Class 7 Sanskrit Chapter 2 Hindi Translation नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् | NCERT Hindi Translation for Class 7 Sanskrit Deepakam दीपकम् Summary
Sanskrit Class 7 Chapter 2 Hindi Translation नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् Summary
नित्यं पिबामः सुभाषितरसम् Meaning in Hindi
पाठ का परिचय (Introduction of the Lesson)
"नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्"
संस्कृत भाषा में सुभाषितों का विशेष महत्व है। ‘सुभाषित’ शब्द ‘सु’ उपसर्ग और ‘भाष्’ धातु से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है— सुंदर एवं उत्तम वचन। संस्कृत में अनेक सुभाषित उपलब्ध हैं, जो हमें नैतिकता, सदाचार, सत्कर्म और ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं। ये हमारे विचारों, व्यवहार और आचरण को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं। पाठ में दिए गए सुभाषितों के माध्यम से हम जीवन जीने की सही राह सीखते हैं और उचित निर्णय लेने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
Class 7 Sanskrit Chapter 2 Summary Notes नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्
सुशीला – महोदय! अस्माकं विद्यालयस्य भित्तौ ‘ अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ इति लिखितम् अस्ति। अस्य कः भावः इति कृपया बोधयतु ।
अध्यापकः – भोः सुशीले अस्य भावार्थः अस्ति यत् अस्मिन् जगति कोऽपि अयोग्यः नास्ति । सर्वे योग्याः सन्ति परन्तु प्रेरकस्य मार्गदर्शकस्य च अभावः अस्ति ।
रमा – मान्यवर! अहम् अपि विद्यालयस्य परिसरे एतादृशं श्लोकं पठितवती।
अध्यापकः – रमे ! एतानि सुभाषितानि सन्ति । अस्माकं चिन्तनविकासाय एव एतानि सुभाषितानि विद्यालयस्य परिसरे स्थापितानि ।
एकः छात्रः – महोदय ! सुभाषितानि इत्यनेन कः अभिप्राय: ?
अध्यापकः – वत्स! मानवानां विविधमूल्यानां विकासाय श्रेष्ठजनैः उक्तानि सुवचनानि एव सुभाषितानि ।
सुरेशः – श्रीमन् ! सुभाषितानां पठनेन कः लाभः ?
अध्यापकः – प्रियसुरेश ! सुभाषितानां पठनेन अस्माकं नैतिक : सामाजिकः च विकासः भवति । अस्माभिः किं कर्तव्यं किञ्च न कर्तव्यम् इति सुभाषितानि बोधयन्ति ।
एका छात्रा – अहो, वयम् अपि सुभाषितानि पठितुम् इच्छामः । कृपया अस्मान् पाठयतु।
अध्यापकः – समीचीनम्, तर्हि वयं सुभाषितानां रसं पिबामः ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : भित्तौ – दीवार पर (On the wall), प्रेरकस्य – प्रेरित करने वाला (One who inspires), नैतिक :- सदाचार (Moral/ethical)।
सुशीला – महोदय! हमारे विद्यालय की दीवार पर ‘ कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं होता, पर उसे योग्य काम में जोड़ने वाले पुरुष ही दुर्लभ हैं’ यह लिखा हुआ है। इसका क्या भाव है, कृपा करके बताएँ ।
अध्यापक – हे सुशीला ! इसका भावार्थ है कि इस संसार में कोई भी अयोग्य नहीं है। सभी योग्य हैं किंतु प्रेरक और मार्गदर्शक का अभाव है।
रमा – मान्यवर! मैंने भी विद्यालय के परिसर में इसी प्रकार का एक श्लोक पढ़ा है।
अध्यापक – रमा! ये सब सुभाषित हैं। हम लोगों के चिन्तन के विकासार्थ ही ये सब सुभाषित विद्यालय के परिसर में स्थापित हैं।
एक छात्र – महोदय! ‘सुभाषित’ इससे क्या अभिप्राय है?
अध्यापक – वत्स! मानवों के विविध मूल्यों के विकास हेतु श्रेष्ठ जनों के द्वारा बोले गए सुंदर वचन ही सुभाषित हैं।
सुरेश – श्रीमान् ! सुभाषितों के पढ़ने से क्या लाभ?
