Class 8 Sanskrit Chapter 1 Hindi Translation संगच्छध्वं संवदध्वम् | Class 8 Sanskrit Deepakam Translation all Chapters
Class 8 Sanskrit Chapter 1 Hindi Translation संगच्छध्वं संवदध्वम् Summary
Here are NCERT Class 8 Sanskrit Class 8 Sanskrit notes and Chapter 1 “संगच्छध्वं संवदध्वम्” with Hindi translation, summary, and detailed explanation, designed to simplify complex chapters and make them easier to understand.
Sanskrit Class 8 Chapter 1 Hindi Translation संगच्छध्वं संवदध्वम् Summary
संगच्छध्वं संवदध्वम्
Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् Summary Notes:
वैदिक वाङ्मय में वेद का सर्वोच्च स्थान माना गया है। इस पाठ में कुछ प्रमुख वेदमंत्रों का संकलन किया गया है, जिनका सार अत्यंत प्रेरणादायक है।
इन मंत्रों में संदेश दिया गया है कि मनुष्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र में मिल-जुलकर प्रगति करें तथा एकजुट होकर कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हों। सभी को आपस में विचार-विमर्श करते हुए एक ही स्वर में बोलना चाहिए और परस्पर मतभेद से बचना चाहिए।
एक ही उद्देश्य में लगे लोगों का चिंतन, लक्ष्य और भावना समान होनी चाहिए। उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव या विरोध न हो। उनके मन, संकल्प और हृदय एकरूप हों। हे मनुष्यों! तुम्हारे विचार, लक्ष्य और संकल्प समान हों तथा तुम सब मिलकर एकता और सद्भाव के साथ जीवन व्यतीत करो।
Class 8 Sanskrit Chapter 1 Hindi Translation संगच्छध्वं संवदध्वम् :
(संगच्छध्वं संवदध्वम् मूलपाठः, शब्दार्थाः, अन्वयाः, सरलार्थाः, अभ्यासकार्यम्)
➤ नमस्ते आचार्य ! अस्माकं विद्यालयस्य क्रीडोत्सवे पादकन्दुक क्रीडायां वयं विजयं प्राप्तवन्तः।
वर्धापनानि, अभिनन्दनं भवताम् । अपि भवन्तः जानन्ति यत् भवतां प्रतिद्वन्द्विनः कथं पराजिता : ?
आम्, जानामि आचार्य ! अस्माकं दलस्य क्रीडकेषु परस्परं सम्यक् सामञ्जस्यम् आसीत्, किन्तु विपक्षि-दले तत् नासीत् ।
सत्यम् आचार्य ! तस्य दलस्य क्रीडकेषु परस्परं मनोभेदः द्वेषभावः च आसीत् । ते अन्योन्यं सहयोगं न कृतवन्तः।
तर्हि वदन्तु, विजयप्राप्त्यर्थं किं किम् आवश्यकम्? मिलित्वा कार्यकरणम्, एकता, परस्परं सामञ्जस्यं च आवश्यकम्।
सत्यम् एव उक्तम्। एष एव सन्देशः वेदे ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ इत्येवं प्रदत्तः ।
आचार्य ! कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्देश : ? कः च अस्य अभिप्राय : ?
ऋग्वेदे – ‘संज्ञान- सूक्तस्य’ एषः मन्त्रांशः । एतत् ‘संघटन – सूक्तम्’ इत्यपि प्रख्यातम्। आगच्छन्तु, वयम् अस्य सूक्तस्य प्रसिद्धान् त्रीन् मन्त्रान् पठामः ।
शब्दार्था:-
अस्माकम् – हमारा ।
वर्धापनानि – बधाई ।
प्रतिद्वन्द्विनः – प्रतिपक्षी ।
आम् – हाँ ।
पराजिताः – हार गए।
क्रीडक – खिलाड़ी ।
सम्यक् – अच्छी प्रकार ।
मनोभेदः – फूट।
उक्तम् – कहा है।
प्रद्वत्त: – दिया गया।
संगच्छध्वम् – मिलकर चलो।
मिलित्वा – मिलकर।
प्रख्यातम् – प्रसिद्ध।
हिंदी अनुवाद: -
नमस्ते, आचार्य ! हमारे विद्यालय के खेल समारोह में फुटबॉल खेल में हमने विजय प्राप्त की है।
बधाइयाँ, आपका अभिनन्दन है। क्या आप जानते हैं कि आप लोगों के प्रतिपक्षी कैसे हारे ?
हाँ, जानता हूँ, आचार्य ! हमारे दल के खिलाड़ियों में परस्पर भली प्रकार सामञ्जस्य था, परन्तु विपक्षी दल में वह नहीं था।
सत्य है, आचार्य ! उस दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनमुटाव तथा द्वेषभाव था। उन्होंने परस्पर सहयोग नहीं किया।इसलिए, बताओ। विजय प्राप्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक है ?
