Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 मनः पूतं समाचरेत् | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 मनः पूतं समाचरेत् | NCERT Book Translation, Question Answrs & Solutions

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Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 मनः पूतं समाचरेत्

षष्ठः पाठः - मनः पूतं समाचरेत् (Manahpūtaṁ Samācaret)

१. कक्षा-संवादः (Classroom Dialogue)

संस्कृत-मूलपाठः (Sanskrit Text)

आचार्या: प्रियच्छात्राः ! वदन्तु, किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम् ?

छात्रः १: आचार्ये ! विचिन्त्य कार्यकरणम्।

छात्रः २: उचितविधिना कार्यकरणम्।

छात्रः ३: पूर्णमनसा कार्यकरणम्।

आचार्या: सर्वे उचितमेव वदन्ति। अधुना विचारयन्तु, यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात् तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत् ?

छात्रः: एवं चेत् तस्य कार्यस्य फलम् अपि दूषितम् एव स्यात्।

आचार्या: अत एव अस्माभिः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि। एतदेव शिक्षयति प्रस्तुतः पाठः 'मनःपूतं समाचरेत्' इति।

छात्रः: आचार्ये ! अस्मिन् पाठे विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि दृश्यन्ते। किम् एतानि सुभाषितानि वर्तमानसमये अपि उपयोगीनि सन्ति ?

आचार्या: भवन्तः स्वयमेव चिन्तयन्तु।

छात्रा: अहं वदामि आचार्ये ! एतानि सुभाषितानि न केवलं पठनाय अपितु जीवने आचरणाय सन्ति।

आचार्या: सम्यक् उक्तम्। आयान्तु, वयं सुभाषितानि पठामः जीवने च आचरामः।
  
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation):

शिक्षिका: प्रिय विद्यार्थियों! बताइए, यदि कोई कार्य करना हो, तो सबसे पहले क्या आवश्यक है?

पहला छात्र: आचार्या जी! सोच-विचार कर कार्य करना।

दूसरा छात्र: उचित विधि से कार्य करना।

तीसरा छात्र: पूरे मन (एकाग्रता) से कार्य करना।

शिक्षिका: सभी बिल्कुल सही कह रहे हैं। अब सोचिए, यदि मन ही मैला (अपवित्र) हो और उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई भी कार्य अच्छा कैसे हो सकता है?

छात्र: यदि ऐसा होगा, तो उस कार्य का परिणाम भी दूषित (बुरा) ही होगा।

शिक्षिका: इसलिए हमें सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए। यही शिक्षा प्रस्तुत पाठ 'मनःपूतं समाचरेत्' (पवित्र मन से आचरण करना चाहिए) देता है।

छात्र: आचार्या जी! इस पाठ में विभिन्न ग्रंथों से सूक्तियाँ (सुभाषित) संकलित दिखाई दे रही हैं। क्या ये सुभाषित वर्तमान समय में भी उपयोगी हैं?

शिक्षिका: आप स्वयं ही विचार कीजिए।

छात्रा: आचार्या जी, मैं बताती हूँ! ये सुभाषित न केवल पढ़ने के लिए हैं, बल्कि जीवन में आचरण (व्यवहार) में लाने के लिए हैं।

शिक्षिका: बिल्कुल सही कहा। आइए, हम सब इन सुभाषितों को पढ़ते हैं और जीवन में आचरण में लाते हैं।

English Translation:

Teacher: Dear students! Tell me, if any task is to be done, what is necessary at the beginning?

Student 1: Respected Teacher! Doing the work after careful thinking.

Student 2: Doing the work using the proper method.

Student 3: Doing the work with full dedication/mind.

Teacher: All of you speak correctly. Now reflect, if the mind itself is impure and the intention itself is improper, then how can any work be good?

Student: If that is the case, the fruit of that work will also be tainted.

Teacher: That is why we must do all works with a pure mind. This is precisely what this lesson, 'Act with a Pure Mind' (Manahpūtaṁ Samācaret), teaches us.

Student: Respected Teacher! In this chapter, wise sayings (subhashitas) appear to be collected from various texts. Are these sayings useful in present times as well?

Teacher: Think about it yourselves.

Student (Girl): I will answer, Teacher! These wise sayings are not merely for reading, but for practicing in our lives.

Teacher: Well said. Come, let us read these verses and put them into practice in our lives.