अध्यापक – प्रिय सुरेश ! सुभाषितों के पढ़ने से हमारा नैतिक और सामाजिक विकास होता है। हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसको सुभाषित बताते हैं ।
एक छात्रा – अहा! हम लोग भी सुभाषितों को पढ़ना चाहते हैं। कृपया हमें पढ़ाइए।
अध्यापक – सुंदर, तब हम लोग सभी सुभाषितों के रस को पीते हैं।
पदच्छेदः – वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च वकारै: पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः ।
पाठ – शब्दार्थ एवं सरलार्थ
सुशीला – महोदय! अस्माकं विद्यालयस्य भित्तौ ‘ अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ इति लिखितम् अस्ति। अस्य कः भावः इति कृपया बोधयतु ।
अध्यापकः – भोः सुशीले अस्य भावार्थः अस्ति यत् अस्मिन् जगति कोऽपि अयोग्यः नास्ति । सर्वे योग्याः सन्ति परन्तु प्रेरकस्य मार्गदर्शकस्य च अभावः अस्ति ।
रमा – मान्यवर! अहम् अपि विद्यालयस्य परिसरे एतादृशं श्लोकं पठितवती।
अध्यापकः – रमे ! एतानि सुभाषितानि सन्ति । अस्माकं चिन्तनविकासाय एव एतानि सुभाषितानि विद्यालयस्य परिसरे स्थापितानि ।
एकः छात्रः – महोदय ! सुभाषितानि इत्यनेन कः अभिप्राय: ?
अध्यापकः – वत्स! मानवानां विविधमूल्यानां विकासाय श्रेष्ठजनैः उक्तानि सुवचनानि एव सुभाषितानि ।
सुरेशः – श्रीमन् ! सुभाषितानां पठनेन कः लाभः ?
अध्यापकः – प्रियसुरेश ! सुभाषितानां पठनेन अस्माकं नैतिक : सामाजिकः च विकासः भवति । अस्माभिः किं कर्तव्यं किञ्च न कर्तव्यम् इति सुभाषितानि बोधयन्ति ।
एका छात्रा – अहो, वयम् अपि सुभाषितानि पठितुम् इच्छामः । कृपया अस्मान् पाठयतु।
अध्यापकः – समीचीनम्, तर्हि वयं सुभाषितानां रसं पिबामः ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : भित्तौ – दीवार पर (On the wall), प्रेरकस्य – प्रेरित करने वाला (One who inspires), नैतिक :- सदाचार (Moral/ethical)।
Read Also: NCERT Note
हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)-
सुशीला – महोदय! हमारे विद्यालय की दीवार पर ‘ कोई भी पुरुष अयोग्य नहीं होता, पर उसे योग्य काम में जोड़ने वाले पुरुष ही दुर्लभ हैं’ यह लिखा हुआ है। इसका क्या भाव है, कृपा करके बताएँ ।
अध्यापक – हे सुशीला ! इसका भावार्थ है कि इस संसार में कोई भी अयोग्य नहीं है। सभी योग्य हैं किंतु प्रेरक और मार्गदर्शक का अभाव है।
रमा – मान्यवर! मैंने भी विद्यालय के परिसर में इसी प्रकार का एक श्लोक पढ़ा है।
अध्यापक – रमा! ये सब सुभाषित हैं। हम लोगों के चिन्तन के विकासार्थ ही ये सब सुभाषित विद्यालय के परिसर में स्थापित हैं।
एक छात्र – महोदय! ‘सुभाषित’ इससे क्या अभिप्राय है?
अध्यापक – वत्स! मानवों के विविध मूल्यों के विकास हेतु श्रेष्ठ जनों के द्वारा बोले गए सुंदर वचन ही सुभाषित हैं।
सुरेश – श्रीमान् ! सुभाषितों के पढ़ने से क्या लाभ?