वर्धापनानि, अभिनन्दनं भवताम् । अपि भवन्तः जानन्ति यत् भवतां प्रतिद्वन्द्विनः कथं पराजिता : ?
आम्, जानामि आचार्य ! अस्माकं दलस्य क्रीडकेषु परस्परं सम्यक् सामञ्जस्यम् आसीत्, किन्तु विपक्षि-दले तत् नासीत् ।
सत्यम् आचार्य ! तस्य दलस्य क्रीडकेषु परस्परं मनोभेदः द्वेषभावः च आसीत् । ते अन्योन्यं सहयोगं न कृतवन्तः।
तर्हि वदन्तु, विजयप्राप्त्यर्थं किं किम् आवश्यकम्? मिलित्वा कार्यकरणम्, एकता, परस्परं सामञ्जस्यं च आवश्यकम्।
सत्यम् एव उक्तम्। एष एव सन्देशः वेदे ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ इत्येवं प्रदत्तः ।
आचार्य ! कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्देश : ? कः च अस्य अभिप्राय : ?
ऋग्वेदे – ‘संज्ञान- सूक्तस्य’ एषः मन्त्रांशः । एतत् ‘संघटन – सूक्तम्’ इत्यपि प्रख्यातम्। आगच्छन्तु, वयम् अस्य सूक्तस्य प्रसिद्धान् त्रीन् मन्त्रान् पठामः ।
शब्दार्था:-
अस्माकम् – हमारा ।
वर्धापनानि – बधाई ।
प्रतिद्वन्द्विनः – प्रतिपक्षी ।
आम् – हाँ ।
पराजिताः – हार गए।
क्रीडक – खिलाड़ी ।
सम्यक् – अच्छी प्रकार ।
मनोभेदः – फूट।
उक्तम् – कहा है।
प्रद्वत्त: – दिया गया।
संगच्छध्वम् – मिलकर चलो।
मिलित्वा – मिलकर।
प्रख्यातम् – प्रसिद्ध।
हिंदी अनुवाद: -
नमस्ते, आचार्य ! हमारे विद्यालय के खेल समारोह में फुटबॉल खेल में हमने विजय प्राप्त की है।
बधाइयाँ, आपका अभिनन्दन है। क्या आप जानते हैं कि आप लोगों के प्रतिपक्षी कैसे हारे ?
हाँ, जानता हूँ, आचार्य ! हमारे दल के खिलाड़ियों में परस्पर भली प्रकार सामञ्जस्य था, परन्तु विपक्षी दल में वह नहीं था।
सत्य है, आचार्य ! उस दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनमुटाव तथा द्वेषभाव था। उन्होंने परस्पर सहयोग नहीं किया।इसलिए, बताओ। विजय प्राप्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक है ?
मिलकर कार्य करना, एकता और परस्पर मेल आवश्यक है।
सत्य ही कहा है। यह संदेश ही वेद में ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ इस प्रकार दिया गया है।
आचार्य ! किस वेद से यह संदेश लिया गया है ? और इसका अभिप्राय क्या है ?
ऋग्वेद में सञ्ज्ञान सूक्त का यह मन्त्रांश है। यह संघटन सूक्त के रूप में भी प्रसिद्ध है। आओ, हम इस सूक्त के प्रसिद्ध तीन मंत्रों को पढ़ते हैं।
सत्य ही कहा है। यह संदेश ही वेद में ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ इस प्रकार दिया गया है।
आचार्य ! किस वेद से यह संदेश लिया गया है ? और इसका अभिप्राय क्या है ?
