाना?
भृगु: हे भगवन्! अत्यंत सूक्ष्म चिंतन और तपस्या से मैंने यह जाना कि आनंद ही ब्रह्म है।
वरुण: हे पुत्र! आनंद ब्रह्म कैसे है?
भृगु: हे पिता जी! हमारे सभी कार्य आनंद के लिए ही होते हैं। हमारे कर्मों का लक्ष्य आनंद की प्राप्ति ही है। आनंद से ही प्राणी जीते हैं। आनंद से रहित जीवन मृत्यु के समान है। इसलिए आनंद ही ब्रह्म है।
वरुण: हे वत्स! तुमने सत्य प्रकट किया है। अतः आनंद की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए। प्राणियों पर दया करनी चाहिए। परोपकार करना चाहिए। आसक्ति (राग), द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मोह का त्याग कर देना चाहिए। सदा ईश्वर की सेवा करनी चाहिए और प्रसन्न रहना चाहिए।
भृगु: जैसा आप कहें, पूज्यवर! मैं वैसा ही आचरण करूँगा।
वरुण: हे पुत्र! तुमने तपस्या और सूक्ष्म ज्ञान से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद के महत्त्व को जान लिया है। इन पाँचों से ही हमारा सर्वांगीण (पूर्ण) विकास होता है, इसलिए इन्हें 'ब्रह्म' शब्द से भी अभिहित किया जाता है। ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप तो इन सबसे भी परे है। ये पाँचों ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के द्वार हैं। यदि तुम इनका क्रमशः विकास करोगे, तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध (साक्षात्कार) होगा। कहा भी गया है –
"आहार की शुद्धि होने से अंतःकरण की शुद्धि होती है; अंतःकरण के शुद्ध होने पर स्मृति (आत्म-स्मृति) स्थिर होती है; और स्थिर स्मृति प्राप्त होने पर हृदय की सभी गाँठों (बंधनों/संशयों) से मुक्ति मिल जाती है।"
भृगु: ठीक है, पूज्यवर! मैं कृतार्थ (अनुगृहीत) हुआ।
English Translation:
(Bhrigu again engages in penance for a prolonged time. Having completed his penance, he appears before his father with a blissful countenance.)
Varuna: O child! What have you recognized through penance?
Bhrigu: O Lord! Through deeply subtle contemplation and penance, I have understood that Bliss (Ananda) indeed is Brahman.
Varuna: O son! How is Bliss Brahman?
Bhrigu: O Father! All our actions are done for the sake of bliss. The sole purpose of our action is the attainment of bliss. Living beings live by bliss alone. A life devoid of bliss is equivalent to death.
Therefore, Bliss indeed is Brahman.
Varuna: O child! You have revealed the truth. Therefore, to attain bliss, one must practice meditation and Yogasanas daily. One must show compassion toward all creatures. One should engage in selfless service. Attachment, hatred, jealousy, anger, greed, and delusion must be abandoned. Always serve the Divine and remain cheerful.
Bhrigu: Very well, Sir! I shall act accordingly.
Varuna: O son! Through penance and subtle intellect, you have understood the significance of Food, Life-breath, Mind, Intellect, and Bliss. Through these five alone our total development occurs; therefore, they are addressed by the word 'Brahman'. But the ultimate reality of Brahman transcends even these. These five are the gateways to the knowledge of Brahman. If you cultivate these systematically, you will attain realization of Brahman. And it is said:
"When food is pure, the inner consciousness is purified; when consciousness is pure, memory of the Self becomes steady; and on gaining steady memory, there is complete liberation from all the knots of ignorance."
Bhrigu: So be it, revered Sir! I am blessed and grateful.