अध्यापक – प्रिय सुरेश ! सुभाषितों के पढ़ने से हमारा नैतिक और सामाजिक विकास होता है। हमारे द्वारा क्या किया जाना चाहिए और क्या नहीं किया जाना चाहिए, इसको सुभाषित बताते हैं ।
एक छात्रा – अहा! हम लोग भी सुभाषितों को पढ़ना चाहते हैं। कृपया हमें पढ़ाइए।
अध्यापक – सुंदर, तब हम लोग सभी सुभाषितों के रस को पीते हैं।
वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च ।
वकारैः पञ्चभिर्युक्तो नरो भवति पूजितः ॥ 1॥
पदच्छेदः – वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च वकारै: पञ्चभिः युक्तः नरः भवति पूजितः ।
अन्वयः – वस्त्रेण वपुषा वाचा विद्यया विनयेन च (इति एतैः) पञ्चभिः वकारै: युक्तः नरः पूजितः भवति।
भावार्थ: – यः जनः समुचितानि वस्त्राणि धरति शरीरेण स्वस्थः अस्ति, सदा सुमधुरं हितकरं च वचनं वदति, सर्वदा अध्ययने संलग्नः भवति, तथा च विनम्रतया च व्यवहरति तादृशः पञ्चभिः वकारै: – वस्त्रं वपुः वाक् विद्या विनयः – इत्येतैः युक्तः मनुष्यः लोके सम्मानं प्राप्नोति ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : वपुषा – शरीर से (By physique), सम्मानम् – आदर (Respect)।
हिंदी अर्थ- वस्त्र, शरीर, वाणी, विद्या और विनय, इन पाँच वकारों से युक्त व्यक्ति पूजनीय होता है।
सरलार्थ- जो व्यक्ति अच्छी पोशाक धारण करता है, शरीर से स्वस्थ है, हमेशा मधुर एवं हितकर वचन बोलता है, हमेशा अध्ययन में संलग्न रहता है और विनम्रतापूर्वक व्यवहार करता है, उस प्रकार पाँच वकारों (वस्त्र, वपु, वाणी, विद्या, विनय) से युक्त मनुष्य लोक में सम्मान प्राप्त करता है।
पदच्छेदः – षड् दोषाः पुरुषेण इह हातव्याः भूतिम् इच्छता निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : वपुषा – शरीर से (By physique), सम्मानम् – आदर (Respect)।
हिंदी अर्थ- वस्त्र, शरीर, वाणी, विद्या और विनय, इन पाँच वकारों से युक्त व्यक्ति पूजनीय होता है।
सरलार्थ- जो व्यक्ति अच्छी पोशाक धारण करता है, शरीर से स्वस्थ है, हमेशा मधुर एवं हितकर वचन बोलता है, हमेशा अध्ययन में संलग्न रहता है और विनम्रतापूर्वक व्यवहार करता है, उस प्रकार पाँच वकारों (वस्त्र, वपु, वाणी, विद्या, विनय) से युक्त मनुष्य लोक में सम्मान प्राप्त करता है।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ 2॥
पदच्छेदः – षड् दोषाः पुरुषेण इह हातव्याः भूतिम् इच्छता निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता ।
अन्वयः – इह भूतिम् इच्छता पुरुषेण निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता (च इत्येते) षड् दोषाः हातव्याः ।
भावार्थः – अस्मासु निद्रादयः षड् दोषाः भवन्ति । एते अस्माकम् ऐश्वर्यस्य उन्नतेश्च अवरोधकाः भवन्ति । अतः यदि मानवः जीवने धनिकः, विद्वान् वा भवितुम् इच्छति, ऐश्वर्यं वैभवं च प्राप्तुं वाञ्छति तर्हि सः अतिनिद्रां तन्द्रां भीतिं, क्रोधम्, आलस्यं, विलम्बेन कार्यकरणस्य प्रवृत्तिं च एतान् षड् दोषान् परित्यजेत्।
शब्दार्था (Word Meanings) : हातव्या – छोड़ने लायक (Worth discarding), भूतिम् – ऐश्वर्य (Prosperity), तन्द्रा – उंघाई (Somnolence), दीर्घसूत्रता – कार्य को टालने की प्रवृत्ति (Procrastination), अवरोधका :- रोकनेवाले (Barriers), वाञ्छति – चाहता/ती है (Wants/Desires )।
हिंदी अर्थ- उन्नति चाहने वाले पुरुष को ज्यादा नींद, तंद्रा, डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता, इन छह दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।
सरलार्थ- हम सभी में अति निद्रा, तंद्रा, डर, क्रोध, आलस्य तथा कार्य टालने की प्रवृत्ति जैसे – छह दोष होते हैं। ये सभी हमारे ऐश्वर्य और उन्नति के बाधक होते हैं। इसलिए यदि व्यक्ति जीवन में धनी या विद्वान होना चाहता है, ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त करना चाहता है, तो उसे उपर्युक्त इन छह दोषों को त्याग देना चाहिए।
पदच्छेदः – अद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति विद्या- तपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
