Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions
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चतुर्थः पाठः : न खलु वयस्तेजसो हेतुः
पाठः तथा अनुवादः (Paragraph-wise Sanskrit, Hindi & English)
परिच्छेदः - १
भारतदेशस्य स्वतन्त्रतायाः अमृतमहोत्सववर्षं वयम् आचरितवन्तः। किं वयं जानीमः यत् देशाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कियन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रान्तिवीराः स्वतन्त्रतायज्ञे स्वीयपरिवारं स्वीयजीवनं च आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः इति ? छात्राः ! ते सर्वेऽपि क्रान्तिवीराः अस्माभिः कृतज्ञताभावनया नित्यं वन्दनीयाः। खुदीरामः तेषु एव देशभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रान्तिवीरः हुतात्मा अस्ति। क्रान्तिवीरस्य खुदीरामस्य जीवनवृत्तान्तः संक्षेपेण अत्र वर्णितः अस्ति।
हिन्दी अनुवाद :
हमने भारत देश की स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव वर्ष मनाया है। क्या हम जानते हैं कि देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कितने ज्ञात और अज्ञात क्रांतिवीरों ने स्वतंत्रता-यज्ञ में अपने परिवार और अपने जीवन की आहुति समर्पित की ? प्यारे विद्यार्थियों ! वे सभी क्रांतिवीर हमारे द्वारा कृतज्ञता की भावना से नित्य वंदनीय हैं। खुदीराम उन्हीं देशभक्तों में से एक तेजस्वी बाल-क्रांतिवीर अमर बलिदानी हैं। क्रांतिवीर खुदीराम के जीवन का वृत्तांत यहाँ संक्षेप में वर्णित है।
English Translation :
We celebrated the Amrit Mahotsav year of India's independence. Do we know how many known and unknown revolutionaries sacrificed their families and their lives as offerings in the sacred sacrifice of freedom to bestow independence upon the country? Dear students! All those revolutionaries deserve our daily reverence with feelings of gratitude. Khudiram is one such radiant young revolutionary martyr among those patriots. The life story of the revolutionary Khudiram is described here in brief.
परिच्छेदः - २
बङ्गप्रान्तः भारतस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामे सशस्त्रान्दोलने अग्रेसरः आसीत्। तस्मिन् बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमे वर्षे (१८८९) दिसम्बरमासस्य तृतीये दिनाङ्के खुदीरामस्य जन्म अभवत्। तस्य जनकस्य नाम त्रैलोक्यनाथः इति, जनन्याः नाम लक्ष्मीप्रिया देवी च आसीत्। खुदीरामस्य बाल्यकाले एव तस्य पितरौ दिवङ्गतौ। अतः तस्य अग्रजया अपरूपादेव्या एव खुदीरामस्य पालनं पोषणं च कृतम्। बाल्यकालतः एव खुदीरामः असाधारणः आसीत्। साधारणबालानाम् इव क्रीडादिषु तस्य मनः न रमते स्म। सः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
हिन्दी अनुवाद :
बंगाल प्रांत भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र आंदोलन में अग्रणी था। उसी बंगाल प्रांत के मेदिनीपुर जिले के मोहोबनी गाँव में 3 दिसंबर 1889 को खुदीराम का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। खुदीराम के बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया। अतः उनकी बड़ी बहन अपरूपा देवी ने ही खुदीराम का पालन-पोषण किया। बचपन से ही खुदीराम असाधारण थे। साधारण बालकों की तरह खेल-कूद आदि में उनका मन नहीं लगता था। वे देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों को देखकर व्यथित होते थे।
English Translation :
The Bengal province was in the forefront of the armed struggle in India's freedom movement. In that Bengal province, in the village of Mohoboni in Medinipur district, Khudiram was born on December 3, 1889. His father's name was Trailokyanath and his mother's name was Lakshmipriya Devi. In Khudiram's early childhood itself, his parents passed away. Therefore, his elder sister Aparupa Devi brought him up and nurtured him. Right from his childhood, Khudiram was extraordinary. Unlike ordinary children, his mind did not take pleasure in play and games. He used to feel deeply pained upon seeing the atrocities committed against his fellow countrymen.