अत्र इदम् अवधेयम् (विशेष ध्यातव्य अंश / Points to Note)
संस्कृत-मूलपाठः:
मानवः क्रमशः शरीरेण, प्राणेन, मनसा, बुद्ध्या, अध्यात्मशक्त्या च पूर्णविकासं लभते। अतः समग्रजीवनविकासाय (१) अन्नमयकोषः, (२) प्राणमयकोषः, (३) मनोमयकोषः, (४) विज्ञानमयकोषः, (५) आनन्दमयकोष इति पञ्चकोषाः शास्त्रेषु वर्णिताः। एतेषामेव महत्त्वम् अस्मिन् पाठ्यक्रमे वर्णितम्। मानवः पञ्चकोषविवेकतः समग्रं विकासं प्राप्नोति। एतेषां पञ्चकोषाणां परस्परं सम्बन्धः अस्ति। अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति। अन्नमयकोषस्य प्राणमयकोषस्य च विकासं विना मनोमयकोषस्य विकासो न भवति। एवं क्रमेण क्रमिकविकासाय तावद् आदौ अन्नमयकोषस्य विकासाय यत्नः कर्तव्यः। ततः प्राणमयकोषस्य, मनोमयकोषस्य, विज्ञानमयकोषस्य आनन्दमयकोषस्य च विकासः कर्तव्यः। अनया क्रमिक-विकासपद्धत्या एव मानवः पूर्णतां प्राप्नोति।
हिन्दी-अनुवाद:
मनुष्य क्रमशः शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा पूर्ण विकास को प्राप्त करता है। इसलिए समग्र जीवन के विकास के लिए शास्त्रों में पाँच कोशों का वर्णन किया गया है: (१) अन्नमय कोष, (२) प्राणमय कोष, (३) मनोमय कोष, (४) विज्ञानमय कोष, (५) आनंदमय कोष। इन्हीं का महत्त्व इस पाठ में बताया गया है। मनुष्य पंचकोशों के विवेकपूर्ण ज्ञान से सर्वांगीण विकास प्राप्त करता है। इन पाँचों कोशों का परस्पर गहरा संबंध है। अन्नमय कोष के विकास के बिना प्राणमय कोष का विकास नहीं हो सकता। अन्नमय और प्राणमय दोनों कोशों के विकास के बिना मनोमय कोष का विकास नहीं हो सकता। इस प्रकार क्रमिक विकास के लिए सबसे पहले अन्नमय कोष के विकास का यत्न करना चाहिए। उसके बाद प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष का विकास करना चाहिए। इसी क्रमिक विकास पद्धति से मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करता है।
English Translation:
A human being attains complete development progressively through the body, life-breath, mind, intellect, and spiritual power. Therefore, for the holistic development of life, five sheaths are described in the scriptures: (1) Annamaya Kosha, (2) Pranamaya Kosha, (3) Manomaya Kosha, (4) Vijnanamaya Kosha, and (5) Anandamaya Kosha. Their importance is presented in this lesson. A human attains complete growth through the discriminatory understanding of these five sheaths. These five sheaths are interdependent. Without developing the Annamaya Kosha, the Pranamaya Kosha cannot develop. Without the development of both the Annamaya and Pranamaya sheaths, the Manomaya Kosha cannot develop. Thus, for gradual evolution, one must first strive to cultivate the Annamaya Kosha, and subsequently develop the Pranamaya, Manomaya, Vijnanamaya, and Anandamaya sheaths. Through this progressive development alone does a human attain perfection.
Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 8 Solution
भाग २: अभ्यास-प्रश्नान्तराणि (Questions & Answers)
१. एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत (एक पद में रिक्त स्थान भरिए)-
उदाहरणम् – अन्नेन शरीरं वर्धते।
(क) अन्नेन शरीरं वर्धते।
(ख) ...................शरीरं प्रतिष्ठितम्।
(ग) ...................विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
(घ) ..............................(अथवा अन्नाद्) एव इमानि भूतानि जायन्ते।
(ङ) .......................समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
(च) ................विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
(छ) .....................एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
उत्तरम्:
(क) अन्नेन शरीरं वर्धते।
(ख) प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।
(ग) प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
(घ) प्राणाद् (अथवा अन्नाद्) एव इमानि भूतानि जायन्ते।
(ङ) मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
(च) बुद्धितत्त्वं विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
(छ) मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
२. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर लिखिए)-
(क) भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत् ?
उत्तरम्: भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्।
(ख) भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम् ?
उत्तरम्: भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय तपः आचरितम्।
(ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान् ?
उत्तरम्: भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण अन्नं ज्ञातवान्।
(घ) मनसः के जायन्ते ?