अन्वयः – गात्राणि अद्भिः शुध्यन्ति । मनः सत्येन शुध्यति । भूतात्मा विद्यातपोभ्यां शुध्यति । बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
भावार्थ: – प्रतिदिनं स्नानेन मानवशरीरं स्वच्छं भवति । सत्येन मनः पवित्रं भवति । सत्यकथनेन मनसि द्वन्द्वः भीतिः च न भवति । नित्यं विद्याभ्यासेन परिश्रमेण च जीवस्य शुद्धिः भवति । ज्ञानेन च बुद्धिः निर्मला भवति । अतः मनुष्यः नित्यं स्नानं, सत्यकथनं, विद्याभ्यासं, परिश्रमं ज्ञानार्जनं च कुर्यात्।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : अद्भिः – जल से (By water), भूतात्मा – प्राणी (Soul), द्वन्द्वः – दुविधा (Dilemma)।
हिंदी अर्थ- जल से शरीर के अंग पवित्र होते हैं, मन सत्य से पवित्र होता है। विद्या और तप से प्राणी और बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है।
सरलार्थ- प्रतिदिन स्नान से मानव शरीर स्वच्छ होता है। सत्य से मन पवित्र होता है। सत्य कथन से मन में द्वन्द्व और भय नहीं होता है। नित्य विद्या के अभ्यास और परिश्रम से जीव की शुद्धि होती है। ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है। इसलिए मनुष्य को नित्य स्नान, सत्यकथन, विद्याभ्यास, परिश्रम और ज्ञान का अर्जन करना चाहिए।
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पदच्छेदः – उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः च एव दक्षिणं वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।
शब्दार्था (Word Meanings) : हातव्या – छोड़ने लायक (Worth discarding), भूतिम् – ऐश्वर्य (Prosperity), तन्द्रा – उंघाई (Somnolence), दीर्घसूत्रता – कार्य को टालने की प्रवृत्ति (Procrastination), अवरोधका :- रोकनेवाले (Barriers), वाञ्छति – चाहता/ती है (Wants/Desires )।
हिंदी अर्थ- उन्नति चाहने वाले पुरुष को ज्यादा नींद, तंद्रा, डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता, इन छह दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।
सरलार्थ- हम सभी में अति निद्रा, तंद्रा, डर, क्रोध, आलस्य तथा कार्य टालने की प्रवृत्ति जैसे – छह दोष होते हैं। ये सभी हमारे ऐश्वर्य और उन्नति के बाधक होते हैं। इसलिए यदि व्यक्ति जीवन में धनी या विद्वान होना चाहता है, ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त करना चाहता है, तो उसे उपर्युक्त इन छह दोषों को त्याग देना चाहिए।
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति ॥ 3॥
पदच्छेदः – अद्भिः गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति विद्या- तपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
अन्वयः – गात्राणि अद्भिः शुध्यन्ति । मनः सत्येन शुध्यति । भूतात्मा विद्यातपोभ्यां शुध्यति । बुद्धिः ज्ञानेन शुध्यति ।
भावार्थ: – प्रतिदिनं स्नानेन मानवशरीरं स्वच्छं भवति । सत्येन मनः पवित्रं भवति । सत्यकथनेन मनसि द्वन्द्वः भीतिः च न भवति । नित्यं विद्याभ्यासेन परिश्रमेण च जीवस्य शुद्धिः भवति । ज्ञानेन च बुद्धिः निर्मला भवति । अतः मनुष्यः नित्यं स्नानं, सत्यकथनं, विद्याभ्यासं, परिश्रमं ज्ञानार्जनं च कुर्यात्।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : अद्भिः – जल से (By water), भूतात्मा – प्राणी (Soul), द्वन्द्वः – दुविधा (Dilemma)।
हिंदी अर्थ- जल से शरीर के अंग पवित्र होते हैं, मन सत्य से पवित्र होता है। विद्या और तप से प्राणी और बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है।
सरलार्थ- प्रतिदिन स्नान से मानव शरीर स्वच्छ होता है। सत्य से मन पवित्र होता है। सत्य कथन से मन में द्वन्द्व और भय नहीं होता है। नित्य विद्या के अभ्यास और परिश्रम से जीव की शुद्धि होती है। ज्ञान से बुद्धि निर्मल होती है। इसलिए मनुष्य को नित्य स्नान, सत्यकथन, विद्याभ्यास, परिश्रम और ज्ञान का अर्जन करना चाहिए।
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उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ॥4॥