ऋग्वेद में सञ्ज्ञान सूक्त का यह मन्त्रांश है। यह संघटन सूक्त के रूप में भी प्रसिद्ध है। आओ, हम इस सूक्त के प्रसिद्ध तीन मंत्रों को पढ़ते हैं।
➤ प्राचीन-भारतीयज्ञान – परम्परायां ‘वेदः साक्षात् ब्रह्ममुखनिः- सृता पवित्रतमा दैवी वाक्’ इति मन्यते । वेदस्य चत्वारः संहिताः सन्ति-ऋग्वेद, यजुर्वेदः, सामवेद, अथर्ववेदः चेति । इमे वेदाः अद्य विश्वस्य प्राचीनतम – साहित्य-रूपेण विद्वद्भिः मन्यन्ते। भवन्तः सर्वे स्नात्वा, शुद्धवस्त्राणि परिधाय, पादत्राणं बहिः स्थापयित्वा, अस्यां प्रार्थनासभायां समुपस्थिताः सन्ति। अतः आगच्छन्तु, प्रणामाञ्जलिं कृत्वा, नेत्रे मीलयित्वा, एकाग्रचित्तेन, समवेतस्वरेण च वेदमन्त्राणाम् उच्चारणं कुर्मः-
शब्दार्थाः
ब्रह्ममुखः – ब्रह्मा के मुख से।
निःसृता – निकली हुई ।
मन्यते -मानी जाती है।
चत्वारः – चार।
संहिताः – ग्रन्थ।
विद्वद्भि – विद्वानों के द्वारा।
परिधाय – पहनकर ।
पादत्राणम् – जूता ।
बहिः – बाहर।
स्थापयित्वा – रखकर ।
समुपस्थिताः – उपस्थित ।
प्रणामाञ्जलिम् – हाथ जोड़कर ।
समवेत : – मिलकर।
नेत्रे – आँखों को।
मीलयित्वा – मूँदकर ।
हिंदी अनुवाद :-
शब्दार्थाः
ब्रह्ममुखः – ब्रह्मा के मुख से।
निःसृता – निकली हुई ।
मन्यते -मानी जाती है।
चत्वारः – चार।
संहिताः – ग्रन्थ।
विद्वद्भि – विद्वानों के द्वारा।
परिधाय – पहनकर ।
पादत्राणम् – जूता ।
बहिः – बाहर।
स्थापयित्वा – रखकर ।
समुपस्थिताः – उपस्थित ।
प्रणामाञ्जलिम् – हाथ जोड़कर ।
समवेत : – मिलकर।
नेत्रे – आँखों को।
मीलयित्वा – मूँदकर ।
हिंदी अनुवाद :-
प्राचीन भारतीय ज्ञान की परम्परा में वेद को साक्षात् ब्रह्मा के मुख से निकली हुई अत्यधिक पवित्र वाणी माना जाता है। वेद के चार ग्रन्थ हैं – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये वेद आज विश्व के प्राचीनतम साहित्य के रूप में माने जाते हैं। आप सभी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर जूतों को बाहर रखकर इस प्रार्थना सभा में उपस्थित हैं। इसलिए आओ, हाथ जोड़कर, आँख बंद करके, एकाग्रचित्त से एक स्वर से वेद मन्त्रों का उच्चारण करते हैं-
➤ मन्त्राणां भावार्थं जानीमः-
पदच्छेद–संगच्छध्वम् संवदध्वम् सम् वः मनांसि जानताम् : देवाः भागम् यथा पूर्वे संजानानाः उपासते।
अन्वयः-(यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते। (पृष्ठ 3)
शब्दार्था:
संगच्छध्वम् – मिलकर चलो। संवदध्वम् – मिलकर बोलो। मनांसि – मन के विचार । पूर्वे – पूर्व काल में। संजानानाः – कर्मों का मिलकर वहन करते हुए । उपासते – सेवन करते हैं।
सरलार्थ – (अरे मनुष्यो !) मिलकर चलो, मिलकर बोलो। परस्पर मनोभावों को जानते हुए (कर्म करो ) । जिस प्रकार पूर्वकाल में मिलकर कर्मों का वहन करते थे।
भावार्थ – इस मन्त्र का भाव यह है मनुष्यों को मिलकर चलना चाहिए और मिलकर एकरूप से बोलना चाहिए। इससे राष्ट्र, समाज और परिवार की उन्नति होती है। परस्पर मतभेद न हो। जिस प्रकार पूर्वकाल में देवता अपने-अपने भाग को मिलकर ग्रहण करते थे।
पदच्छेद – समानः मन्त्रः समितिः समानी समानम् मनः सह चित्तम् एषाम् समानम् मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन वः हविषा जुहोमि ।
अन्वयः-एषां मन्त्रः समानः, समितिः समानी, मनः समानं, चित्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन हविषा जुहोमि । (पृष्ठ 3)
शब्दार्थाः
मन्त्रः – विचार । समानम् – समान । अभिमन्त्रये -मन्त्रणा करता हूँ। हविषा – प्रार्थना के द्वारा । समितिः – लक्ष्य सिद्धि। समानी – समान। जुहोमि – ज्ञानयज्ञ करता हूँ ।
सरलार्थ : (हे मनुष्यों !) विचार एक समान हो, लक्ष्यसिद्धि एक समान हो । सभी ( मनुष्यों) का मन एक समान हो । मैं तुम्हारे लिए समान विचार प्रकट करता हूँ और एक समान छवि (प्रार्थना) के द्वारा यज्ञ सम्पन्न करता हूँ।
भावार्थ :