२. श्लोकाः, हिन्दी तथा आङ्ग्लानुवादः (Shlokas & Translations)

श्लोक १

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ १॥ 
(मनुस्मृतिः - ६.४६)
  
हिन्दी अनुवाद: दृष्टि से भली-भाँति देखकर (पवित्र करके) कदम आगे बढ़ाना चाहिए, वस्त्र से छानकर (पवित्र) जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र वाणी बोलनी चाहिए और मन से पवित्र (शुद्ध अन्तःकरण के अनुसार) आचरण करना चाहिए।

English Translation: One should place one's foot forward after looking carefully (cleansed by sight), drink water strained through cloth (cleansed by cloth), speak words purified by truth, and act in a manner purified by a pure conscience.

श्लोक २

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २॥ 
(मनुस्मृतिः - ६.९२)
  
हिन्दी अनुवाद: धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इन्द्रियों को वश में रखना (इन्द्रिय-निग्रह), सदबुद्धि (धी), विद्या/ज्ञान, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध)—ये दस धर्म के लक्षण हैं।

English Translation: Patience/fortitude, forgiveness, self-control, non-stealing, purity, restraint of the senses, wisdom, knowledge, truthfulness, and freedom from anger—these ten are the characteristics of Dharma (righteousness).

श्लोक ३

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३॥ 
(श्रीमद्भगवद्गीता - ३.२१)
  
हिन्दी अनुवाद: श्रेष्ठ (महापुरुष) जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य (साधारण) लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जिसे प्रमाण (आदर्श) मान लेता है, सम्पूर्ण संसार उसी का अनुसरण करता है।

English Translation: Whatever actions a great person performs, common people follow suit. Whatever standards he sets by exemplary conduct, the world pursues.

श्लोक ४

अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः ।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४॥ 
(सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
  
हिन्दी अनुवाद: अभ्यास (निरंतर परिश्रम) से सभी क्रियाएँ सिद्ध होती हैं, अभ्यास से ही सारी कलाएँ सिद्ध होती हैं। अभ्यास से ही ध्यान और मौन आदि सिद्ध होते हैं; अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन (असंभव) नहीं है।

English Translation: Through practice, all tasks are accomplished; through practice, all arts are mastered. Through practice, meditation and silence are attained; what indeed is impossible for dedicated practice?

श्लोक ५

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५॥ 
(नीतिशतकम् - २७)
  
हिन्दी अनुवाद: अधम (निम्न श्रेणी के) लोग विघ्नों के डर से कार्य शुरू ही नहीं करते; मध्यम श्रेणी के लोग कार्य शुरू करके विघ्नों से घबराकर बीच में ही रुक जाते हैं। किन्तु उत्तम श्रेणी के लोग बार-बार विघ्नों के आने पर भी शुरू किए गए कार्य को कभी नहीं छोड़ते।

English Translation: Inferior people do not even begin a task out of fear of obstacles; mediocre people start, but give up midway when hindered by obstacles. However, noble-minded people, even when struck repeatedly by obstacles, never abandon what they have undertaken.

श्लोक ६

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६॥ 
(पञ्चतन्त्रम् - मित्रभेदः १४९)
  
हिन्दी अनुवाद: परिश्रमी (सिंह के समान पराक्रमी) पुरुष के पास ही लक्ष्मी (सफलता/समृद्धि) आती है। 'भाग्य से ही सब प्राप्त होगा', ऐसा कायर लोग कहते हैं। भाग्य पर निर्भरता त्यागकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ (परिश्रम) करो; यत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष?

English Translation: Fortune approaches the industrious person who is courageous like a lion. Only cowards say that destiny alone provides. Casting aside fate, put forth effort with all your might; if despite putting in sincere effort success is not attained, what fault is there?

श्लोक ७

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७॥ 
(मालविकाग्निमित्रम् - १.२)
  
हिन्दी अनुवाद: केवल प्राचीन (पुराना) होने से ही सब कुछ अच्छा नहीं हो जाता, और न ही केवल नया होने से कोई काव्य दोषपूर्ण या त्याज्य हो जाता है। सज्जन लोग स्वयं परखकर दोनों में से उत्तम को स्वीकार करते हैं, जबकि मूर्ख व्यक्ति दूसरों की बुद्धि और राय पर ही आश्रित रहता है।

English Translation: Everything old is not necessarily good, nor is a literary work flawed merely because it is new. The wise examine both before choosing the better, whereas a fool's mind is guided purely by the beliefs of others.