पदच्छेदः – उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेः च एव दक्षिणं वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ।
अन्वयः – यत् समुद्रस्य उत्तरं हिमाद्रेः च दक्षिणं तद् एव भारतं नाम वर्षम्, यत्र भारती सन्ततिः (अस्ति)।
भावार्थः – अस्मिन् सुभाषिते सुभाषितकारः भारतस्य भौगोलिकं स्वरूपं वर्णयति । हिन्दुमहासागरस्य उत्तरभागे हिमालयस्य च दक्षिणभागे यः भूभागः अस्ति, तस्य भूभागस्य नाम भारतवर्षम् । अत्रत्याः नागरिकाः भारतीयाः इति प्रसिद्धाः।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : सन्ततिः – सन्तान (Progeny), वर्षम् – महाद्वीप का भाग (A division of continent)।
हिंदी अर्थ- समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है, उसे भारत तथा उसकी संतान ( नागरिकों) को भारती कहते हैं ।
सरलार्थ- इस सुभाषित में सुभाषितकार भारत के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन करते हैं। हिंद महासागर के उत्तर भाग में और हिमालय के दक्षिण भाग में जो भूभाग है, उस भूभाग का नाम भारतवर्ष है। यहाँ के नागरिक भारतीय (नाम से) प्रसिद्ध हैं।
पदच्छेदः – जलबिन्दु-निपातेन क्रमशः पूर्यते घटः सः हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : सन्ततिः – सन्तान (Progeny), वर्षम् – महाद्वीप का भाग (A division of continent)।
हिंदी अर्थ- समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है, उसे भारत तथा उसकी संतान ( नागरिकों) को भारती कहते हैं ।
सरलार्थ- इस सुभाषित में सुभाषितकार भारत के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन करते हैं। हिंद महासागर के उत्तर भाग में और हिमालय के दक्षिण भाग में जो भूभाग है, उस भूभाग का नाम भारतवर्ष है। यहाँ के नागरिक भारतीय (नाम से) प्रसिद्ध हैं।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥5॥
पदच्छेदः – जलबिन्दु-निपातेन क्रमशः पूर्यते घटः सः हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।
अन्वयः – घटः क्रमशः जलबिन्दु – निपातेन पूर्यते सः हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च भवति ।
भावार्थ: – यथा निरन्तरं जलस्य बिन्दूनां पतनेन रिक्तः अपि घटः पूर्णः भवति तथैव जीवने निरन्तरम् अभ्यासेन सामान्यः अपि मानवः सर्वप्रकारकं ज्ञानं धर्मं, धनं च लभते ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : निपातेन – गिरने से (By falling ), हेतुः – कारण (Reason)।
हिंदी अर्थ – जिस प्रकार पानी की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, उसी प्रकार समस्त विद्याओं, धर्म और धन का संचय करना चाहिए ।
सरलार्थ- जिस प्रकार लगातार पानी की बूँद गिरने से खाली घड़ा भी भर जाता है, उसी प्रकार जीवन में निरंतर अभ्यास से सामान्य मानव भी सभी प्रकार के ज्ञान, धर्म और धन को प्राप्त करता है।
पदच्छेदः – यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलम् इव विस्तारिता बुद्धिः ।
अन्वयः – यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति च तस्य बुद्धिः दिवाकरकिरणैः नलिनीदलम् इव विस्तारिता भवति ।
भावार्थ: – अस्माभिः आत्मविकासाय सर्वथा श्रेष्ठजनैः सह सङ्गतिः वासश्च कर्तव्यः । यतो हि यः निरन्तरं पठति (अर्थात् स्वाध्यायं करोति), लिखति, पश्यति, विविधान् प्रश्नान् करोति (स्वस्य संशयं दूरीकरोति), ज्ञानिजनानाम् आश्रये (समीपे) तिष्ठति, तस्य बुद्धिः तथैव वर्धते यथा सूर्यस्य किरणैः कमलं पूर्णतया विकसितं भवति ।
शब्दार्था: (Word Meanings): परिपृच्छति – विनय से पूछता/ती है (Humbly enquires), उपाश्रयति – पास जाता / जाती है (Approaches), सङ्गतिः-संसर्ग (Association)।
हिंदी अर्थ- जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है, जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ ।