परिच्छेदः - ३
बङ्गप्रान्ते क्रान्तिवीराणां महद्भिः गुप्तगतिविधिभिः आङ्ग्लाः संत्रस्ताः आसन्। भारतस्य तात्कालिकः वायसरायः कर्जनः बङ्गप्रान्तस्य एतत् वीरत्वं दमयितुम्, उत्साहं ध्वंसयितुं, देशभक्तिं मर्दयितुं च बङ्गप्रान्तस्य पन्थाधारितं विभजनं करणीयम् इति निश्चितवान्। पञ्चाधिक-नवदशशततमे वर्षे (१९०५) तेन बङ्गप्रान्तः भागद्वये विभाजितः। तस्य एतया कृत्या न केवलं बङ्गप्रान्ते अपि तु सर्वस्मिन् देशे जनान्दोलनं प्रवृत्तम्। बङ्गभङ्ग-आन्दोलनमिति तस्य जनान्दोलनस्य नाम। यद्यपि खुदीरामः तस्मिन् समये केवलं पञ्चदशवर्षीयः तथापि देशभक्तेः भावनया सः प्रेरितः सन् जनान्दोलने कूर्दितः। आङ्ग्लानां पारतन्त्र्यशृङ्खलातः वन्दनीयभारतमातुः मोचनं करणीयम् इत्येव सङ्कल्पः आसीत्। अतः सः नवमीं कक्षाम् अपि पूर्णां कर्तुं न शक्तवान्। यतोहि देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति।
हिन्दी अनुवाद :
बंगाल प्रांत में क्रांतिवीरों की व्यापक गुप्त गतिविधियों से अंग्रेज अत्यंत भयभीत थे। भारत के तत्कालीन वायसराय कर्जन ने बंगाल प्रांत के इस शौर्य को दबाने, उत्साह को नष्ट करने और देशभक्ति को कुचलने के लिए बंगाल प्रांत का संप्रदाय (धर्म) आधारित विभाजन करने का निश्चय किया। वर्ष 1905 में उसके द्वारा बंगाल प्रांत को दो भागों में बाँट दिया गया। उसके इस कृत्य से न केवल बंगाल में, बल्कि पूरे देश में एक जन-आंदोलन उठ खड़ा हुआ। उस जन-आंदोलन का नाम 'बंग-भंग आंदोलन' था। यद्यपि खुदीराम उस समय केवल पंद्रह वर्ष के थे, फिर भी देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर वे जन-आंदोलन में कूद पड़े। अंग्रेजों की परतंत्रता की बेड़ियों से वंदनीय भारत माता को मुक्त कराना ही उनका एकमात्र संकल्प था। इसलिए वे नौवीं कक्षा भी पूरी नहीं कर सके, क्योंकि देशभक्तों का जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित होता है।
English Translation :
The British were terrified by the extensive secret activities of the revolutionaries in Bengal province. Curzon, the contemporary Viceroy of India, decided to partition the Bengal province along religious lines to suppress this heroism, destroy their enthusiasm, and crush their patriotism. In the year 1905, he partitioned Bengal into two parts. Due to this act of his, a mass movement erupted not only in Bengal but across the entire country. The name of that mass movement was the 'Bang-Bhang (Anti-Partition) Movement'. Although Khudiram was only fifteen years old at that time, inspired by the sentiment of patriotism, he plunged into the mass movement. His sole resolve was to liberate venerable Mother India from the shackles of British subjugation. Hence, he could not even complete his ninth grade, because the lives of patriots are dedicated to the nation.