श्लोक ८

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८॥ 
(किरातार्जुनीयम् - २.३०)
  
हिन्दी अनुवाद: बिना सोचे-विचारे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक (अज्ञानता) परम विपत्तियों का स्थान (कारण) होता है। गुणों की चाह रखने वाली संपत्तियाँ (समृद्धि) सोच-विचार कर कार्य करने वाले व्यक्ति का स्वयं ही वरण करती हैं।

English Translation: One should never act impulsively without deliberation, for lack of discretion is the source of the greatest misfortunes. Prosperities that value good qualities naturally choose of their own accord a person who acts thoughtfully.

Class 9 Sanskrit Sharada Chapter 6 Solutions:

३. अभ्यास-प्रश्नोत्तराणि (Questions & Answers)

प्रश्न १. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत -

(क) लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति ?
उत्तरम्: लोकः श्रेष्ठस्य जनस्य आचरणम् अनुकरोति।
 
(ख) कीदृशी वाणी वक्तव्या ?
उत्तरम्: सत्यपूता वाणी वक्तव्या।  

(ग) लक्ष्मीः कम् उपैति ?
उत्तरम्: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।  

(घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति ?
उत्तरम्: उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः कार्यं न परित्यजन्ति।  

(ङ) धर्मस्य लक्षणानि कानि ?
उत्तरम्: धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः च - एतानि दश धर्मस्य लक्षणानि सन्ति।  

(च) सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?
उत्तरम्: सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।  

(छ) सम्पदः कं वृणते ?
उत्तरम्: सम्पदः विमृश्यकारिणं जनं वृणते।  

प्रश्न २. अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत -

(क) ....................................परमापदां पदम् ।
(ख) सन्तः.........................................अन्यतरद् भजन्ते ।
(ग) दैवं निहत्य कुरु ................................आत्मशक्त्या ।
(घ) स यत् ......................................................कुरुते ।
(ङ) धीर्विद्या सत्यमक्रोधो .........................धर्मलक्षणम् ।  

उत्तरम् :

(क) अविवेकः परमापदां पदम् ।

(ख) सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते ।

(ग) दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या ।

(घ) स यत् प्रमाणं कुरुते ।

(ङ) धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् । 

प्रश्न ३. रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत -

(क) नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते।

उत्तरम् : कैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते ? (यदि 'विघ्नभयेन' रेखाङ्कितं स्यात्, तर्हि: नीचैः केन / कस्मात् कार्यं न प्रारभ्यते ?)

(ख) सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति ।

उत्तरम् : सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?  

(ग) वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।

उत्तरम् : कीदृशं जलं पिबेत् ?  

(घ) लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति ।

उत्तरम् : लक्ष्मीः कम् उपैति ?  

(ङ) सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते ।

उत्तरम् : के परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते ?  

(च) क्रियां सहसा न विदधीत ।

उत्तरम् : क्रियां कथम् न विदधीत ?  

प्रश्न ४. अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत -

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥
  
(क) अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम् ? 

उत्तरम् : न्यसेत्  

(ख) कं न्यसेत् ? 

उत्तरम् : पादम्  

(ग) कीदृशं पादं न्यसेत् ? 

उत्तरम् : दृष्टिपूतम्  

(घ) द्वितीयं किं क्रियापदम् अस्ति ? 

उत्तरम् : पिबेत्  

(ङ) किं पिबेत् ? 

उत्तरम् : जलम्  

(च) कीदृशं जलं पिबेत् ?
 
उत्तरम् : वस्त्रपूतम्  

(छ) तृतीयं किं क्रियापदम् अस्ति ?
 
उत्तरम् : वदेत्  

(ज) कां वदेत् ? 

उत्तरम् : वाचम्  

(झ) कीदृशीं वाणीं वदेत् ? 

उत्तरम् : सत्यपूताम्  

(ञ) चतुर्थं किं क्रियापदम् अस्ति ? 

उत्तरम् : समाचरेत्  

(ट) कथं समाचरेत् ? 