सरलार्थ- हम सभी को आत्मविकास के लिए हमेशा श्रेष्ठ जनों के साथ संगति और वास करना चाहिए। जो निरंतर पढ़ता है (अर्थात् स्वाध्याय करता है), लिखता है, देखता है, विविध प्रश्न करता है (अपने संशय दूर करता है), ज्ञानी लोगों के आश्रय (समीप में) रहता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है; जैसे सूर्य की किरणों से कमल पूर्णतया विकसित होता है।
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पदच्छेदः – प्रियवाक्य-प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः तस्मात् तद् एव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : निपातेन – गिरने से (By falling ), हेतुः – कारण (Reason)।
हिंदी अर्थ – जिस प्रकार पानी की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, उसी प्रकार समस्त विद्याओं, धर्म और धन का संचय करना चाहिए ।
सरलार्थ- जिस प्रकार लगातार पानी की बूँद गिरने से खाली घड़ा भी भर जाता है, उसी प्रकार जीवन में निरंतर अभ्यास से सामान्य मानव भी सभी प्रकार के ज्ञान, धर्म और धन को प्राप्त करता है।
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितानुपाश्रयति ।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलमिव विस्तारिता बुद्धिः ॥ 6॥
अन्वयः – यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पण्डितान् उपाश्रयति च तस्य बुद्धिः दिवाकरकिरणैः नलिनीदलम् इव विस्तारिता भवति ।
भावार्थ: – अस्माभिः आत्मविकासाय सर्वथा श्रेष्ठजनैः सह सङ्गतिः वासश्च कर्तव्यः । यतो हि यः निरन्तरं पठति (अर्थात् स्वाध्यायं करोति), लिखति, पश्यति, विविधान् प्रश्नान् करोति (स्वस्य संशयं दूरीकरोति), ज्ञानिजनानाम् आश्रये (समीपे) तिष्ठति, तस्य बुद्धिः तथैव वर्धते यथा सूर्यस्य किरणैः कमलं पूर्णतया विकसितं भवति ।
शब्दार्था: (Word Meanings): परिपृच्छति – विनय से पूछता/ती है (Humbly enquires), उपाश्रयति – पास जाता / जाती है (Approaches), सङ्गतिः-संसर्ग (Association)।
हिंदी अर्थ- जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है, जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ ।
सरलार्थ- हम सभी को आत्मविकास के लिए हमेशा श्रेष्ठ जनों के साथ संगति और वास करना चाहिए। जो निरंतर पढ़ता है (अर्थात् स्वाध्याय करता है), लिखता है, देखता है, विविध प्रश्न करता है (अपने संशय दूर करता है), ज्ञानी लोगों के आश्रय (समीप में) रहता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है; जैसे सूर्य की किरणों से कमल पूर्णतया विकसित होता है।
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प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥7॥
पदच्छेदः – प्रियवाक्य-प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः तस्मात् तद् एव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।
अन्वयः – सर्वे जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ?
भावार्थ: – मधुर भाषणेन सर्वे अपि प्राणिनः अस्माकं सर्वाणि मित्राणि, माता, पिता, भ्राता इत्यादयः प्रसन्नाः भवन्ति । मधुर भाषणेन कापि हानिः नास्ति । अतः सर्वदा मधुरभाषणम् एव करणीयम् । मधुरभाषणे कदापि सङ्कोचः न करणीयः ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : तुष्यन्ति – संतुष्ट होते हैं (Feeling satisfied), वक्तव्यं – बोलना चाहिए (Should speak)।
हिंदी अर्थ- मीठी वाणी बोलने से सभी जीव संतुष्ट हो जाते हैं। अतः वह (मीठी वाणी) ही बोलना चाहिए। मधुर बोलने में कंजूसी कैसी ?
सरलार्थ- मधुर वाणी से सभी प्राणी, हमारे सभी मित्र, माता, पिता, भाई आदि प्रसन्न होते हैं। मधुर बोलने में कोई हानि नहीं है। इसलिए हमेशा मधुर ही बोलना चाहिए। मधुर बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए।
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पदच्छेदः – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति ।
शब्दार्था: (Word Meanings) : तुष्यन्ति – संतुष्ट होते हैं (Feeling satisfied), वक्तव्यं – बोलना चाहिए (Should speak)।
हिंदी अर्थ- मीठी वाणी बोलने से सभी जीव संतुष्ट हो जाते हैं। अतः वह (मीठी वाणी) ही बोलना चाहिए। मधुर बोलने में कंजूसी कैसी ?