परिच्छेदः -४
बालानां संघटनं कृत्वा सः पदयात्राम् आयोजयति स्म। तस्यां यात्रायां देशभक्तियुतानि गीतानि, वन्दे मातरम् चेत्यादयः घोषणाः भवन्ति स्म। सः पदयात्रामाध्यमेन लोकजागरणविषयकाणि पत्रकाणि जनेषु वितरति स्म। कदाचित् खुदीरामः पत्रकवितरणसमये आङ्ग्लानां हस्तगतः जातः। किन्तु सामर्थ्यसम्पन्नः खुदीरामः आङ्ग्लानां ताडनं कृत्वा ततः निरगच्छत्। बङ्गप्रान्ते क्रान्तिवीरैः सञ्चालितानि बहूनि गुप्तमण्डलानि आङ्ग्लानां मनसि आतङ्कं जनयन्ति स्म। कस्यचित् गुप्तमण्डलस्य सञ्चालकः आसीत् सत्येन्द्रनाथः। खुदीरामः स्वमित्रेण प्रफुल्लेन सह गत्वा सत्येन्द्रनाथेन अमिलत्। सत्येन्द्रनाथः उपादिशत् — “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजलमिव निर्मलं च भवेत् इति”। तस्मात् गुप्तप्रशिक्षणकेन्द्रात् द्वाभ्याम् अष्टमासात्मकं प्रशिक्षणं प्राप्तम्। भुशुण्डिसञ्चालने अपि तौ अचिरादेव प्रवीणौ सञ्जातौ। राणाप्रतापस्य चरित्रेण प्रेरितः खुदीरामः प्रतिज्ञातवान् यत् 'यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि' इति।
हिन्दी अनुवाद :
बालकों का संगठन बनाकर वे पदयात्रा आयोजित करते थे। उस पदयात्रा में देशभक्ति से भरे गीत और 'वंदे मातरम्' आदि के नारे गूँजते थे। वे पदयात्रा के माध्यम से जन-जागरण से जुड़े पर्चे लोगों में बाँटते थे। एक बार पर्चे बाँटते समय खुदीराम अंग्रेजों के हाथों में आ गए (पकड़े गए)। किन्तु शक्तिशाली खुदीराम अंग्रेजों की पिटाई करके वहाँ से निकल भागे। बंगाल प्रांत में क्रांतिवीरों द्वारा चलाए जाने वाले अनेक गुप्त दल अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करते थे। एक गुप्त दल के संचालक सत्येन्द्रनाथ थे। खुदीराम अपने मित्र प्रफुल्ल के साथ जाकर सत्येन्द्रनाथ से मिले। सत्येन्द्रनाथ ने उपदेश दिया — “क्रांतिकारी कार्य करने के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार जैसी तीक्ष्ण और मन गंगाजल के समान निर्मल होना चाहिए”। उस गुप्त प्रशिक्षण केंद्र से दोनों ने आठ महीने का प्रशिक्षण प्राप्त किया। बंदूक चलाने में भी वे दोनों शीघ्र ही निपुण हो गए। महाराणा प्रताप के चरित्र से प्रेरित होकर खुदीराम ने प्रतिज्ञा की कि—'जब तक भारत अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त नहीं होगा, तब तक मैं जूते (जूता-चप्पल) धारण नहीं करूँगा'।
English Translation :
Organizing young boys, he used to conduct foot-marches (padyatras). Patriotic songs and slogans like 'Vande Mataram' were raised during those marches. Through the medium of these marches, he distributed leaflets regarding public awakening among the people. Once, while distributing pamphlets, Khudiram was caught by the British. However, being physically strong and agile, Khudiram struck the British policemen and escaped from there. Many secret societies operated by revolutionaries in Bengal instilled terror in the minds of the British. The director of one such secret group was Satyendranath. Khudiram went with his friend Prafulla and met Satyendranath. Satyendranath imparted the teaching: "To perform revolutionary work, the body must be as firm as a thunderbolt, the intellect as sharp as the edge of a sword, and the mind as pure as the water of the Ganges". From that secret training center, both received eight months of rigorous training. They also became adept at handling guns very soon. Inspired by the character of Maharana Pratap, Khudiram pledged: 'As long as India is not liberated from British rule, I will not wear footwear'.