उत्तरम्: मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।
(ङ) प्राणिनः कस्मात् जायन्ते ?
उत्तरम्: प्राणिनः अन्नाद् (अथवा प्राणात्) जायन्ते।
(च) इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते ?
उत्तरम्: इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।
(छ) शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति ?
उत्तरम्: शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।
(ज) केन विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति ?
उत्तरम्: बुद्धितत्त्वेन (विज्ञानेन) विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति।
(झ) भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान् ?
उत्तरम्: भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्।
३. उदाहरणं दृष्ट्वा अधोलिखितेषु 'किं सत्यं किम् असत्यम्' इति रिक्तस्थाने पूरयत (सत्य/असत्य लिखिए)-
उदाहरणम् – प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति – सत्यम्
(क) प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति – सत्यम्
(ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम् – ....................
(ग) प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति – ....................
(घ) अन्नेन शरीरं वर्धते इति – ....................
(ङ) मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति – ...................
(च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति – ....................
(छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् – ....................
(ज) विना योगे तृतीया विभक्तिर्भवति – ....................
उत्तरम्:
(क) प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति – सत्यम्
(ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम् – सत्यम्
(ग) प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति – असत्यम्
(घ) अन्नेन शरीरं वर्धते इति – सत्यम्
(ङ) मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति – असत्यम् (बुद्धिः प्रवर्तयति)
(च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति – सत्यम्
(छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् – सत्यम्
(ज) विना योगे तृतीया विभक्तिर्भवति – सत्यम्
४. क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत (क्रियापद के साथ उपयुक्त पद मिलाइए)-
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(क) प्राणिनः
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१. क्रियताम्
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(ख) शरीरम्
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२. कुरुतम्
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(ग) तपः
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३. जायन्ते
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(घ) पितरं
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४. वर्धते
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(ङ) यत्नः
|
५. ब्रूते
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उत्तरम् :
(क) प्राणिनः | ३. जायन्ते |
(ख) शरीरम् | ४. वर्धते |
(ग) तपः | २. कुरुतम् |
(घ) पितरं | ५. ब्रूते |
(ङ) यत्नः | १. क्रियताम् |
५. अवशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत (शेष धातुरूप पूरे कीजिए)-
एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
वर्तते वर्तेते वर्तन्ते
............... ............... .................
............... ............... .................
उत्तरम्:
एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
वर्तते वर्तेते वर्तन्ते
वर्तसे वर्तेथे वर्त्तध्वम्
वर्ते वर्तावहे वर्तामहे
७. आत्मनेपदिधातूनां लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुतः -
एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
१. मोदताम् .................... ....................
.................... .................... .....................
.................... .................... .....................
२. वर्धताम् ...................... ......................
उत्तरम्:
एकवचनम् द्विवचनम् बहुवचनम्
१. मोदताम् मोदेताम् मोदन्ताम्
मोदस्व मोदेथाम् मोदध्वम्
मोदै मोदावहै मोदमहै
२. वर्धताम् वर्धताम् वर्धन्ताम्
वर्धस्व वर्धेथाम वर्धध्वम्
वर्धै वर्धावहै वर्धामहै
८. कर्तृपदानुसारं लोट्-लकारेण क्रियापदं परिवर्तयत-
लट्-लकारः लोट्-लकारः
उदाहरणम् – सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते। भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
उत्तरम्:
(क) बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते। | भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्। |
(ख) मम जीवने यशो वर्धते। | तव जीवने यशो वर्धताम्। |
(ग) अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे। | त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व। |
(घ) रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते। | दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्। |
(ङ) छात्रः लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहते। | अहं लक्ष्यसिद्धये कष्टं सहै। |
(च) साधवः सर्वदा रमन्ते। | भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्। |
(छ) भवान् योगेन आरोग्यं लभते। | लता योगेन आरोग्यं लभताम्। (अथवा: अहं योगेन आरोग्यं लभै।) |
(ज) रमा सदा सत्कर्मणि यतते। | लता सदा सत्कर्मणि यतस्व। |
(झ) भक्तः ईश्वरं वन्दते। | त्वं ईश्वरं वन्दताम्। |
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