सरलार्थ- मधुर वाणी से सभी प्राणी, हमारे सभी मित्र, माता, पिता, भाई आदि प्रसन्न होते हैं। मधुर बोलने में कोई हानि नहीं है। इसलिए हमेशा मधुर ही बोलना चाहिए। मधुर बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए।
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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥8॥
पदच्छेदः – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति ।
अन्वयः – आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः ( अस्ति ) । उद्यमसमः बन्धुः नास्ति, (जन: ) यं (उद्यमं) कृत्वा न अवसीदति ।
भावार्थ: – आलस्यम् एव मनुष्यस्य शरीरे विद्यमानः महान् शत्रुः अस्ति । तत् एव अस्माकं कार्यस्य सम्पादने अवरोधकं भवति । परिश्रमः एव अस्माकं वास्तविकं मित्रम् अस्ति । यः परिश्रमं करोति सः कदापि दुःखं न प्राप्नोति ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : रिपु: – वैरी (Enemy), कृत्वा – करके (After doing)।
हिंदी अर्थ – मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है। परिश्रम जैसा दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता ।
सरलार्थ-आलस्य ही मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है। वही हमारे कार्य सम्पादन में बाधक होता है। परिश्रम ही हमारा वास्तविक मित्र है। जो परिश्रम करता है, वह कभी भी दुख नहीं प्राप्त करता है।
पदच्छेदः – अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन-द्वयं परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।
अन्वयः – अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् (अस्ति), परोपकारः पुण्याय परपीडनं पापाय (च भवति) ।
भावार्थ: – महर्षेः वेदव्यासस्य अष्टादश- पुराणानां सारः वचनद्वये अस्ति-
अतः अस्माभिः सर्वदा परोपकारः करणीयः । अन्येषां पीडनं कदापि न करणीयम् ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : परपीडनम् – दूसरों को पीड़ा देना (Bothering others), पुण्यम् – सत्कार्यों के फल (Fruits of meritorious deeds)!
हिंदी अर्थ- अठारह पुराणों में व्यास ने दो बातें कही हैं। दूसरों का भला करना पुण्य होता है (और) दूसरों को दुख देना पाप। सरलार्थ-
महर्षि वेदव्यास के अठारह पुराणों का सार दो वचनों में है-
शब्दार्थाः (Word Meanings) : रिपु: – वैरी (Enemy), कृत्वा – करके (After doing)।
हिंदी अर्थ – मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है। परिश्रम जैसा दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता ।
सरलार्थ-आलस्य ही मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है। वही हमारे कार्य सम्पादन में बाधक होता है। परिश्रम ही हमारा वास्तविक मित्र है। जो परिश्रम करता है, वह कभी भी दुख नहीं प्राप्त करता है।
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥9॥
पदच्छेदः – अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन-द्वयं परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।
अन्वयः – अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् (अस्ति), परोपकारः पुण्याय परपीडनं पापाय (च भवति) ।
भावार्थ: – महर्षेः वेदव्यासस्य अष्टादश- पुराणानां सारः वचनद्वये अस्ति-
- परेषाम् उपकारेण पुण्यं भवति ।
- परेषां पीडनेन पापं भवति इति ।
अतः अस्माभिः सर्वदा परोपकारः करणीयः । अन्येषां पीडनं कदापि न करणीयम् ।
शब्दार्थाः (Word Meanings) : परपीडनम् – दूसरों को पीड़ा देना (Bothering others), पुण्यम् – सत्कार्यों के फल (Fruits of meritorious deeds)!
हिंदी अर्थ- अठारह पुराणों में व्यास ने दो बातें कही हैं। दूसरों का भला करना पुण्य होता है (और) दूसरों को दुख देना पाप। सरलार्थ-
महर्षि वेदव्यास के अठारह पुराणों का सार दो वचनों में है-
- दूसरों के उपकार से पुण्य होता है ।
- दूसरों को पीड़ा देने से पाप होता है।

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