परिच्छेदः - ५
कलकत्ता-जनपदस्य मुख्यः न्यायिकः आङ्ग्लः अधिकारी 'किङ्ग्ज़फोर्ड्' भारतीय-देशभक्तान् अतीवकठोररीत्या दण्डयति स्म। निर्दयः सः बालान् अपि न त्यजति स्म। तस्य स्थानान्तरणं यदा मुज़फ्फरनगरे जातं तदा 'सः हन्तव्यः' इति सशस्त्रक्रान्तिवीरमण्डलेन निश्चितम्। हत्यायोजनायाः सम्पूर्णम् उत्तरदायित्वं प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां स्वीकृतम्। तस्य वधस्य सूक्ष्मा योजनापि द्वाभ्यां निर्मिता। अष्टाधिक-नवदशशततमवर्षस्य एप्रिलमासस्य अष्टाविंशे दिनाङ्के (२८-०४-१९०८) किङ्ग्ज़फोर्ड् इत्यस्य रथविशेषे प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां विस्फोटकं प्रक्षिप्तम्। महान् विस्फोटध्वनिः जातः। अग्निज्वालाः आकाशम् अस्पृशन्। 'किङ्ग्ज़फोर्ड् हतः' अस्माकम् उत्तरदायित्वं पूर्णम् इति कृतार्थभावनया तौ पलायितवन्तौ। किन्तु हा धिक् ! यद्यपि सः किङ्ग्ज़फोर्ड् महोदयस्य रथः आसीत् तथापि तस्मिन् सः नासीदेव। केनेडीनामकस्य अधिकारिणः पत्नी पुत्री च तत्र आस्ताम्। ते मृते किन्तु किङ्ग्ज़फोर्ड् रक्षितः। आरात्रि द्वौ अपि क्रान्तिवीरौ अधावताम्। किन्तु दौर्भाग्यवशात् आङ्ग्लाः आरक्षकाः तौ अगृह्णन्। वीरप्रफुल्लेन आङ्ग्लानां विरोधे कृतः प्रतीकारयत्नः व्यर्थः अभूत्। अनन्यगतिकः प्रफुल्लः भारतमातरं मनसा प्रणम्य 'वन्दे मातरमिति' उद्घोष्य च स्ववक्षःस्थले भुशुण्ड्या गोलिकाप्रहारं कृतवान्। वीरबालः प्रफुल्लः हौतात्म्येन अमरः जातः।
हिन्दी अनुवाद :
कोलकाता जिले का मुख्य अंग्रेज न्यायिक अधिकारी 'किंग्सफोर्ड' भारतीय देशभक्तों को अत्यंत कठोरता से दंडित करता था। निर्दयी वह बालकों को भी नहीं छोड़ता था। जब उसका तबादला मुजफ्फरपुर में हुआ, तब सशस्त्र क्रांतिवीर-समिति ने निश्चय किया कि 'उसे मार डालना चाहिए'। हत्या की इस योजना की पूरी जिम्मेदारी प्रफुल्ल और खुदीराम ने स्वीकार की। उसके वध की बारीक योजना भी दोनों ने तैयार की। 28 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड की बग्गी (गाड़ी) पर प्रफुल्ल और खुदीराम ने बम फेंका। भीषण धमाके की आवाज हुई। आग की लपटें आसमान छूने लगीं। 'किंग्सफोर्ड मारा गया, हमारा उत्तरदायित्व पूरा हुआ'—इस कृतार्थ भाव से वे दोनों भाग निकले। किन्तु हाय धिक्कार ! यद्यपि वह गाड़ी किंग्सफोर्ड की ही थी, तथापि उसमें वह स्वयं नहीं था। कैनेडी नामक अधिकारी की पत्नी और पुत्री उसमें सवार थीं। वे दोनों मारी गईं, किन्तु किंग्सफोर्ड बच गया। पूरी रात दोनों क्रांतिवीर भागते रहे। किन्तु दुर्भाग्यवश अंग्रेज पुलिसकर्मियों ने उन्हें पकड़ लिया। वीर प्रफुल्ल द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध किया गया प्रतिकार का प्रयास निष्फल हो गया। अन्य कोई उपाय न देख प्रफुल्ल ने मन ही मन भारत माता को प्रणाम किया और 'वंदे मातरम्' का उद्घोष करते हुए अपनी छाती पर बंदूक से गोली चला ली। वीर बालक प्रफुल्ल अपने बलिदान से अमर हो गया।
English Translation :
The Chief British Judicial Officer of Calcutta, 'Kingsford', used to penalize Indian patriots with extreme severity. Cruel as he was, he did not spare even young boys. When he was transferred to Muzaffarpur, the armed revolutionary committee resolved that 'he must be eliminated'. The full responsibility of this assassination plot was undertaken by Prafulla and Khudiram. A meticulous strategy for his assassination was formulated by both of them. On April 28, 1908, Prafulla and Khudiram hurled a bomb at Kingsford's carriage. A tremendous explosion sounded. Flames of fire reached the sky. Believing 'Kingsford is slain, our mission is accomplished', both fled with a sense of fulfillment. But alas! Although it was Kingsford's carriage, he was not in it at all. The wife and daughter of an official named Kennedy were inside. They died, but Kingsford survived. Both revolutionaries ran throughout the night. But unfortunately, the British police captured them. The retaliatory effort made by brave Prafulla against the British proved futile. Having no other recourse, Prafulla paid mental obeisance to Mother India, shouted 'Vande Mataram', and fired a bullet into his own chest with his gun. The brave boy Prafulla became immortal through his supreme sacrifice.