एक ही कार्य में साथ-साथ प्रवृत्त लोगों का चिन्तन एक समान हो ताकि लक्ष्यसिद्धि में कोई बाधा उपस्थित न हो। उनमें परस्पर सौहार्द की भावना रहे तथा उनमें विचार भेद न हो। वे सभी एक समान संकल्प वाले हों और समान विचार के साथ ज्ञान यज्ञ को सम्पन्न करें।
पदच्छेद – समानी व : आकूतिः समाना हृदयानि वः समानम् अस्तु वः मनः यथा वः सु सह असति ।
अन्वयः – (हे मानवा: !) व: आकूतिः समानी (अस्तु)। वः हृदयानि समाना (सन्तु) । यथा वः सह सु असति, (तथा) वः मनः समानम् अस्तु ।
शब्दार्थाः
आकूतिः – संकल्प । समानाः – समान। सुसहासति – सुसंगठित हो ।
सरलार्थ : (अरे मनुष्यो !) तुम्हारा संकल्प समान हो । तुम्हारे हृदय समान (विचार वाले) हों । तुम्हारा मन समान हो। जिससे तुम्हारा संघटन सुन्दर हो ।
भावार्थ :
मनुष्यों का संकल्प एक समान होना चाहिए, ताकि तुम्हारा संघटन सुन्दर हो, तुम्हारा कार्य सुन्दर हो। इस मन्त्र के द्वारा संगठित रूप से सह जीवन की प्रेरणा प्राप्त होती है।
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥१॥
पदच्छेद–संगच्छध्वम् संवदध्वम् सम् वः मनांसि जानताम् : देवाः भागम् यथा पूर्वे संजानानाः उपासते।
अन्वयः-(यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते। (पृष्ठ 3)
शब्दार्था:
संगच्छध्वम् – मिलकर चलो। संवदध्वम् – मिलकर बोलो। मनांसि – मन के विचार । पूर्वे – पूर्व काल में। संजानानाः – कर्मों का मिलकर वहन करते हुए । उपासते – सेवन करते हैं।
सरलार्थ – (अरे मनुष्यो !) मिलकर चलो, मिलकर बोलो। परस्पर मनोभावों को जानते हुए (कर्म करो ) । जिस प्रकार पूर्वकाल में मिलकर कर्मों का वहन करते थे।
भावार्थ – इस मन्त्र का भाव यह है मनुष्यों को मिलकर चलना चाहिए और मिलकर एकरूप से बोलना चाहिए। इससे राष्ट्र, समाज और परिवार की उन्नति होती है। परस्पर मतभेद न हो। जिस प्रकार पूर्वकाल में देवता अपने-अपने भाग को मिलकर ग्रहण करते थे।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
पदच्छेद – समानः मन्त्रः समितिः समानी समानम् मनः सह चित्तम् एषाम् समानम् मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन वः हविषा जुहोमि ।
अन्वयः-एषां मन्त्रः समानः, समितिः समानी, मनः समानं, चित्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन हविषा जुहोमि । (पृष्ठ 3)
शब्दार्थाः
मन्त्रः – विचार । समानम् – समान । अभिमन्त्रये -मन्त्रणा करता हूँ। हविषा – प्रार्थना के द्वारा । समितिः – लक्ष्य सिद्धि। समानी – समान। जुहोमि – ज्ञानयज्ञ करता हूँ ।
सरलार्थ : (हे मनुष्यों !) विचार एक समान हो, लक्ष्यसिद्धि एक समान हो । सभी ( मनुष्यों) का मन एक समान हो । मैं तुम्हारे लिए समान विचार प्रकट करता हूँ और एक समान छवि (प्रार्थना) के द्वारा यज्ञ सम्पन्न करता हूँ।
भावार्थ :
एक ही कार्य में साथ-साथ प्रवृत्त लोगों का चिन्तन एक समान हो ताकि लक्ष्यसिद्धि में कोई बाधा उपस्थित न हो। उनमें परस्पर सौहार्द की भावना रहे तथा उनमें विचार भेद न हो। वे सभी एक समान संकल्प वाले हों और समान विचार के साथ ज्ञान यज्ञ को सम्पन्न करें।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
अन्वयः – (हे मानवा: !) व: आकूतिः समानी (अस्तु)। वः हृदयानि समाना (सन्तु) । यथा वः सह सु असति, (तथा) वः मनः समानम् अस्तु ।
शब्दार्थाः
आकूतिः – संकल्प । समानाः – समान। सुसहासति – सुसंगठित हो ।
सरलार्थ : (अरे मनुष्यो !) तुम्हारा संकल्प समान हो । तुम्हारे हृदय समान (विचार वाले) हों । तुम्हारा मन समान हो। जिससे तुम्हारा संघटन सुन्दर हो ।
भावार्थ :
मनुष्यों का संकल्प एक समान होना चाहिए, ताकि तुम्हारा संघटन सुन्दर हो, तुम्हारा कार्य सुन्दर हो। इस मन्त्र के द्वारा संगठित रूप से सह जीवन की प्रेरणा प्राप्त होती है।

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