उत्तरम् : मनःपूतम्  

प्रश्न ५. मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थेषु रिक्तस्थानानि पूरयत -

(मञ्जूषा: बुद्धिः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अभिप्रायं, धीराः, नूतनम्)  

(क) लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः .................... समीपं स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु 'विधिः एव बलीयान्' इति वदन्ति । पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव ....................... । प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि .....................न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु ।  

(ख) पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु तत्त्वं व्यक्तित्वं वा समीचीनं भवेदेव इति नियमः नास्ति । तथैव .....................अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति। येषां ......................पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति। किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम् ...........................श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते ।  

उत्तरम् : 

(क) लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्रमिणः पुरुषस्य समीपं स्वयम् आगच्छति। कापुरुषाः तु 'विधिः एव बलीयान्' इति वदन्ति । पौरुषेण परिस्थितिम् अतिक्रम्य कार्याणि साधयन्ति ते एव धीराः । प्रयत्नं कृत्वा अपि यदि लक्ष्यं न प्राप्तं तर्हि तत्र दोषः नास्ति खलु ।  

(ख) पुरातनम् अस्ति इति कारणेन किमपि वस्तु तत्त्वं व्यक्तित्वं वा समीचीनं भवेदेव इति नियमः नास्ति । तथैव नूतनम् अस्ति इति कारणेन दोषरहितं भवेत् इत्यपि नियमः नास्ति। येषां बुद्धिः पक्वा अस्ति ते परीक्षण-निरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुर्वन्ति। किन्तु अज्ञानाः अन्येषाम् अभिप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते ।  

प्रश्न ६. श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत -

(क) सर्वाः ....................अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। .................................कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) .......................(सिध्यति)। अभ्यासस्य ............................किम् (अस्ति) ?  

(ख) श्रेष्ठः यत् यत् .........................इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् ......................कुरुते, लोकः तत् .........................। 

उत्तरम् : 

(क) सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिध्यन्ति)। सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिध्यति)। अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति) ?  

(ख) श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते। 
 
प्रश्न ७. यथोचितं मेलनं कुरुत -

 श्लोकांशः

 स्रोतोग्रन्थः

(क) पुराणमित्येव न साधु सर्वम् 

१. मनुस्मृतिः

(ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति

३. नीतिशतकम्

(ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः

२. पञ्चतन्त्रम्

(घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्

४. मालविकाग्निमित्रम्

(ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः

५. श्रीमद्भगवद्गीता


उत्तरम् : 

 श्लोकांशः

 स्रोतोग्रन्थः

(क) पुराणमित्येव न साधु सर्वम् 

४. मालविकाग्निमित्रम्

(ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति

३. नीतिशतकम्

(ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः

५. श्रीमद्भगवद्गीता

(घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्

१. मनुस्मृतिः

(ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः

२. पञ्चतन्त्रम्



प्रश्न ८. रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत -

यथा - बहून्यपि = बहूनि + अपि

(क) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्। = ............................ + ...........................

(ख) पुराणमित्येव न साधु सर्वम। =  ............................ + ........................... + ...........................

(ग) विघ्नैः पुनरपि प्रतिहत्यमानाः। =  ............................ + ...........................

(घ) प्रारम्भ चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति। =  ............................ + ...........................

(ङ) विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः। =  ............................ + ...........................

(च) लोकस्तदनुवर्तते = ............................ + ........................... + ...........................

(छ) सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = ............................ + ........................... + ...........................


उत्तरम् : 

(क) दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम्
(ख) पुराणमित्येव = पुराणम् + इति + एव
(ग) पुनरपि = पुनः + अपि
(घ) चोत्तमजनाः = च + उत्तमजनाः
(ङ) विघ्नविहता = विघ्न + विहता
(च) लोकस्तदनुवर्तते = लोकः + तत् + अनुवर्तते
(छ) परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते  

प्रश्न ९. विग्रहवाक्येभ्यः समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत -

                विग्रहवाक्यानि                                     समस्तपदानि 
यथा - मनसा पूतम् समाचरेत =                             मनः पूतम् 

(क) विघ्नैः विहताः (कार्यात ) विरमन्ति। ...............................
(ख) वस्त्रेण पूतम् जलं पिबेत। ..............................
(ग) पुरुषः सिंहः इव तम् उपैति लक्ष्मीः। ..............................
(घ) उत्तमाः जनाः न परित्यजन्ति।..............................
(ङ) न विवेकः परमापदां पदम्।  ..............................

उत्तरम् : 

(क) विघ्नैः विहताः = विघ्नविहताः

(ख) वस्त्रेण पूतम् = वस्त्रपूतम्

(ग) पुरुषः सिंहः इव तम् = पुरुषसिंहम्

(घ) उत्तमाः जनाः = उत्तमजनाः

(ङ) न विवेकः = अविवेकः  

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