परिच्छेदः -६
आङ्ग्लैः गृहीतः खुदीरामः न्यायालयं नीतः। तत्र अधिवक्तॄणां प्रत्येकं प्रश्नस्य खुदीरामस्य निश्चितम् उत्तरम् आसीत् यत् 'वन्दे मातरम्' इति। न्यायाधीशेन निर्दयतया बालाय खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः उद्बन्धनम् इति। राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः चापि चकिताः। अष्टाधिक-नवदशशततमस्य वर्षस्य अगस्तमासस्य एकादशे दिनाङ्के (११-०८-१९०८) बाल्ये वयसि एव देशस्य स्वातन्त्र्यार्थं खुदीरामः हुतात्मा जातः। प्रियभारतमातुः दर्शनार्थं सः हसन्, वन्दे मातरम् इति जपन् आनन्देन दिवं गतः।
हिन्दी अनुवाद :
अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाए गए खुदीराम को अदालत ले जाया गया। वहाँ वकीलों के प्रत्येक प्रश्न का खुदीराम का एक ही अटल उत्तर था—'वंदे मातरम्'। न्यायाधीश ने निर्दयतापूर्वक बालक खुदीराम को फाँसी के रूप में मृत्युदंड सुना दिया। देशभक्त खुदीराम के चेहरे पर न कोई डर था और न दुःख; बल्कि उनके मुख पर प्रसन्नता, शांति, संतोष और तेज था। यह देखकर न्यायाधीश और अंग्रेज अधिकारी भी स्तब्ध (हैरान) रह गए। 11 अगस्त 1908 को अल्पायु में ही देश की आजादी के लिए खुदीराम बलिदानी बन गए। अपनी प्यारी भारत माता के दर्शन के लिए वे हँसते हुए, 'वंदे मातरम्' जपते हुए आनंदपूर्वक स्वर्ग सिधार गए।
English Translation :
Captured by the British, Khudiram was brought before the court of law. There, to every query posed by the lawyers, Khudiram's definite answer was 'Vande Mataram'. The judge mercilessly decreed the death penalty by hanging for the young Khudiram. On the face of the patriot Khudiram, there was neither dread nor sorrow; rather, there was joy, serenity, contentment, and radiance. Seeing this, the judge and the British officials were amazed. On August 11, 1908, at a tender age, Khudiram became a martyr for the nation's independence. To attain the vision of his beloved Mother India, he smilingly and chanting 'Vande Mataram' happily departed for the heavenly abode.
अभ्यासः (अभ्यासाद् जायते सिद्धिः)
१. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत —
(क) खुदीरामस्य जन्म कुत्र अभवत् ?
(ख) खुदीरामः किमर्थं व्यथितः भवति स्म ?
(ग) सत्येन्द्रनाथः किम् उपदिष्टवान् ?
(घ) खुदीरामः कदा पर्यन्तं पादत्राणं न धरिष्यामि इति प्रतिज्ञातवान् ?
(ङ) किमर्थं न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः च चकिताः ?
उत्तरम् :
(क) खुदीरामस्य जन्म बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे अभवत्।
(ख) सः देशे जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
(ग) सत्येन्द्रनाथः उपदिष्टवान् यत् -
"क्रान्तिकार्यं कर्तुं वज्रसदृशं दृढं, बुद्धि तीक्ष्णा, मनः निर्मलः च भवेत्। "
(घ) यावत भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धारिष्यामि इति प्रतिज्ञातवान्।
(ङ) खुदीरामस्य मुखे भय-दुःखयोः अभाव, अपितु प्रसन्नता-शान्ति-तेजः दृष्ट्वा न्यायधीशः चकितः अभवत्।
२. अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु किं वाक्यं सत्यं किं च असत्यम् इति सूचयत —
(क) देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति । (सत्यम् / असत्यम्)
(ख) निर्दयः किङ्ग्ज़फोर्ड् बालान् अपि दण्डयति स्म । (सत्यम् / असत्यम्)
(ग) खुदीरामस्य आक्रमणेन किङ्ग्ज़फोर्ड् मृतः । (सत्यम् / असत्यम्)
(घ) खुदीरामः किङ्ग्ज़फोर्डमहोदयस्य रथस्य उपरि विस्फोटकं क्षिप्तवान् । (सत्यम् / असत्यम्)
(ङ) खुदीरामः बालानां संघटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजयति स्म । (सत्यम् / असत्यम्)
उत्तरम् :
(क) देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति । (सत्यम् / असत्यम्)
(ख) निर्दयः किङ्ग्ज़फोर्ड् बालान् अपि दण्डयति स्म । (सत्यम् / असत्यम्)
(ग) खुदीरामस्य आक्रमणेन किङ्ग्ज़फोर्ड् मृतः । (सत्यम् / असत्यम्)
(घ) खुदीरामः किङ्ग्ज़फोर्डमहोदयस्य रथस्य उपरि विस्फोटकं क्षिप्तवान् । (सत्यम् / असत्यम्)
(ङ) खुदीरामः बालानां संघटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजयति स्म । (सत्यम् / असत्यम्)
३. अधः प्रदत्तानां संवत्सराणां शब्दानाम् अङ्कैः सह मेलनं कुरुत —
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(क) सप्तचत्वारिंशदधिक-नवदशशततमं वर्षम् |
१. १९०५ |
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(ख) अष्टाधिक-नवदशशततमं वर्षम् | |
२. १८८९ |
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(ग) पञ्चाशदुत्तर-नवदशशततमं वर्षम् | |
३. १९४७ |
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(घ) पञ्चाधिक-नवदशशततमं वर्षम् | |
४. १९०८ |
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(ङ) नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमं वर्षम् | |
५. १९५० |
उत्तरम् :
(क) सप्तचत्वारिंशदधिक-नवदशशततमं वर्षम् | ३. १९४७ |
(ख) अष्टाधिक-नवदशशततमं वर्षम् | | ४. १९०८ |
(ग) पञ्चाशदुत्तर-नवदशशततमं वर्षम् | | ५. १९५० |
(घ) पञ्चाधिक-नवदशशततमं वर्षम् | | १. १९०५ |
(ङ) नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमं वर्षम् | | २. १८८९ |
४. अधः प्रदत्तानि पदानि आधृत्य चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि लिखत —
पदानि : [उद्यानं, गृहाणि, पक्षिणः, पुष्पाणि, स्वच्छता, द्विचक्रिका, पर्वतः, वृक्षाः, सूर्यः, मेघाः]
(क) ________________________________
(ख) ________________________________
(ग) ________________________________
(घ) ________________________________
(ङ) ________________________________
उत्तरम् :
(क) इदम् एकस्य उद्यानस्य चित्रम् अस्ति।
(ख) आकाशे सूर्यः उदेति, मेघाः पक्षिणः च विचरन्ति।
(ग) उद्याने वृक्षाः पुष्पाणि च सन्ति।
(घ) बालिका द्विचक्रिकां चालयति, अन्ये बालकाः क्रीडन्ति च।
(ङ) अत्र सर्वत्र स्वच्छता अस्ति, दुरे च गृहाणी पर्वताः च दृश्यन्ते।
५. सन्धिच्छेदं कुरुत —
(क) इत्यादयः = ________ + ________
(ख) सर्वेऽपि = ________ + ________
(ग) कश्चित् = ________ + ________
(घ) प्रत्येकम् = ________ + ________
(ङ) वयस्तेजसः = ________ + ________
(च) अचिरादेव = ________ + ________
उत्तरम् :
(क) इत्यादयः = इति + आदयः
(ख) सर्वेऽपि = सर्वे + अपि
(ग) कश्चित् = कः + चित्
(घ) प्रत्येकम् = प्रति + एकम्
(ङ) वयस्तेजसः = वयः + तेजसः
(च) अचिरादेव = अचिरात् + एव
६. विग्रहवाक्यं दृष्ट्वा पाठ्यपुस्तकात् समस्तपदानि चित्वा पूरयत —
(क) देशस्य भक्ताः = ________
(ख) बालः च क्रान्तिवीरः च = ________
(ग) वज्रेण सदृशम् = ________
(घ) असेः धारा = ________
(ङ) मृत्युः एव दण्डः = ________
(च) न साधारणः = ________
(छ) निर्गता दया यस्मात् सः = ________
उत्तरम् :
(क) देशस्य भक्ताः = देशभक्ताः
(ख) बालः च क्रान्तिवीरः च = बालक्रान्तिवीरः
(ग) वज्रेण सदृशम् = वज्रसदृशम्
(घ) असेः धारा = असिधारा
(ङ) मृत्युः एव दण्डः = मृत्युदण्डः
(च) न साधारणः = असाधारणः
(छ) निर्गता दया यस्मात् सः = निर्दयः
७. अधः दत्तानि वाक्यानि सूचनानुसारं परिवर्तयत —
यथा — खुदीरामः हुतात्मा जातः । (लङ्-लकारः) → खुदीरामः हुतात्मा अजायत ।
(क) वन्दे मातरम् इत्यादयः घोषणाः भवन्ति स्म । (लङ्-लकारः)
(ख) सत्येन्द्रनाथः खुदीरामम् उपादिशत् । (क्तवतु-प्रत्ययः)
(ग) सः नवमीं कक्षां पूर्णां कर्तुं न शक्तवान् । (लङ्-लकारः)
(घ) क्रान्तिवीराः आङ्ग्लानां मनसि आतङ्कम् अजनयन् । (स्म)
(ङ) प्रफुल्लः भुशुण्ड्या गोलिकाप्रहारं कृतवान् । (लङ्-लकारः)
उत्तरम् :
(क) वन्दे मातरम् इत्यादयः घोषणाः अभवन् ।
(ख) सत्येन्द्रनाथः खुदीरामम् उपदिष्टवान् ।
(ग) सः नवमीं कक्षां पूर्णां कर्तुं न अशक्नोत् ।
(घ) क्रान्तिवीराः आङ्ग्लानां मनसि आतङ्कम् जनयन्ति स्म ।
(ङ) प्रफुल्लः भुशुण्ड्या गोलिकाप्रहारं अकरोत् ।
८. उदाहरणानुसारं चित्-प्रत्ययान्तपदानि प्रयुज्य रिक्तस्थाने पूर्णवाक्यं लिखत —
पदानि : [कश्चित्, काचित्, किञ्चित्, कुत्रचित्, कदाचित्]
(क) बालकः गच्छति । → कश्चित् बालकः गच्छति ।
(ख) बालिका गच्छति । → __________________________
(ग) फलं खादतु । → __________________________
(घ) लेखनी लुप्ता । → __________________________
(ङ) सः आगच्छेत् । → __________________________
उत्तरम् :
(क) बालकः गच्छति । → कश्चित् बालकः गच्छति ।
(ख) बालिका गच्छति । → काचित् बालिका गच्छति ।
(ग) फलं खादतु । → किञ्चित् फलं खादतु ।
(घ) लेखनी लुप्ता । → लेखनी कुत्रचित् लुप्ता ।
(ङ) सः आगच्छेत् । →सः कदाचित् आगच्छेत् ।
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